फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या हैं? गठन, केस चलने के नियम, प्रक्रिया और लाभ
फास्ट ट्रैक कोर्ट (Fast Track Court) ऐसी विशेष अदालतें होती हैं जिन्हें गंभीर और लंबे समय से लंबित मामलों का जल्दी फैसला करने के लिए बनाया गया है। भारत में इन अदालतों की शुरुआत इसलिए की गई ताकि रेप, बच्चों के खिलाफ अपराध (पॉक्सो एक्ट), हत्या और महिलाओं से जुड़े मामलों में पीड़ितों को सालों इंतज़ार न करना पड़े।
सीधी भाषा में समझें तो जहां सामान्य अदालतों में केस लंबा चल सकता है, वहीं फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई तेज़ी से होती है और कोशिश की जाती है कि तय समय के भीतर फैसला हो। इन अदालतों का उद्देश्य न्याय में देरी कम करना और पीड़ितों को समय पर राहत देना है।
इस लेख में हम जानेंगे कि फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या होता है (Fast Track Court Meaning in Hindi), इसे क्यों बनाया गया, इसके फायदे क्या हैं, फास्ट ट्रैक कोर्ट और सेशन कोर्ट में क्या अंतर है, और इसमें केस चलने की प्रक्रिया और नियम क्या होते हैं।
विषयसूची
- फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या हैं (What is Fast Track in Hindi)?
- फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन का संक्षिप्त इतिहास
- फास्ट ट्रैक कोर्ट की पुनःस्थापना - आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम 2013
- फास्ट ट्रैक कोर्ट का उद्देश्य
- फास्ट ट्रैक कोर्ट में केस चलने के फायदे
- फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए चुनौतियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या हैं (What is Fast Track in Hindi)?
फास्ट ट्रैक कोर्ट स्पेशल न्यायालय हैं, जिनका उद्देश्य यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम 2012, महिलाओं के साथ यौन अपराध, घरेलू हिंसा, दहेज निषेध अधिनियम और सांसदों और विधायकों से संबंधित कुछ अन्य विशेष मामलों में तेज़ सुनवाई तथा न्याय सुनिश्चित करना है।
फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालयों की स्थापना आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम 2018 के उद्देश्यों को पूरा करने के संबंध में भारत की केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित एक योजना है जो विधि एवं न्याय मंत्रालय द्वारा अमल में लायी गई। इन अदालतों का गठन केंद्र या राज्य सरकार की योजना और संबंधित हाई कोर्ट की न्यायिक व्यवस्था के अनुसार किया जा सकता है।
फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन का संक्षिप्त इतिहास
- वर्ष 2000 में भारत के 11वें वित्तीय आयोग ने शीघ्र सुनवाई और न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से देश भर में 1734 फास्ट ट्रैक कोर्ट (एफटीसी) के निर्माण की योजना प्रस्तावित की।
- वित्त आयोग की सिफारिश पर वित्त मंत्रालय ने पूरे भारत में फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन के लिए धन आवंटित किया।
- उच्च न्यायालयों के परामर्श से फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकार को दी गई।
- परिणामस्वरूप पूरे देश में फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित किए गए।
- 2011 में केन्द्र सरकार ने फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए फंडिंग बंद कर दी।
- 2012 में इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यह राज्यों पर निर्भर है कि वे अपनी वित्तीय स्थिति के आधार पर फास्ट ट्रैक अदालतों को जारी रखें या बंद करें।
फास्ट ट्रैक कोर्ट की पुनःस्थापना - आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम 2013
2012 के दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामले की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद न्यायमूर्ति वर्मा समिति की सिफारिशों पर महिलाओं के साथ यौन अपराध और पोक्सो अधिनियम से संबंधित मामलों से निपटने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की योजना को एक बार फिर से अमल मे लाया गया और देश भर में फास्ट-ट्रैक न्यायालयों की पुनःस्थापना की गई।
फास्ट ट्रैक कोर्ट का उद्देश्य
- शीघ्र सुनवाई: फास्ट ट्रैक अदालतों का पहला और सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य शीघ्र सुनवाई सुनिश्चित करना है, जबकि सामान्य अदालत में सुनवाई में देरी हो सकती है।
- लंबित मामलों की निस्तारण: देश के अधिकांश न्यायालय लंबित मुकदमों के बोझ तले दबे हुए हैं, फास्ट ट्रैक अदालतों की स्थापना का एक प्रमुख कारण इन मुकदमों का प्राथमिकता पर निस्तारण करना है।
- निर्धारित समय के भीतर निर्णय सुनाना: फास्ट ट्रैक न्यायालय संबंधित उच्च न्यायालयों द्वारा निर्धारित समय के भीतर मामलों की सुनवाई पूरी करने और निर्णय सुनाने के लिए बाध्य हैं।
फास्ट ट्रैक कोर्ट में केस चलने के फायदे
- लंबित मामलों की संख्या में कमी: सीमित संसाधनों के बावजूद फास्ट ट्रैक कोर्ट लंबित मामलों की संख्या कम करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रभावी और कुशलतापूर्वक काम कर रहे हैं।
- पीड़ितों को बिना किसी देरी के न्याय सुनिश्चित करना: न्याय में देरी के पुराने चलन को तोड़ना, जिसके बारे में हम सभी ने सुना है कि "एक बार जमानत मिल जाए, फिर केस लड़ते रहो अदालतों में कुछ नहीं होता” लेकिन अब फास्ट ट्रैक कोर्ट ने यह स्थिति बदल दी है।
- विचाराधीन कैदियों के लिए वरदान: लंबित मामलों की वजह से जेलों में विचाराधीन कैदियों की बाढ़ आ गई है, जो निर्धारित सजा से अधिक समय कारावास में बिता चुके हैं, जिसके लिए वे मुकदमे का सामना कर रहे हैं। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों में कहा है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 यह गारंटी देता है कि इसलिए शीघ्र सुनवाई और निष्पक्ष न्याय प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है।
फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए चुनौतियाँ
- उचित व्यवस्था का अभाव: हमारे न्यायालयों में कार्य करने की स्थितियां अच्छी नहीं हैं तथा न्यायिक अधिकारियों को दिन-प्रतिदिन की चुनौतियों से निपटने के लिए कोई उचित बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं कराया जाता है।
- न्यायालयों की कमी: भारत में लंबित मामलों से निपटने के लिए अधिक से अधिक संख्या में फास्ट ट्रैक अदालतें स्थापित की जानी चाहिए।
- काम का अत्यधिक बोझ: आमतौर पर हमारे देश में अदालतें काम के बोझ से दबी रहती हैं और फास्ट ट्रैक अदालतें भी इसका अपवाद नहीं हैं, जिसके परिणामस्वरूप वे अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में विफल रहती हैं।
- न्यायाधीशों की कमी: जजों की कमी है, बिना देरी के न्याय देने के लिए न्यायपालिका को पूरे भारत में जजों के रिक्त पदों पर भर्ती करनी चाहिए।
- तकनीकी सहायता का अभाव: यद्यपि अनेक प्रयास किए गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर न्यायालयों को तकनीकी सहायता प्रदान करने की दिशा में कोई प्राथमिकता नहीं है। तकनीकी सहायता के अभाव में न्यायालय आज के तकनीकी युग में व्यवस्थित तरीके से काम करने में असमर्थ हैं।
अगर आप किसी फास्ट ट्रैक कोर्ट में चल रहे केस, महिला अपराध या रेप केस से जुड़े कानूनी सलाह चाहते हैं, तो नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके हमारे अनुभवी वकीलों से अभी बात करे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
किसी मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में कैसे ट्रान्सफर किया
फास्ट ट्रैक कोर्ट केवल विशेष मामलों की सुनवाई के लिए स्थापित किए गए हैं, सामान्य मामलों को उनमें स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। हालाँकि, यदि आप अपने मामले की जल्दी सुनवाई चाहते हैं तो आप अपने मामले की जल्दी सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सकते हैं, उच्च न्यायालय ट्रायल कोर्ट को मुकदमे को शीघ्रता से पूरा करने का निर्देश दे सकता है।
फास्ट ट्रैक कोर्ट में किन मामलों की सुनवाई होती है?
महिलाओं और बच्चों के साथ यौन अपराधों से संबंधित मामले, दहेज निषेध अधिनियम, घरेलू हिंसा अधिनियम, वरिष्ठ नागरिकों से संबंधित मामले और 5 साल से लंबित पुराने मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट (एफ.टी.सी.) में होती है।
फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुक़दमा कितने समय तक चलता है?
फास्ट ट्रैक कोर्ट उच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित समय सीमा के भीतर काम करने के लिए बाध्य होते हैं, और संभवतः फास्ट ट्रैक न्यायालय द्वारा मुकदमे की सुनवाई 2 से 3 वर्षों के भीतर कर दी जाती है।
क्या फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए अलग से वकील रखना पड़ता है?
नहीं, यह सामान्य अदालतों की तरह ही होती हैं। आप चाहे तो सरकारी वकील (Public Prosecutor) या अपना निजी वकील रख सकते हैं।