लोकसभा और राज्यसभा में अंतर - कार्य, शक्तियां, सदस्य, सीट और निर्वाचन
लोकसभा और राज्यसभा भारतीय संसद के दो सदन हैं, जिनमें मुख्य अंतर यह है कि लोकसभा जनता का सदन है, जबकि राज्यसभा राज्यों का सदन है। लोकसभा के सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं, जबकि राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव राज्य विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा किया जाता है। इन दोनों के कार्यो और शक्तियों में भी कुछ अंतर होते है।
इस लेख में हम आसान भाषा में जानेंगे कि लोकसभा और राज्यसभा क्या हैं, दोनों में क्या अंतर है, कुल सदस्यों की संख्या कितनी होती है, चुनाव और योग्यता क्या है, कार्यकाल कितना होता है, और संसद के दोनों सदनों की शक्तियां और कार्य क्या हैं।
विषयसूची
- राज्य सभा और लोकसभा क्या है - दोनों सदनों में अंतर
- लोक सभा और राज्य सभा के सदस्यों के निर्वाचन की प्रक्रिया
- लोक सभा और राज्य सभा के कार्य और शक्तियां
- लोकसभा और राज्यसभा में सदस्यों की कुल संख्या (सीट)
- लोकसभा सदस्यों का चुनाव कैसे होता है?
- राज्य सभा सदस्यों का चुनाव कैसे होता है?
- लोक सभा और राज्य सभा की सदस्यता के लिए योग्यता
- लोकसभा और राज्यसभा सदस्यता के लिए अयोग्यता
- लोकसभा और राज्य सभा का कार्यकाल
- राज्य सभा और लोक सभा का सत्र
- कानून बनाने की शक्ति
- राष्ट्रपति को उनके पद से हटाने की शक्ति
- सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों को पद से हटाने की शक्ति
- राज्य के उच्च पदस्थ अधिकारियों को हटाने की शक्ति
- राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव करने की शक्ति
- लोक सभा की विशेष शक्तियाँ
- राज्य सभा की विशेष शक्तियाँ
- लोकसभा और राज्यसभा की सामान्य शक्तियाँ
- लोकसभा और राज्यसभा के बीच अंतर
राज्य सभा और लोकसभा क्या है - दोनों सदनों में अंतर
- लोक सभा: लोक सभा को जनता का सदन भी कहा जाता है क्योंकि इसके सदस्य भारत के लोगों द्वारा चुने जाते हैं, यह कहना गलत नहीं होगा कि यह सीधे तौर पर भारत के नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है, स्पीकर महोदय लोकसभा के अध्यक्ष होते है।
- राज्य सभा: दूसरी ओर, राज्य सभा को उच्च सदन या राज्यों की परिषद के रूप में भी जाना जाता है राज्य सभा के सदस्यों का चुनाव विधान सभा के सदस्यों द्वारा वोटिंग प्रणाली से किया जाता है, भारत के उपराष्ट्रपति राज्य सभा के सभापति होते है।
लोकसभा और राज्यसभा में सदस्यों की कुल संख्या (सीट)
- लोकसभा में सदस्यों की कुल सीटें: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 81(1) के अनुसार सदस्यों की लोकसभा में सदस्यों की कुल संख्या 550 है, जिनमें से 530 सदस्य राज्यों के लोगों द्वारा वोटों के माध्यम से चुने जाते हैं, 20 सदस्य संघ शासित प्रदेशों के लोगों द्वारा चुने जाते हैं अनुच्छेद 81(1) के प्रावधान अनुच्छेद 331 के प्रावधानों के अधीन हैं जिसके अनुसार राष्ट्रपति एंग्लो-इंडियन समुदाय के दो सदस्यों को नामांकित कर सकते हैं यदि उनकी राय में उस समुदाय का लोकसभा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
- राज्य सभा में सदस्यों की कुल सीटें: अनुच्छेद 80(3) के अनुसार राज्य सभा की अधिकतम सदस्य संख्या 250 निर्धारित की गई है, जिनमें से 12 राष्ट्रपति द्वारा नामांकित किए जाएंगे तथा शेष 238 सदस्य राज्यों और संघ शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि होंगे।
लोक सभा और राज्य सभा के सदस्यों के निर्वाचन की प्रक्रिया
लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों के चुनाव की प्रक्रिया एक दूसरे से पूरी तरह भिन्न है, जिसे नीचे सरल बिंदुओं में समझाया गया है:
लोकसभा सदस्यों का चुनाव कैसे होता है?
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार लोकसभा के सदस्य (राज्यों के प्रतिनिधि) राज्य की जनता द्वारा वोटिंग के आधार पर प्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं
- भारत का प्रत्येक नागरिक, चाहे वह पुरुष हो या महिला, जो 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का हो और जो मानसिक विकृति, अपराध और भ्रष्टाचार के आधार पर मतदान के लिए अयोग्य न ठहराया गया हो, लोकसभा चुनाव में वोट डालने का हकदार है।
- प्रत्येक मतदाता को अपने निर्वाचन क्षेत्र से अपनी पसंद के किसी भी उम्मीदवार को चुनने के लिए अपना वोट देने का अधिकार है।
- चुनाव में सबसे अधिक वोट प्राप्त करने वाला उम्मीदवार लोकसभा में अपने निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है।
राज्य सभा सदस्यों का चुनाव कैसे होता है?
- राज्य सभा के सदस्यों (राज्यों के प्रतिनिधि) का चुनाव विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा एक व्यक्ति एक वोट प्रणाली से किया जाता है।
- केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों का चयन संसद द्वारा निर्धारित तरीके से किया जाता है।
- संविधान के अनुच्छेद 80(3) के अनुसार 12 नॉमिनेटिड व्यक्तियों का चयन राष्ट्रपति द्वारा साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्तियों में से किया जाता है।
- नॉमिनेटिड व्यक्ति भारत के राष्ट्रपति के चुनाव में भाग नहीं लेते हैं।
जाने - भारतीय संविधान की प्रस्तावना और विशेषताएं
लोक सभा और राज्य सभा की सदस्यता के लिए योग्यता
संसद सदस्य बनने के लिए व्यक्ति को:
- भारत का नागरिक होना चाहिए;
- राज्य सभा की सदस्यता के लिए उसकी आयु 30 वर्ष होनी चाहिए;
- लोकसभा के मामले में उसकी आयु 25 वर्ष होनी चाहिए;
- संसद द्वारा निर्धारित अन्य योग्यताएं रखना;
- अनुच्छेद 84 के अनुसार, उसे संविधान की तीसरी अनुसूची में इस आशय के लिए निर्धारित फारम के अनुसार चुनाव आयोग द्वारा इस खातिर अधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष शपथ लेनी होगी;
- संविधान में संसद की सदस्यता के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता निर्धारित नहीं की गई है।
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार किसी व्यक्ति का नाम किसी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता के रूप में पंजीकृत होना आवश्यक है।
लोकसभा और राज्यसभा सदस्यता के लिए अयोग्यता
संविधान के अनुच्छेद 102 के अनुसार कोई व्यक्ति संसद का सदस्य होने के लिए अयोग्य हो जाता है यदि:
- यदि वह केन्द्रीय या राज्य सरकार के अधीन कोई लाभ का पद धारण करता है, सिवाय ऐसे पद के जो संसदीय कानून द्वारा उसे अयोग्य नहीं बनाता।
- केन्द्र या राज्य सरकार के किसी मंत्री को लाभ का पद धारण करने वाला नहीं माना जाता।
- यदि किसी सक्षम न्यायालय ने उसे मानसिक तौर पर अस्वस्थ घोषित कर दिया है।
- यदि उसे आधिकारिक तौर पर दिवालिया घोषित कर दिया हो।
- यदि वह भारत का नागरिक नहीं है।
- यदि उसे संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के तहत अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।
- इस आशय से संसद ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में आवश्यक अयोग्यताएं निर्धारित की हैं।
लोकसभा और राज्य सभा का कार्यकाल
लोकसभा का कार्यकाल
- आम तौर पर लोकसभा का कार्यकाल पाँच साल का होता है।
- पर आपातकाल के दौरान लोकसभा का कार्यकाल एक वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है।
- आपातकाल समाप्त होने के छह महीने के भीतर लोकसभा के लिए नए चुनाव होने आवश्यक है।
- प्रधानमंत्री की सलाह पर या जब कोई भी पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में न हो राष्ट्रपति किसी भी समय लोकसभा को भंग कर सकते हैं।
- इस मामले में भी, छह महीने के भीतर एक नई लोकसभा का चुनाव अनिवार्य रूप से होना चाहिए।
राज्य सभा का कार्यकाल
- राज्य सभा एक स्थायी सदन है।
- राज्य सभा के प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष का होता है।
- केवल रिक्त सीटों के लिए ही चुनाव होते हैं।
- इसके एक-तिहाई सदस्य हर दो साल बाद सेवानिवृत्त होते हैं।
जाने - राष्ट्रपति के कार्य और शक्तियां
राज्य सभा और लोक सभा का सत्र
राज्य सभा का सत्र
- राष्ट्रपति आमतौर पर लोकसभा के सत्रों के साथ ही राज्यसभा के सत्र बुलाते हैं या जब भी उन्हें आवश्यक लगता है।
- हालाँकि, राज्यसभा के दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं हो सकता है।
- राष्ट्रपति उस समय आपातकालीन घोषणा को मंजूरी देने के लिए राज्यसभा का विशेष सत्र बुला सकते हैं जब लोकसभा भंग हो।
लोक सभा का सत्र
- राष्ट्रपति किसी भी समय संसद का सत्र बुला सकते हैं,
- लेकिन संसद की दो बैठकों के बीच छह महीने से अधिक का अंतराल नहीं हो सकता।
- इसका मतलब है कि एक वर्ष में लोकसभा के कम से कम दो सत्र आवश्यक हैं।
लोक सभा और राज्य सभा के कार्य और शक्तियां
लोकसभा सरकार बनाने और गिराने में अहम भूमिका निभाती है और धन विधेयक (Money Bill) जैसे मामलों में ज्यादा ताकत रखती है। वहीं राज्यसभा एक स्थायी सदन है, यह कभी भंग नहीं होती और राज्यों के हितों की आवाज संसद तक पहुंचाती है। राज्य सभा और लोक सभा की महत्वपूर्ण शक्तियां निम्नलिखित है:
कानून बनाने की शक्ति
- एक साधारण विधेयक लोकसभा या राज्यसभा किसी में भी पेश किया जा सकता है पर लेकिन आमतौर पर इसे लोक सभा में ही प्रस्तुत किया जाता है।
- एक बार जब यह लोकसभा में पारित हो जाता है तो इसे राज्यसभा में भेजा जाता है।
- राज्य सभा से मंजूरी प्राप्त होने के बाद ही विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कर कानून बनता है।
- किसी विधेयक को कानून बनने के लिए यह आवश्यक है कि उसे संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित किया जाए।
- यदि लोक सभा द्वारा पारित विधेयक को राज्य सभा अस्वीकृत कर देती है, तो लोक सभा उस विधेयक पर पुनर्विचार करती है।
- यदि पुनर्विचार के बाद लोकसभा इसे पुनः पारित कर दे और फिर भी राज्यसभा इसे अस्वीकृत कर दे और मामला छह महीने तक अनसुलझा रहे।
- ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाते है जिसका निर्णय दोनों सदनों द्वारा स्वीकार किया जाता है।
राष्ट्रपति को उनके पद से हटाने की शक्ति
- राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग की कार्यवाही लोकसभा या राज्यसभा में की जा सकती है।
- राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए दोनों सदनों में सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से महाभियोग प्रस्ताव पारित करना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों को पद से हटाने की शक्ति
- लोकसभा और राज्यसभा मिलकर सुप्रीम कोर्ट या किसी राज्य हाई कोर्ट के किसी भी न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव पारित कर सकते हैं।
राज्य के उच्च पदस्थ अधिकारियों को हटाने की शक्ति
- दोनों सदन अर्थात लोकसभा और राज्यसभा उच्च पदस्थ अधिकारियों जैसे अटॉर्नी जनरल, मुख्य चुनाव आयुक्त और भारत के नियंत्रक एवं महालेखाकार परीक्षक को उनके पद से हटाने के लिए राष्ट्रपति के समक्ष संयुक्त प्रस्ताव प्रस्तुत कर सकते हैं।
राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव करने की शक्ति
- लोक सभा और राज्य सभा के सदस्य मिलकर भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव करते हैं।
लोक सभा की विशेष शक्तियाँ
- लोक सभा को राष्ट्रीय आपातकाल समाप्त करने के लिए प्रस्ताव पारित करने का अधिकार है।
- वित्त संबंधी विधेयक केवल लोक सभा द्वारा पारित किए जा सकते है।
- यहां तक कि वित्त और राजस्व से संबंधित नीतियां भी लोकसभा की मंजूरी के बिना लागू नहीं की जा सकतीं।
- बजट केवल लोकसभा में पेश किया जा सकता है।
- धन विधेयक केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है।
- यदि राज्य सभा धन विधेयक पारित करने में विफल रहती है और विधेयक को प्रस्तुत करने की तिथि से 14 दिन बीत जाते हैं, तो धन विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है।
- धन विधेयक से संबंधित विवाद के मामले में, लोकसभा अध्यक्ष का निर्णय अंतिम होता है और इसे चुनौती नहीं दी जा सकती।
- नया कर लगाने, पुराने कर को समाप्त करने या मौजूदा करों में कोई भी परिवर्तन करने के लिए लोकसभा की स्वीकृति अनिवार्य है।
राज्य सभा की विशेष शक्तियाँ
- अखिल भारतीय सेवाओं के गठन का एकमात्र अधिकार राज्य सभा को है।
- इसी तरह, राज्य सभा किसी मौजूदा अखिल भारतीय सेवा को भंग भी कर सकती है।
- किसी भी संवैधानिक संशोधन के लिए स्वीकृति देने का अधिकार।
- राज्य सूची के विषय को राष्ट्रीय महत्व का विषय घोषित करने का अधिकार।
- समवर्ती (Concurrent) और संघ (Union) सूची पर कानून बनाने का अधिकार।
- जब लोकसभा भंग हो या सत्र में न हो तब राज्य सभा आपातकाल की घोषणा को स्वीकृति देने ई अधिकार।
लोकसभा और राज्यसभा की सामान्य शक्तियाँ
निम्नलिखित मामलों में लोकसभा और राज्यसभा की शक्ति सामान्य हैं:
- राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेशों को मंजूरी।
- दो या अधिक राज्यों के लिए संयुक्त लोक सेवा आयोग की स्थापना।
- संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों की योग्यता में परिवर्तन करता है।
- राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन, नए राज्यों का निर्माण, तथा किसी राज्य के नाम में परिवर्तन।
- संसद सदस्यों के वेतन और भत्ते में संशोधन।
- किसी राज्य विधानमंडल के ऊपरी सदन को समाप्त करने या बनाने के लिए प्रस्ताव पारित करना।
- सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में परिवर्तन।
- आपातकाल की घोषणा को स्वीकृति देना।
लोकसभा और राज्यसभा के बीच अंतर
लोकसभा और राज्यसभा के बीच निम्नलिखित अंतर है:
- कार्य के आधार पर: लोकसभा नए कानून बनाती है और विधेयक पारित करती है जबकि राज्य सभा राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के अधिकारों की रक्षा करती है।
- प्रतिनिधित्व के आधार पर: लोकसभा भारत के लोगों का प्रतिनिधित्व करती है जबकि राज्यसभा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करती है।
- सदन के मुख्य प्रतिनिधि के आधार पर: स्पीकर महोदय लोक सभा के अध्यक्ष और मुख्य प्रतिनिधि होता है; जबकि भारत के उपराष्ट्रपति राज्यसभा सभापति और मुख्य प्रतिनिधि होते है।
- कार्यकाल के आधार पर: लोक सभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है जबकि राज्य सभा संसद का स्थायी सदन है जिसका कोई निश्चित कार्यकाल नहीं है।
- सदस्यों की संख्या के आधार पर: लोकसभा में सदस्यों की कुल संख्या 550 है जबकि राज्यसभा में 250 है।
- सदस्यता के लिए न्यूनतम आयु योग्यता के आधार पर: राज्य सभा का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 25 वर्ष है तथा राज्य सभा के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष है।
- चुनाव प्रक्रिया के आधार पर: लोकसभा के सदस्यों का चुनाव सीधे जनता द्वारा मतदान के माध्यम से किया जाता है, जबकि राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव विधानसभा सदस्यों के मतदान द्वारा किया जाता है।