भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 359 - अपराधों के समझौते का प्रावधान और नियम


भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 359 (CrPC 320) उन अपराधों से संबंधित है जिनमें आरोपी और पीड़ित आपसी सहमति से समझौता कर सकते हैं। यह धारा मुख्य रूप से उन मामलों में सुलह करने की अनुमति देती है जिनमें आमतौर पर अधिकतम दो साल की सजा का प्रावधान है, जैसे - कम चोट, चोरी, या गलत तरीके से रोकना।

इस आर्टिकल में हम विस्तार से समझेंगे कि बीएनएसएस सेक्शन 359 के अनुसार समझौते के लिए योग्य अपराध कौन से हैं, कोर्ट की अनुमति कब ज़रूरी होती है, और कानूनी रूप से 'राजीनामा' (Compounding) करने का सही तरीका क्या है। साथ ही, हम यह भी देखेंगे कि अगर मामला गंभीर है तो क्या समझौता संभव है?

अक्सर लोग छोटी-मोटी लड़ाई या गलतफहमी की वजह से पुलिस और कोर्ट के चक्करों में फंस जाते हैं। सालों-साल तारीखें भुगतने से बेहतर होता है कि मामला आपसी बातचीत से सुलझा लिया जाए। बीएनएसएस की धारा 359 इसी 'समझौते' को कानूनी मान्यता देती है। आइए इसके हर पहलू को गहराई से समझते हैं।


विषयसूची

  1. BNSS धारा 359 क्या है? (आपसी समझौते का कानून)
  2. धारा 359 के तहत समझौते के योग्य अपराध और उनकी धाराएं
  3. आपसी समझौता कैसे किया जाता है - पूरी प्रक्रिया
  4. 1. मारपीट और हमले से जुड़े अपराध
  5. 2. संपत्ति और पैसे से जुड़े अपराध
  6. 3. मान-सम्मान और अपमान
  7. 4. महिलाओं और शादी से जुड़े मामले
  8. विशेष स्थिति: पीड़ित नाबालिग, पागल या मृत व्यक्ति होने पर समझौता
  9. क्या गंभीर अपराधों में समझौता हो सकता है?
  10. पुराने कानून CrPC 320 और BNSS 360 में अंतर?
  11. समझौते के दौरान बरती जाने वाली सावधानियां
  12. बीएनएसएस धारा 359 पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

BNSS धारा 359 क्या है? (आपसी समझौते का कानून)

कानूनी भाषा में इसे 'अपराधों का शमन' (Compounding of Offences) कहा जाता है। इसका मतलब है कि अगर पीड़ित व्यक्ति (जिसके साथ गलत हुआ है) आरोपी को माफ़ करने के लिए तैयार है, तो उनमे हुए आपसी समझौते के तहत कोर्ट उस केस को वहीं बंद कर सकता है।

  • दो साल की सीमा: यह धारा ज्यादातर उन छोटे आपराधिक मामलों पर लागू होती है जिनमें सजा 2 साल तक की जेल होती है।
  • उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य अदालतों पर बोझ कम करना और समाज में शांति बहाल करना है। छोटी बातों के लिए जेल भेजने के बजाय सुलह को बढ़ावा दिया जाता है।
  • असर: एक बार जब कोर्ट समझौते को मंजूर कर लेता है, तो इसका मतलब यह होता है कि आरोपी उस केस से बाइज्जत बरी हो गया है।

धारा 359 के तहत समझौते के योग्य अपराध और उनकी धाराएं

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत बहुत से अपराधों में समझौता किया जा सकता है। जिन अपराधों में आपसी सुलहनामा किया जा सकता है उनमे से मुख्य अपराध और धाराएं नीचे दी गई है:


1. मारपीट और हमले से जुड़े अपराध


2. संपत्ति और पैसे से जुड़े अपराध

  • चोरी (BNS 303): अगर चोरी गई संपत्ति की कीमत कम है और पीड़ित व्यक्ति अपना सामान वापस पाकर या हर्जाना लेकर खुश है (BNSS की धारा 303), तो केस बंद हो सकता है।

  • आपराधिक विश्वासघात (BNS 316): किसी ने आपके साथ किसी तरह का आपराधिक विश्वासघात किया हो।

  • धोखाधड़ी (BNS 318): अगर किसी ने आपके साथ पैसों की ठगी की है और अब वह पैसे लौटाने को तैयार है।


3. मान-सम्मान और अपमान


4. महिलाओं और शादी से जुड़े मामले

  • विवाहित महिला को फुसलाना (BNS 84): किसी शादीशुदा महिला को गलत इरादे से ले जाना।

  • व्यभिचार: हालाँकि अब यह अपराध की श्रेणी से बाहर है, लेकिन पुराने लंबित मामलों में पति-पत्नी की आपसी सहमति से समझौता हो सकता है।


आपसी समझौता कैसे किया जाता है - पूरी प्रक्रिया

समझौता केवल जुबानी नहीं होता, बीएनएसएस सेक्शन 359 के तहत समझौते की एक प्रक्रिया होती है। जो हमने नीचे बताई है।
  1. आपसी बातचीत: दोनों पक्ष (आरोपी और पीड़ित) आपस में बैठकर सुलह की शर्तें तय करते हैं। (जैसे - नुकसान की भरपाई या माफी)।
  2. अर्जी तैयार करना: वकील के ज़रिए कोर्ट में 'एप्लीकेशन फॉर कंपाउंडिंग' दी जाती है। इसमें दोनों पक्षों के हस्ताक्षर होते हैं।
  3. कोर्ट में पेशी: जज साहब दोनों पक्षों को बुलाते हैं और पूछते हैं कि "क्या आप अपनी मर्जी से समझौता कर रहे हैं?"
  4. जज का आदेश: अगर जज संतुष्ट हैं कि कोई दबाव नहीं है, तो वे समझौते को स्वीकार कर लेते हैं और एफआईआर या केस को रद्द करने का आदेश देते हैं।

विशेष स्थिति: पीड़ित नाबालिग, पागल या मृत व्यक्ति होने पर समझौता

कभी-कभी पीड़ित पक्ष खुद फैसला लेने की स्थिति में नहीं होता। ऐसे में धारा 359 विशेष नियम देती है:

  • नाबालिग: अगर पीड़ित की उम्र 18 साल से कम है, तो उसका अभिभावक (माता-पिता या लीगल गार्डियन) कोर्ट से पूछकर समझौता कर सकता है।
  • मृत्यु : अगर केस चलते समय पीड़ित की मौत हो गई है, तो उसके कानूनी वारिस (Legal Heirs) समझौते की बात आगे बढ़ा सकते हैं।
  • मानसिक बीमार: अगर व्यक्ति दिमागी रूप से ठीक नहीं है, तो कोर्ट द्वारा नियुक्त व्यक्ति उसकी तरफ से सुलह कर सकता है।

क्या गंभीर अपराधों में समझौता हो सकता है?

  • नियम: हत्या (BNS 103), बलात्कार (BNS 64), डकैती या देशद्रोह जैसे केस 'गैर-शमन योग्य' होते हैं। इनमें कानून किसी भी कीमत पर समझौते की इजाज़त नहीं देता।
  • वजह: ये अपराध केवल एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे समाज के खिलाफ माने जाते हैं।
  • अपवाद (High Court Power): कभी-कभी हाई कोर्ट धारा 528 (पुरानी 482 CrPC) के तहत अपनी विशेष पावर का इस्तेमाल करके ऐसे केसों को भी रद्द कर सकता है जहाँ दोनों पक्षों में गहरा समझौता हो गया हो (खासकर पति-पत्नी के विवाद में), लेकिन यह बहुत मुश्किल होता है।

पुराने कानून CrPC 320 और BNSS 360 में अंतर?

पुरानी धारा 320 (CrPC) और नई धारा 359 (BNSS) बुनियादी रूप से एक जैसी ही हैं, लेकिन कुछ चीजों को और स्पष्ट कर दिया गया है। 2026 के नए नियमों के अनुसार, अब डिजिटल तरीके से भी सुलह की अर्जी दी जा सकती है। साथ ही, कुछ नए अपराधों की लिस्ट को इसमें जोड़ा गया है ताकि छोटे विवादों को जल्दी निपटाया जा सके।


समझौते के दौरान बरती जाने वाली सावधानियां

  • धमकी से बचें: अगर कोई आपको डराकर समझौता करने को कह रहा है, तो कभी हाँ न कहें। कोर्ट को सच बताएं।
  • लिखित सबूत: समझौते की शर्तों को साफ-साफ़ कागज़ पर लिखवाएं। अगर कोई पैसा दिया गया है, तो उसकी रसीद या बैंक ट्रांजेक्शन का रिकॉर्ड रखें।
  • अधूरा समझौता न करें: कभी भी "आधा-अधूरा" समझौता न करें। पक्का करें कि केस पूरी तरह से बंद हो रहा है और भविष्य में कोई नया दावा नहीं किया जाएगा।

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बीएनएसएस धारा 359 पर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल


क्या समझौता होने के बाद पुलिस मुझे गिरफ्तार कर सकती है?

नहीं। एक बार कोर्ट ने समझौता मंजूर कर लिया, तो वह केस खत्म हो जाता है। पुलिस आपको उस मामले में दोबारा परेशान नहीं कर सकती।



क्या पुलिस स्टेशन में ही समझौता किया जा सकता है?

पुलिस के पास केस खत्म करने की पावर नहीं होती। समझौता करने के लिए आपको कोर्ट में जज के सामने अर्जी देनी ही होगी। पुलिस केवल आपकी सुलह में मदद कर सकती है



क्या एफआईआर रद्द कराने और समझौता करने में कोई अंतर है?

समझौता (Compounding) निचली अदालत में होता है जहाँ केस चल रहा है। एफआईआर रद्द (Quashing) कराना हाई कोर्ट की पावर है। दोनों का नतीजा एक ही है, केस का खत्म होना।



क्या चेक बाउंस के केस में भी समझौता हो सकता है?

हाँ, चेक बाउंस के मामलों में समझौता बहुत आम है और इसके लिए अलग से कानून (NI Act) भी है। आप पैसे चुकाकर केस किसी भी स्टेज पर बंद करवा सकते हैं।



क्या वकील के बिना समझौता किया जा सकता है?

कानूनी रूप से आप समझौते की अर्जी लगा सकते है, लेकिन कागजी कार्रवाई में कोई गलती न हो, इसलिए वकील की मदद लेना बेहतर है।