FIR या Court Case वापस कैसे लें? शिकायत वापस लेने के नियम, आधार और प्रक्रिया



​भारत में अक्सर ऐसा होता है कि लोगो द्वारा झगड़े, गुस्से या गलतफहमी में आकर पुलिस में एफआईआर दर्ज करवा दी जाती है। लेकिन बाद में जब मामला शांत हो जाता है, और दोनों पक्षों में समझौता हो जाता है, तब वही लोग उस शिकायत या केस को वापस लेना चाहते हैं। लेकिन ज़्यादातर लोगों को यह समझ नहीं आता कि अदालत में केस जाने के बाद उसे वापस कैसे लिया जाता है, और FIR हर मामले में रद्द हो भी सकती है या नहीं।

अगर आप भी ऐसी किसी समस्या से परेशान है, या आप किसी FIR और केस को खत्म करना चाहते हैं, तो यह लेख आपके बहुत काम आने वाला है। आज के इस लेख में हम आसान भाषा में जानेंगे, कि FIR या Case वापस लेने का मतलब क्या है? शिकायत व मुकदमा वापिस लेने की प्रक्रिया क्या है? कौन-कौन से केस वापस लिए जा सकते है? और कौन से नही?


विषयसूची

  1. एफआईआर​ और कोर्ट केस वापस लेने का मतलब क्या होता है?
  2. दर्ज की गई एफआईआर वापस कैसे लेते है - प्रक्रिया
  3. पुलिस शिकायत और मुकदमा वापस लेने के क्या कारण हो सकते है?
  4. कौन सी शिकायत (FIR) व मुकदमे वापस लिए जा सकते हैं?
  5. कौन से केस वापस नहीं लिए जा सकते?
  6. अदालत (Court) में चल रहे मुकदमे (Case) को वापस लेने की प्रक्रिया क्या है?
  7. FIR वापस लेने या Quash (रद्द) कराने में कितना समय और खर्च आता है?
  8. FIR रद्द कराने और केस वापस लेने के लिए जरुरी डाक्यूमेंट्स
  9. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल


एफआईआर​ और कोर्ट केस वापस लेने का मतलब क्या होता है?

जब कोई व्यक्ति पुलिस में किसी के खिलाफ शिकायत दर्ज (Complaint Register) करवाता है, तो उसे हिन्दी में प्राथमिकी और अंग्रेजी में FIR यानि First Information Report कहते हैं। फिर आगे कि कार्यवाही में पुलिस जाँच के बाद मामला अदालत में जाता है। इसके बाद अगर दोनों पक्षों में आपसी समझौता हो जाए या शिकायत करने वाला अपना केस आगे नहीं बढ़ाना चाहे, तो वो FIR या कोर्ट में चल रहे केस को वापस ले सकता है।

  • एफआईआर वापस लेना मतलब - जिसने शिकायत की थी, वह अब कहता है कि उसे उस मामले में आगे कार्रवाई नहीं करानी है।
  • कोर्ट केस वापस लेना मतलब - मामला अगर अदालत में पहुँच गया है, तो शिकायत करने वाला अदालत से कहता है कि अब वह केस नहीं चलाना चाहता।


पुलिस शिकायत और मुकदमा वापस लेने के क्या कारण हो सकते है?

कई बार गुस्से या झगड़े में लोग FIR या केस दर्ज तो करवा देते हैं, लेकिन बाद में कुछ वजहों से उसे वापस लेना चाहते हैं। आइये उन वजहों के बारे में विस्तार से जानते है:-

  1. आपसी समझौता हो जाना: दोनों पक्षों में बातचीत से मामला सुलझ (Matter Solved) जाता है, और लड़ाई-झगड़े की जरूरत नहीं रह जाती।
  2. परिवार या समाज का दबाव: कई बार रिश्तेदार या समाज के लोग समझाते हैं कि झगड़ा बढ़ाने से कुछ नहीं होगा, और केस वापस ले लेना ही बेहतर है।
  3. गलतफहमी हो जाना: कई बार गुस्से या जल्दीबाज़ी में  एफआईआर दर्ज हो जाती है, लेकिन बाद में समझ आता है कि मामला इतना बड़ा नहीं था।
  4. डर या धमकी: कई बार आरोपी पक्ष (Accused Party) की तरफ से डराया या धमकाया जाता है, जिससे शिकायतकर्ता (Complainant) केस वापस लेने को मजबूर हो जाता है।
  5. समय और पैसा बचाने के लिए: कई बार अदालत के चक्कर और खर्चे से बचने के लिए भी लोग केस खत्म करना चाहते हैं।


कौन सी शिकायत (FIR) व मुकदमे वापस लिए जा सकते हैं?

ऐसे मामले जिनमें झगड़ा छोटा होता है और दोनों पक्ष आपस में समझौता (Compromise) कर लेते हैं, उन्हें वापस लिया जा सकता है। इसमें पुलिस या अदालत को बताया जाता है कि अब लड़ाई खत्म हो गई है। उदाहरण: मामूली मारपीट, गाली देना आदि।



कौन से केस वापस नहीं लिए जा सकते?

अगर मामला बहुत गंभीर हो, जैसे किसी की जान को खतरा, बहुत ज़्यादा नुकसान, या समाज के खिलाफ अपराध, तो ऐसा केस आसानी से वापस नहीं लिया जा सकता। इसमें कोर्ट की इजाजत (Permission) जरूरी होती है। उदाहरण: हत्या या हत्या की कोशिश, बलात्कार, अपहरण आदि।

जाने - आपसी समझौते से केस का निपटारा कैसे होता है?



दर्ज की गई एफआईआर वापस कैसे लेते है - प्रक्रिया

अगर किसी व्यक्ति ने पुलिस में शिकायत करके एफआईआर दर्ज करवाई है और अब वह उसे वापस लेना चाहता है, तो इसके लिए कुछ कानूनी प्रक्रिया होती है। आइये इस प्रक्रिया को आसान भाषा में समझते है:

1. थाने में लिखित अर्जी देना

जिस पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज हुई थी, वहीं जाकर शिकायतकर्ता को एक लिखित अर्जी (Written Application) देनी होती है। इस अर्जी में यह बताया जाता है कि अब वह उस मामले में आगे कोई कार्रवाई नहीं चाहता और एफआईआर को वापस लेना चाहता है।

इस आवेदन या अर्जी में शिकायत वापिस लेने की वजह भी बतानी होती है जैसे: आपसी समझौता हो गया है, गलतफहमी थी, या अब मामला सुलझ चुका है।

2. पुलिस की जांच और रिपोर्ट

अगर मामला गंभीर नहीं है, (जैसे गाली-गलौच या हल्की मारपीट), तो पुलिस आपकी अर्जी को ध्यान में रखते हुए आगे की जांच व कार्यवाही को बंद करने की रिपोर्ट बना सकती है, जिसे Closure Report कहा जाता है।

यह रिपोर्ट बाद में अदालत में जमा होती है, और कोर्ट अगर उसे स्वीकार कर लेता है, तो मामला बंद हो जाता है।

3. गंभीर अपराध होने पर

अगर एफआईआर ऐसे अपराध की है जिसे कानून समझौते से खत्म करने की इजाजत नहीं देता (जैसे हत्या, बलात्कार, धोखाधड़ी जैसे गंभीर अपराध), तो फिर FIR सीधे थाने या मजिस्ट्रेट के सामने वापस नहीं ली जा सकती।

इसके लिए हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल (Petition Filled) करनी होती है, जिससे प्राथमिकी को रद्द (quash) करवाया जाता है। ऐसे मामलों में हाई कोर्ट ही तय करता है कि मामला बंद होगा या नहीं।

5. वकील की मदद जरूरी होती है

एफआईआर वापस लेने की प्रक्रिया थोड़ी कानूनी होती है, इसलिए इसमें किसी वकील की सलाह लेना ज़रूरी होता है, ताकि सभी कानूनी कदम ठीक से पूरे किए जा सकें।



अदालत (Court) में चल रहे मुकदमे (Case) को वापस लेने की प्रक्रिया क्या है?

अगर कोई केस कोर्ट में चल रहा है और शिकायतकर्ता अब उसे आगे नहीं चलाना चाहता, तो उसे कोर्ट से केस वापस लेने की इजाजत लेनी होती है। इसके लिए भी एक कानूनी प्रक्रिया होती है, जो नीचे आसान भाषा में बताई गई है:

1. अदालत में अर्जी देना

जिस कोर्ट में केस चल रहा है, वहां शिकायतकर्ता को एक लिखित अर्जी देनी होती है कि वह अब केस को आगे नहीं चलाना चाहता।

इस अर्जी में कारण भी बताना होता है - जैसे समझौता हो गया है, गलतफहमी थी, अब कोई विवाद नहीं है आदि।

2. कोर्ट यह देखता है कि केस वापस लिया जा सकता है या नहीं

हर केस को अदालत में समझौता करके या किसी और तरीके से वापस नहीं लिया जा सकता है, लेकिन अगर मामला कम गंभीर अपराध (compoundable offence) का है, तो कोर्ट समझौते के आधार पर केस खत्म करने की अनुमति दे सकता है।

वही अगर मामला किसी गंभीर अपराध (non-compoundable offence) से जुड़ा हुआ है, जैसे हत्या, बलात्कार, तो कोर्ट सिर्फ शिकायतकर्ता के कहने पर भी केस को बंद नहीं करता। ऐसे मामलों में केस को खत्म करने के लिए आपको हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करनी होती है।

3. कोर्ट में बयान देना

शिकायतकर्ता को खुद अदालत में पेश होकर यह बताना होता है कि वह केस वापस क्यों लेना चाहता है। जज उसके बयान को रिकॉर्ड करता है और जांच करता है कि कहीं कोई दबाव या ज़बरदस्ती तो नहीं है।

4. कोर्ट का आदेश

अगर कोर्ट को लगे कि शिकायतकर्ता अपनी मर्जी से केस वापस ले रहा है और कानून इसकी इजाजत देता है, तो कोर्ट केस खत्म कर देता है।



FIR वापस लेने या Quash (रद्द) कराने में कितना समय और खर्च आता है?

प्राथमिकी (FIR) वापस लेना या कोर्ट से उसे रद्द (quash) कराना एक कानूनी प्रक्रिया है, जिसमें समय और खर्च दोनों लगते हैं। नीचे इसे सीधी और सरल भाषा में समझाया गया है:

1. अगर मामला कम गंभीर है (Compoundable Offence)

जैसे - झगड़ा, गाली-गलौच, मामूली मारपीट जैसे मामलों में FIR थाने या मजिस्ट्रेट कोर्ट में समझौते के बाद वापस ली जा सकती है।

  • समय: लगभग 15 दिन से 1 महीने तक लग सकते हैं।
  • खर्च: अगर आप वकील की मदद लेते हैं तो 5,000 रुपये से लेकर 20,000 रुपये तक खर्च आ सकता है, वकील की फीस और जगह के हिसाब से।

2. अगर मामला गंभीर है (Non-Compoundable Offence)

जैसे - हत्या, बलात्कार, धोखाधड़ी जैसे मामलों में FIR को सीधे वापस नहीं लिया जा सकता। इसके लिए उच्च न्यायालय (High  Court) में याचिका देकर FIR को quash करवाना होता है।

समय: इसमें 1 महीने से लेकर 3 महीने तक या इससे ज्यादा का समय भी लग सकता है।
वकील की फीस: 25,000 रुपये से 1 लाख रुपये तक या उससे भी ज्यादा फीस आपके द्वारा वकील को देनी पड़ सकती है।



FIR रद्द कराने और केस वापस लेने के लिए जरुरी डाक्यूमेंट्स

अगर आप FIR को रद्द (quash) कराना चाहते हैं या कोर्ट से केस वापस लेना चाहते हैं, तो इसके लिए कुछ जरूरी कागजात तैयार रखने होते हैं। ये सभी दस्तावेज इस प्रकार है:

  1. एफआईआर की कॉपी: जिस FIR को खत्म करवाना है, उसकी एक प्रति (Copy) जरूरी होती है।
  2. समझौते का पत्र (Settlement Agreement या Affidavit): शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच अगर समझौता हुआ है, तो उसका लिखित सबूत (Written Proof) होना जरूरी है। यह एक हलफनामा (Affidavit) होता है, जिस पर दोनों पक्षों के दस्तखत (Signature) होते हैं।
  3. दोनों पक्षों की पहचान के दस्तावेज: जैसे - आधार कार्ड, पैन कार्ड या वोटर आईडी। यह साबित करने के लिए कि अर्जी देने वाले वही लोग हैं जो केस से जुड़े हैं।
  4. कोर्ट में चल रहे केस के दस्तावेज: अगर मामला पहले से कोर्ट में चल रहा है, तो उसमें जमा की गई याचिकाएं, तारीखों के आदेश और केस नंबर की जानकारी जरूरी होती है।
  5. याचिका (Petition): अगर आप FIR को हाई कोर्ट से रद्द कराना चाहते हैं, तो वकील के ज़रिए एक याचिका तैयार की जाती है। इसमें सारी जानकारी और वजह लिखी जाती है।

निष्कर्ष:- आशा करते हैं कि आपको एफआईआर या कोर्ट केस वापस लेने से जुड़ी सारी जानकारी अब अच्छे से समझ आ गई होगी। हर मामला अलग होता है, इसलिए सही रास्ता और तरीका समझना बहुत ज़रूरी है। अगर आप भी किसी केस को खत्म करवाना चाहते हैं या शिकायत रद्द करने से जुड़ी कोई कानूनी सहायता चाहते, तो अभी नीचे दिए लिंक पर क्लिक करकें हमारे वकीलों से बात कर सकते है। 



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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल


किन मामलों में एफआईआर वापस ली जा सकती है?

ऐसे मामूली अपराधों में (जैसे झगड़ा, गाली-गलौज, हल्की मारपीट) जहां आपसी समझौता हो जाए, वहाँ FIR वापस ली जा सकती है।



क्या केस वापस लेने के लिए शिकायतकर्ता को अदालत में जाना पड़ता है?

हाँ, उसे कोर्ट में जाकर बताना पड़ता है कि वह अपनी मर्जी से केस वापस लेना चाहता है।



क्या FIR थाने से रद्द कराई जा सकती है?

नहीं, एक बार FIR दर्ज हो गई तो थाने से उसे वापस नहीं लिया जा सकता। उसे सिर्फ कोर्ट की अनुमति से ही रद्द किया जा सकता है।



पुलिस शिकायत (FIR) कैसे वापस लेते है?

अगर मामला आपसी झगड़े या छोटे मोटे अपराध का है और दोनों पक्षों में समझौता हो गया है, तो FIR वापस लेने के लिए हाईकोर्ट में आवेदन करना होता है। कोर्ट समझौते की सच्चाई देखकर फैसला करता है कि FIR रद्द की जाए या नहीं।