BNSS Section 173 (CrPC 154): संज्ञेय अपराध में FIR दर्ज कैसे और कब होती है?


भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173, संज्ञेय अपराधों से संबंधित है, जिसमें पुलिस को सूचना दर्ज करने और जांच करने की प्रक्रिया शामिल है। आज इस लेख में हम आपको संज्ञेय यानि गंभीर अपराध की सूचना देने और उसकी शिकायत दर्ज होने की प्रक्रिया से जुडी इस धारा के बारे में पूरी जानकारी देंगे, कि बीएनएसएस की धारा 173 क्या है? इस धारा के तहत शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया क्या है? अगर पुलिस शिकायत न ले तो क्या कदम उठाए जा सकते हैं?

सीआरपीसी (CrPC) की धारा 154 कुछ पहले तक संज्ञेय अपराधों की शिकायत दर्ज करने के नियमों के बारे में बताती थी। इसमें शिकायत (FIR) तो तुरंत लिखी जाती थी, लेकिन शुरुआती जांच का कोई प्रावधान नहीं था। BNSS की धारा 173 नए कानून के आने के बाद से सीआरपीसी सेक्शन 154 की जगह ले चुकी है। जिसमें 3 से 7 साल की सजा वाले अपराधों के लिए 14 दिन की शुरुआती जांच का नया प्रावधान जोड़ा गया है।

इलेक्ट्रॉनिक शिकायत और महिलाओं के खिलाफ अपराधों के लिए भी इसमें विशेष नियम हैं। इसलिए इस लेख को पढ़कर आप न केवल अपने नए कानूनों के बारे में समझ पाएंगे, बल्कि जरूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल भी कर सकेंगे। तो आइए इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान को सरल भाषा में समझते है!


भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173 क्या है?

बीएनएसएस की धारा 173 बताती है कि जब कोई संज्ञेय अपराध (जिसमें पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तारी कर सकती है) होता है, तो उसकी जानकारी पुलिस को कैसे दी जाएगी और पुलिस को उसका रिकॉर्ड कैसे रखना होगा।

इस धारा में कुल चार उपधाराएँ हैं, जो अलग-अलग परिस्थितियों और प्रक्रिया को स्पष्ट करती हैं। आइए, अब इन चारों उपधाराओं को सरल भाषा में एक-एक कर विस्तार से समझते हैं।

BNSS 173 (1) – संज्ञेय अपराध की सूचना देने की प्रक्रिया

उपधारा 173 (1) के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को किसी संज्ञेय अपराध (जैसे हत्या, अपहरण, बलात्कार आदि) की जानकारी मिलती है, तो वह इस अपराध की सूचना पुलिस को दो तरीकों से दे सकता है – मौखिक रूप से या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से।

(i) मौखिक रूप से सूचना देना:

अगर कोई व्यक्ति पुलिस स्टेशन जाकर अपराध के बारे में बताता है, तो पुलिस अधिकारी उसकी बात को लिख लेगा और उसे अच्छे से पढ़कर सुनाएगा ताकि कोई गलती न हो। इसके बाद जब शिकायत करने वाला व्यक्ति इस बात के लिए बोल देगा कि जो लिखा गया है वह सही है, तभी वह शिकायत दर्ज मानी जाएगी।

(ii) इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना देना:

भारतीय न्याय संहिता की धारा 173 के तहत, अगर कोई व्यक्ति ईमेल, मोबाइल ऐप, या किसी डिजिटल तरीके से संज्ञेय अपराध (जैसे चोरी, मारपीट) की सूचना पुलिस को देता है, तो उसे कुछ जरूरी कदम उठाने होते हैं। इसे आसान शब्दों में समझते हैं:

  1. सूचना देना: आप अपराध की जानकारी ईमेल, पुलिस के मोबाइल ऐप, या किसी अन्य ऑनलाइन तरीके से पुलिस को भेज सकते हैं।
  2. तीन दिन का समय: सूचना भेजने के बाद, आपको 3 दिन के अंदर पुलिस स्टेशन जाकर उस सूचना को लिखित रूप में देना होगा और उस पर हस्ताक्षर करना होगा।
  3. रिकॉर्ड में दर्ज: जब आप हस्ताक्षर कर देंगे, तभी पुलिस आपकी सूचना को आधिकारिक रूप से रिकॉर्ड में दर्ज करेगी। इसके बिना सूचना को पूरा नहीं माना जाएगा।
  4. पुलिस का रजिस्टर: हस्ताक्षर के बाद, पुलिस आपकी सूचना को एक खास रजिस्टर में लिखेगी, जैसा कि सरकार का नियम हैं।

(iii) महिला से संबंधित अपराधों के लिए विशेष प्रक्रिया:

अगर कोई महिला किसी ऐसे अपराध की शिकायत करती है जो भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 64 से 79 या धारा 124 ((जैसे यौन उत्पीड़न, बलात्कार, या घरेलू हिंसा, ) के तहत आता है, तो यह जरूरी है कि उसकी तो उसकी शिकायत महिला पुलिस अधिकारी ही लिखेगी।

उदाहरण के लिए: अगर किसी महिला के साथ यौन उत्पीड़न हुआ है, तो वह महिला थाने जाकर शिकायत करेगी और उसकी रिपोर्ट महिला अधिकारी द्वारा दर्ज की जाएगी।

BNSS 173 (2) – शिकायत की कॉपी मुफ्त में प्राप्त करना

जब पुलिस अपराध की जानकारी लिख लेती है, तो उसकी एक कॉपी तुरंत और बिना कोई पैसा लिए व्यक्ति को दी जाएगी, जिसने जानकारी दी या जो पीड़ित है। यह कॉपी इसलिए दी जाती है ताकि व्यक्ति के पास सबूत रहे कि उसकी शिकायत दर्ज हो गई है।

उदाहरण के लिए: अगर राजेश ने अपने पड़ोसी द्वारा की गई मारपीट की शिकायत दर्ज कराई है, तो पुलिस को राजेश को उसकी एफआईआर की कॉपी मुफ्त में देनी होगी।

BNSS 173 (3) – प्रारंभिक जांच करने की प्रक्रिया

इस उपधारा में बताया गया है कि जब पुलिस को किसी ऐसे संज्ञेय अपराध की सूचना मिलती है जिसकी सजा तीन साल से अधिक है, लेकिन सात साल से कम है, तो पुलिस तुरंत FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच कर सकती है।

लेकिन इस जांच के लिए थाना प्रभारी (SHO) को अपने से बड़े अधिकारी, यानी पुलिस उपाधीक्षक (DSP) से अनुमति लेनी होगी। यह जांच अधिकतम 14 दिनों के अंदर पूरी करनी होती है ताकि यह तय किया जा सके कि मामला वास्तव में गंभीर है या नहीं।

यदि जांच में लगता है कि मामला सही है, तो पुलिस आगे की जांच शुरू करती है और FIR दर्ज की जाती है। यदि सबूत नहीं मिलते, तो मामले को बंद किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए: अगर किसी ने शिकायत की कि उसे फोन पर जान से मारने की धमकी दी गई है, तो पुलिस पहले यह जांच कर सकती है कि वह फोन सच में आया था या नहीं, फोन किसने किया, क्या सबूत हैं आदि।

BNSS 173 (4) – शिकायत दर्ज न होने की स्थिति में क्या करें

यह उपधारा उन लोगों के लिए बहुत उपयोगी है जिनकी शिकायत पुलिस दर्ज नहीं करती। अगर थाना प्रभारी किसी संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करने से मना कर देता है, तो शिकायतकर्ता उस सूचना को लिखित रूप में जिला या क्षेत्र के पुलिस अधीक्षक (SP) को भेज सकता है। यह सूचना डाक से भी भेजी जा सकती है।

अगर पुलिस अधीक्षक को लगता है कि वाकई में कोई अपराध हुआ है, तो वह दो काम कर सकता है,या तो वह खुद जांच शुरू करेगा, या फिर अपने किसी अन्य अधिकारी को जांच का आदेश देगा। जिस अधिकारी को जांच सौंपी जाती है, उसके पास उसी तरह की सभी कानूनी शक्तियाँ होती हैं जैसी थाने के प्रभारी के पास होती हैं।

उदाहरण के लिए: सीमा ने जब अपने पड़ोस में हुए छेड़छाड़ के मामले की शिकायत दर्ज करानी चाही, तो थाना प्रभारी ने रिपोर्ट लेने से इनकार कर दिया। तब सीमा ने यह बात एक चिट्ठी के रूप में पुलिस अधीक्षक को भेजी। एसपी ने खुद मामले की जांच शुरू की और फिर केस दर्ज हुआ।


बीएनएसएस​ की धारा 173 के तहत संज्ञेय अपराध क्या होते हैं?

संज्ञेय अपराध वे गंभीर अपराध होते हैं, जिनमें पुलिस को तुरंत कार्रवाई करने की ताकत होती है। इन अपराधों में पुलिस बिना किसी वारंट (अदालत के आदेश) के अपराधी को गिरफ्तार कर सकती है और जांच शुरू कर सकती है। आसान शब्दों में, ये ऐसे अपराध हैं जिन्हें कानून बहुत गंभीर मानता है।

संज्ञेय अपराध के कुछ उदाहरण इस प्रकार है:


पुलिस द्वारा पहले शुरुआती जाँच करने का नया नियम क्या है?

बीएनएसएस 173 के तहत कुछ विशेष मामलों में पुलिस शिकायत की पूरी जांच शुरू करने से पहले पहलें जांच (प्रारंभिक जांच या शुरुआती जाँच) कर सकती है। आइये इसे आसान हिंदी में समझते हैं:

1. कब होती है शुरुआती जांच?

अगर कोई अपराध ऐसा है, जिसकी सजा 3 साल से ज्यादा लेकिन 7 साल से कम की हो, तो पुलिस पहले यह देख सकती है कि शिकायत में दम है या नहीं।

उदाहरण: कुछ मामलों में मारपीट, धोखाधड़ी, या छोटे स्तर की चोरी जैसे अपराध।

2. इजाजत कौन देता है?

पुलिस स्टेशन का अधिकारी इस जांच को शुरू करने से पहले पुलिस उपाधीक्षक से लिखित इजाजत लेगा। बिना इजाजत के यह जांच नहीं हो सकती।

3. कितने दिन में जांच पूरी होगी?

पुलिस को यह जांच 14 दिन के अंदर पूरी करनी होगी। इस दौरान पुलिस यह पता लगाएगी कि शिकायत सही है और क्या उसमें आगे जांच की जरूरत है।

4. अगर शिकायत सही लगे तो?

अगर पहले जांच में पुलिस को लगता है कि शिकायत में अपराध का मामला बनता है, तो वह पूरी जांच शुरू करेगी, जैसा कि कानून में बताया गया है। पूरी जांच में पुलिस सबूत इकट्ठा करेगी, गवाहों से बात करेगी, और मामले को आगे बढ़ाएगी।

5. अगर शिकायत गलत लगे तो?

अगर पहले जांच में पुलिस को लगता है कि कोई अपराध नहीं हुआ, तो वह जांच को बंद कर सकती है। लेकिन उसे इसका कारण लिखना होगा।

यह नियम क्यों जरूरी है?

  • यह जांच इसलिए होती है ताकि छोटे-मोटे या झूठे मामलों में पुलिस का समय बर्बाद न हो।
  • साथ ही, यह सुनिश्चित करता है कि सही मामलों में जल्दी और सही कार्रवाई हो।
  • यह नियम पुलिस को निष्पक्ष तरीके से काम करने में मदद करता है।


निष्कर्ष:- बीएनएसएस की धारा 173 संज्ञेय अपराधों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया को आसान बनाती है। यह धारा देश के हर नागरिक को उनके अधिकारों व सुरक्षा उपायों के बारे में जानकारी देती है यह कानून हमें सिखाता है कि शिकायत दर्ज करना हमारा हक है, और कोई भी हमें इससे वंचित नहीं कर सकता।



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बीएनएसएस धारा 173 पर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल


बीएनएसएस की धारा 173 क्या है?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173 एक कानून है जो बताता है कि संज्ञेय अपराध (जैसे चोरी, मारपीट, या महिलाओं के खिलाफ अपराध) की शिकायत पुलिस में कैसे दर्ज होगी। यह शिकायत करने की प्रक्रिया को आसान और निष्पक्ष बनाती है।



धारा 173 के तहत पुलिस में शिकायत कैसे दर्ज कर सकते हैं?

आप शिकायत दो तरह से दर्ज कर सकते हैं:

  • बोलकर: पुलिस स्टेशन जाकर अपराध के बारे में बताएं। पुलिस उसे लिखेगी और आपको पढ़कर सुनाएगी।
  • मैसेज/ईमेल से: आप अपराध की जानकारी मैसेज या ईमेल से भेज सकते हैं, लेकिन 3 दिन में पुलिस स्टेशन जाकर हस्ताक्षर करना होगा।


अगर पुलिस नियमों के अनुसार शिकायत दर्ज करने से मना करें तो क्या करें?

अगर पुलिस शिकायत नहीं लिखती, तो अपनी शिकायत को लिखित रूप में तैयार करें। इसे डाक से पुलिस अधीक्षक (SP) को भेजें। जिसके बाद पुलिस अधीक्षक जांच का आदेश दे सकता है।



क्या हर शिकायत की तुरंत जांच शुरू होती है?

अगर अपराध की सजा 3 से 7 साल तक की है, तो पुलिस पहले 14 दिन में यह जांच सकती है कि मामला सही है या नहीं। इसके लिए पुलिस उपाधीक्षक की इजाजत चाहिए। अगर मामला सही है, तो पूरी जांच शुरू होगी।