आईपीसी की धारा 376 | IPC Section 376 in Hindi (Dhara 376) - सजा और जमानत
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धारा 376 आईपीसी (IPC Section 376 in Hindi) - बलात्कार के लिए दण्ड


विवरण

जो भी व्यक्ति, धारा 376 के उप-धारा (1) या उप-धारा (2) के तहत दंडनीय अपराध करता है और इस तरह के अपराधिक कृत्य के दौरान लगी चोट एक महिला की मृत्यु या सदैव शिथिल अवस्था का कारण बनती है तो उसे एक अवधि के लिए कठोर कारावास जो कि बीस साल से कम नहीं होगा से दंडित किया जाएगा, इसे आजीवन कारावास तक बढ़ा या जा सकता हैं, जिसका मतलब है कि उस व्यक्ति के शेष प्राकृतिक जीवन के लिए या मृत्यु होने तक कारावास की सज़ा।

किसी भी महिला से बलात्कार किया जाना, चाहे वह किसी भी उम्र की हो, भारतीय कानून के तहत गंभीर श्रेणी में आता है। इस संगीन अपराध को अंजाम देने वाले दोषी को भारतीय दंड संहिता में कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान है। इस अपराध के लिये भारतीय दंड संहिता में धारा 376 के तहत सजा का प्रावधान है। तो क्या है धारा 376 और क्या हैं इसके तहत सजा का प्रावधान, आइए चर्चा करते हैं- ^
^आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013

लागू अपराध
1. बलात्कार
सजा - 7 वर्ष से कठोर आजीवन कारावास + आर्थिक दण्ड
यह एक गैर-जमानती, संज्ञेय अपराध और सत्र न्यायालय के द्वारा विचारणीय है।

2 एक पुलिस अधिकारी या एक सरकारी कर्मचारी या सशस्त्र बलों के सदस्य या जेल के प्रबंधन / कर्मचारी, रिमांड घर या अन्य अभिरक्षा की जगह या महिला / बच्चों की संस्था या प्रबंधन पर किसी व्यक्ति द्वारा बलात्कार द्वारा बलात्कार या किसी अस्पताल के प्रबंधन / कर्मचारी द्वारा बलात्कार और बलात्कार पीड़ित के किसी भरोसेमंद या प्राधिकारिक के व्यक्ति द्वारा जैसे किसी नज़दीकी संबंधी द्वारा बलात्कार|
दंड - 10 साल से कठोर आजीवन कारावास (शेष प्राकृतिक जीवन तक के लिए) + आर्थिक दण्ड
यह एक गैर-जमानती, संज्ञेय अपराध और सत्र न्यायालय के द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौता करने योग्य नहीं है।



क्या है धारा 376?

किसी भी महिला के साथ बलात्कार करने के आरोपी पर धारा 376 के तहत मुकदमा चलाया जाता है, जिसमें न्यायालय में पुलिस द्वारा जाँच पड़ताल के बाद इकट्ठे किये गए सबूतों और गवाहों के बयानों के आधार पर दोनों पक्षों के वकील दलीलें पेश करते हैं, दलीलों के आधार पर जज अपने अनुभव और विवेक से निर्णय लेते हैं, अंत में अपराध सिद्ध होने की दशा में दोषी को कम से कम सात साल व अधिकतम 10 साल तक कड़ी सजा और आजीवन कारावास दिए जाने का प्रावधान है। जिससे कि अपराधी को अपने गुनाह का अहसास हो और भविष्य में वह कभी भी बलात्कार जैसे संगीन अपराध को करने कि कोशिश भी न करे।


क्या धारा 376 पत्नी से दुष्कर्म करने पर भी लागू हो सकती है?

दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि 15 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ विवाह के बाद जब संभोग होता है, तो उसे बलात्कार ही माना जाएगा। हाईकोर्ट ने कहा है कि संभोग के लिए भले ही लड़की की रजामंदी हो या न हो, तब भी इसे बलात्कार ही माना जाएगा, और ऐसे मामलों में पुरुष को उसके धार्मिक अधिकारों के तहत कोई भी संरक्षण हासिल नहीं है। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए. के. सीकरी की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ का कहना था कि, ''15 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ संभोग आई. पी. सी. की धारा 376 के तहत एक अपराध है। इस कानून के विषय में कोई अपवाद नहीं हो सकता है और इसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।''


आई. पी. सी. की धारा 375 परिभाषित करती है दुष्कर्म को

जब कोई पुरुष किसी महिला के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध, उसकी सहमति के बिना, उसे डरा धमका कर, दिमागी रूप से कमजोर या पागल महिला को धोखा देकर या उस महिला के शराब या नशीले पदार्थ के कारण होश में नहीं होने पर संभोग करता है, तो उसे बलात्कार कहते हैं। इसमें चाहे किसी भी कारण से संभोग क्रिया पूरी हुई हो अथवा नहीं, कानूनन वो बलात्कार की श्रेणी में ही रखा जायेगा। यदि महिला की उम्र 16 वर्ष से कम है तो उसकी सहमति या बिना सहमति से होने वाला संभोग भी बलात्कार के अपराध में ही गिना जाता है। इस अपराध को अलग-अलग हालात और श्रेणी के हिसाब से भारतीय दंड संहिता में इसे धारा 376, 376 (क), 376 (ख), 376 (ग), 376 (घ) के रूप में विभाजित किया गया है।


यह कानून प्रत्येक स्थिति में लागू होता है

भारतीय दंड संहिता की धारा 376 की उप धारा (2) के अनुसार यह बताया गया है कि कोई पुलिस अधिकारी पुलिस थाने परिसर की सीमा के अंदर और बाहर या कोई सरकारी कर्मचारी अपने पद और आधिकारिक या शासकीय शक्ति और स्थिति का दुरुपयोग महिला अधिकारी या कर्मचारी के साथ संभोग करेगा, तो वह भी बलात्कार ही माना जाएगा। यह कानून जेल, चिकित्सालय, राजकीय कार्यालयों, बाल एवं महिला सुधार गृहों पर भी लागू होता है। इस प्रकार के सभी बलात्कार के दोषियों को कठोर कारावास की अधिकतम सजा हो सकती है। जिसकी अवधि दस वर्ष या उससे अधिक हो सकती है, या आजीवन कारावास और जुर्माने से भी दण्डित किया जा सकता है।


यदि संबंध आपसी सहमति से बना है तो बलात्कार की श्रेणी में नहीं आएगा

बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा था कि अगर कोई शिक्षित और 18 वर्ष से अधिक उम्र की लड़की रिलेशनशिप में किसी पुरुष के साथ अपनी सहमति से संबंध बनाती है, तो रिश्ते खराब होने के बाद वह उस व्यक्ति पर बलात्कार का आरोप नहीं लगा सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा है, चूँकि अपने समाज में यौन संबंध बनाना सही नहीं माना जाता है, तब भी यदि कोई महिला यौन संबंधों के लिए अपने प्रेमी या उस व्यक्ति से जिससे वह यौन सम्बन्ध बना रही है, से इंकार नहीं करती है, तो फिर उसे आपसी सहमति से बनाया गया यौन संबंध ही माना जाएगा।


क्या केवल धारा 376 में ही बलात्कार की सजा दी गयी है

भारतीय दंड संहिता,1860 में बलात्कार के दोषी के लिए धारा 376 में कड़ी सजा का प्रावधान दिया गया है, किन्तु कई परिस्तिथियां ऐसी भी होती हैं जहाँ धारा 376 की सभी शर्तें पूर्ण नहीं होती हैं, तब ऐसी अवस्था में भारतीय दंड संहिता में आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 2013 के तहत कुछ अन्य धाराओं का प्रावधान दिया गया है, जिससे यदि किसी व्यक्ति ने किसी भी प्रकार से बलात्कार जैसे संगीन अपराध को अंजाम दिया है तो वह अपराधी किसी भी तरह से बच न सके और न्यायलय द्वारा उसे कड़ी से कड़ी सजा प्रदान की जाये। तो आइये जानते हैं कि धारा 376 के अतिरिक्त वह और कौन सी धाराएँ हैं-

  1. 376 (क)-
    यदि कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार के विभाजन के तहत अलग रहने के दौरान अपनी पत्नी के साथ उसकी मर्जी के विरुद्ध संभोग करता है तो वो भी बलात्कार की श्रेणी में ही आता है। जिसके लिए कानून में दो वर्ष तक की सजा और आर्थिक दंड का प्रावधान दिया गया है।
  2. 376 (ख)
    यदि किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा उसकी हिरासत में किसी भी स्त्री के साथ संभोग किया जाता है, तो इस दुष्कर्म को बलात्कार के अपराध की श्रेणी में गिना जाएगा। जिसके लिए भारतीय दंड संहिता, 1860 के अनुसार पांच वर्ष तक की जेल की सजा के साथ आर्थिक दंड भी देना पड़ेगा।
  3. 376 (ग)
    जब कोई अधिकारी, सरकारी कर्मचारी, जेल, रिमांड होम, हिरासत के किसी अन्य स्थान, स्त्रियों या बालको की संस्था का अधीक्षक या प्रबंधक या अस्पताल का कर्मचारी होते हुए, ऐसी किसी स्त्री, जो की उसकी हिरासत में है या उसके अधीन है या परिसर में उपस्थित है उस स्त्री को अपने साथ शारीरक सम्बन्ध बनाने के लिए उत्प्रेरित करने लिए अपनी शक्ति का दुरूपयोग करता है, तो उस व्यक्ति को पांच साल या दस साल की कारावास की सजा से दण्डित किया जाता है और जुर्माने से भी दण्डित किया जा सकता है।
  4. 376 (घ)
    जहाँ किसी स्त्री के साथ एक या एक से अधिक वयक्तियों द्वारा मिलकर या समूह बना कर सामूहिक बलात्कार किया जाता है, तो उन सभी व्यक्तियों में से प्रत्येक व्यक्ति के बारे में यह समझा जायेगा की उसने बलात्कार का अपराध किया है। ऐसे में दोषी अपराधियों को न्यायलय द्वारा दण्डित किया जायेगा, जो की बीस साल की कारावास की सजा या आजीवन कारावास की सजा और जुर्माने के साथ भी दण्डित किया जाएगा। लेकिन ऐसा जुर्माना पीड़िता के चिकित्सीय खर्चो को पूरा करने और पुनर्वास के लिए न्यायोचित होगा।

आइये समझते हैं धारा 376 को बलात्कार से जुड़े प्रचलित मामले से

अपनी आँखों और कानों पर विश्वास ही नहीं होता है जब सुनने और देखने में आता है, की भारत जैसे देश में जहाँ नारी को देवी और लक्ष्मी माना जाता है वहां ऐसी घटना होती है जिससे इंसानियत तक शर्मिंदा हो जाती है, और सुनने वाले की रूह तक काँप उठती है, निर्भया कांड भी कुछ ऐसा ही है-


निर्भया बलात्कार कांड-

16 दिसम्बर, 2012 के दिन दिल्ली शहर में एक बहुत ही दर्दनाक हादसा हुआ। उस रात एक चलती बस में पांच बालिग और एक नाबालिग दरिंदों ने 23 साल की पैरामेडिकल की छात्रा निर्भया के साथ बलात्कार की घटना को अंजाम दिया, जिसे जानकर हर देशवासी की रूह कांप उठी। घटना के दो दिन बाद ही पुलिस ने चार आरोपियों को अपनी गिरफ्त में लिया, जिसके चलते मंगलवार 18 दिसम्बर, 2012 को ही इस मामले को संसद में बहुत उछाला गया, जहां आक्रोशित सांसदों ने बलात्कारियों के लिए मृत्युदंड की मांग की। निर्भया की हालत बहुत ज्यादा खराब होने से उसने सिंगापुर के माउन्ट एलिजाबेथ अस्पताल में 29 दिसंबर, 2012 की रात के करीब सवा दो बजे अपना दम तोड़ दिया।

मामला कोर्ट में चल रहा था, मगर इसी बीच 11 मार्च, 2013 को आरोपी बस चालक राम सिंह ने तिहाड़ जेल में आत्महत्या कर ली। इस जघन्य अपराध में शामिल एक नाबालिग दोषी को बाल सुधार गृह में तीन साल गुजारने के बाद 20 दिसंबर, 2015 को अदालत ने जमानत पर रिहा कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने 3 जनवरी, 2014 को फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट का फैसला सुरक्षित रखा और 13 मार्च, 2014 को निचली अदालत द्वारा चारों बालिग आरोपियों को सुनाई गई मौत की सजा पर मुहर लगा दी।

तत्पश्चात 9 जुलाई, 2018 को दोषियों की ओर से दाखिल की गई पुनर्विचार याचिका को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने खारिज करते हुए मौत की सजा को बरकरार रखा। पुनः 13 दिसंबर, 2018 चारों दोषियों को तुरंत मौत की सजा देने के निर्देश देने की मांग वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। अब यहां ये तय किया जाना है कि इन तीनों दोषियों को कब फांसी की सजा दी जानी है।


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