क्या उच्च न्यायालय में समझौता किया गया मामला वापस लाया जा सकता है


सवाल

मेरे गाँव में दो पक्षों के बीच बच्चों के विवाद को लेकर झगड़ा हुआ था, जिसमें मारपीट भी हुई थी। तीन महीने पहले दोनों पक्षों ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के सामने आपसी समझौता कर लिया और मामला सुलझ गया। अब एक पक्ष दूसरे पक्ष को डरा रहा है कि वे उस समझौते को वापस ले लेंगे और मामला फिर से शुरू करवा देंगे। इस बहाने वे पैसों की मांग कर रहे हैं। क्या उच्च न्यायालय में जज के सामने हुआ समझौता कानूनी रूप से वापस लिया जा सकता है या यह केवल ब्लैकमेल करने की कोशिश है?

उत्तर (5)


278 votes

कानूनी रूप से देखा जाए तो एक बार जब उच्च न्यायालय (High Court) के समक्ष दोनों पक्षों की सहमति से समझौता हो जाता है और न्यायाधीश उस पर अपनी मुहर लगा देते हैं, तो वह एक अंतिम आदेश (Final Order) माना जाता है। इस प्रकार के समझौते को आमतौर पर वापस नहीं लिया जा सकता है। यह एक कानूनी डिक्री (Decree) की तरह काम करता है जो दोनों पक्षों पर समान रूप से बाध्यकारी होता है।

यदि मामला आपराधिक था और उसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं के तहत समझौता योग्य मानकर बंद कर दिया गया है, तो कोई भी पक्ष अपनी मर्जी से उसे दोबारा शुरू नहीं कर सकता। भारतीय न्याय संहिता (BNS) के लागू होने के बाद भी, पुराने मामलों में जो समझौते उच्च न्यायालय द्वारा प्रमाणित किए जा चुके हैं, उनकी पवित्रता बनी रहती है।

जहाँ तक ब्लैकमेलिंग का सवाल है, यदि कोई पक्ष पैसे की मांग कर रहा है और पुराने समझौते को तोड़ने की धमकी दे रहा है, तो यह 'जबरन वसूली' (Extortion) की श्रेणी में आ सकता है। कानून के अनुसार, समझौते के बाद मामला केवल तभी दोबारा खुल सकता है जब यह साबित हो जाए कि समझौता धोखाधड़ी (Fraud), दबाव या किसी गलत तथ्य के आधार पर किया गया था। केवल मन बदलने या अधिक पैसे की चाहत में समझौते को रद्द नहीं किया जा सकता।

आपको डरने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उच्च न्यायालय में दर्ज समझौता एक मजबूत साक्ष्य (Evidence) है। यदि दूसरा पक्ष आपको परेशान करना जारी रखता है, तो आप उनके खिलाफ स्थानीय पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करा सकते हैं या अपने वकील के माध्यम से अदालत को इस ब्लैकमेलिंग के बारे में सूचित कर सकते हैं। अदालत के आदेश की अवहेलना करना या समझौते के बाद दूसरे पक्ष को डराना न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) भी माना जा सकता है।

150 votes

एक बार किसी भी अदालत में पार्टियों के बीच एक समझौता हो गया और अदालत ने समझौते के आलोक में डिक्री पारित कर दी, जो सभी पक्षों पर बाध्यकारी है। यदि पार्टियों के बीच कार्रवाई का कोई कारण उत्पन्न होता है या कोई भी पक्ष समझौते का अनुपालन नहीं करता है, तभी वे कार्यवाही शुरू कर सकते हैं।

331 votes

नहीं, वे मामले को इस तरह वापस नहीं ला सकते। एक बार जब कोई पार्टी समझौता कर लेती है, तो वह नियमों और शर्तों से बंध जाती है। और यदि कोई पक्ष चूक करता है, तो दूसरा पक्ष तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर दीवानी और आपराधिक मामला दर्ज कर सकता है।

302 votes

अगर दोनों पक्षों के बीच एक बार हाई कोर्ट की अलग समझ हो गई है और लोवर कोर्ट की कार्यवाही खत्म हो गई है, तो फिर दुबारा से कोई भी केस रिओपन नहीं हो सकता है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थियों में केस रिओपन भी हो सकता है। रिओपन होना या ना होना यह स्थायी है कि पक्षकारो के बीच पूर्व में हुए समझोते की पीटीशन में क्या लिखा था कि क्यों वो समझोता किसी शर्त के लायक नहीं था या बिना शर्त था l अगर समझ शर्त के लायक था और शर्त पुरी की नहीं जा रही थी है तो केस रिओपन हो सकता है l

112 votes

यदि समझौता करने वाला कोई भी पक्ष समझौते की शर्तों का उल्लंघन करता है तो दूसरा पक्ष हमेशा सक्षम न्यायालय के समक्ष आवेदन करने के लिए स्वतंत्र होता है। लेकिन अगर आपकी पार्टी ने किसी भी शर्त का उल्लंघन नहीं किया है तो उस स्थिति में आपके लिए उपाय यह होगा कि आप संबंधित पुलिस स्टेशन के समक्ष एक आवेदन करें और सुरक्षा के लिए उसकी एक प्रति क्षेत्र के एसएसपी को यह सूचित करते हुए चिन्हित करें कि आप इस तरह दूसरे पक्ष द्वारा धमकी दी जा रही है।


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