एनआई एक्ट की धारा 138 क्या है? चेक बाउंस नोटिस भेजने के नियम, फॉर्मेट और सज़ा



एनआई एक्ट धारा 138 में चेक बाउंस नोटिस और सजा की जानकारी

निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 चेक बाउंस से संबंधित है और इसमें चेक जारी करने वाले व्यक्ति के खिलाफ सजा का प्रावधान है, यदि बैंक खाते में पर्याप्त राशि न होने पर चेक बाउंस हो जाता है। इस स्थिति में प्राप्तकर्ता चेक जारी करने वाले को नोटिस भेजता है, और यदि 15 दिनों के भीतर भुगतान नहीं किया जाता है, तो वह धारा 138 के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज कर सकता है।

इस लेख में हम आगे विस्तार से जानेंगे कि परक्राम्य लिखत अधिनियम (एन.आई. एक्ट) की धारा 138 क्या है? इस सेक्शन के तहत नोटिस भेजने के नियम, फॉर्मेट और पूरी प्रक्रिया। 


विषयसूची

  1. एन.आई. एक्ट की धारा 138 क्या है?
  2. एनआई एक्ट के तहत चेक बाउंस केस दर्ज करने की प्रक्रिया क्या है?
  3. चैक क्या होताहै?
  4. चैक बाउंस कब होता है?
  5. चैक बाउंस होने पर एनआई एक्ट की धारा 138 कब लगती है?
  6. चैक बाउंस या चैक अस्वीकृत होने के कारण
  7. चैक बाउंस के लिए डिमांड नोटिस क्या है?
  8. चैक बाउंस के मामले में डिमांड नोटिस कब भेजा जाता है?
  9. चेक बाउंस केस दर्ज करने के लिए आवश्यक दस्तावेज
  10. चेक बाउंस का मामला कहां दर्ज किया जा सकता है?
  11. चैक बाउंस के लिए पुलिस शिकायत कैसे दर्ज करें?
  12. एनआई अधिनियम की धारा 138 प्रकृति में सिविल है या आपराधिक?
  13. एन.आई. अधिनियम की धारा 138 के अलावा चेक बाउंस के लिए अन्य विकल्प
  14. एन.आई. अधिनियम की धारा 143-ए के तहत शिकायतकर्ता को अंतरिम मुआवजा
  15. किसी कंपनी द्वारा चेक बाउंस होने पर निदेशक का दायित्व
  16. चेक बाउंस डिमांड नोटिस का ड्राफ्ट
  17. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Property Dispute



एन.आई. एक्ट की धारा 138 क्या है?

एन.आई. अधिनियम की धारा 138 में चैक बाउंस के लिए सजा का प्रावधान है। परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 (Negotiable Instrument Act 1881)  में धारा 138 को जोड़ना बैंकिंग, सार्वजनिक वित्तीय संस्थान और परक्राम्य लिखत (संशोधन) अधिनियम, 1988 का परिणाम था।

इस संशोधन का उद्देश्य देश में व्यापार, वाणिज्य और औद्योगिक गतिविधियों में वित्तीय लेनदेन को नियंत्रित करना और वित्तीय मामलों में सतर्कता बढ़ाने के लिए सख्त कानून लागू करना था।



चैक क्या होताहै?

चैक एक दस्तावेज है जो किसी व्यक्ति द्वारा अपने बैंक को उस व्यक्ति को भुगतान करने का निर्देश देता है जिसके नाम पर चैक जारी किया गया है।



चैक बाउंस कब होता है?

जब कोई चैक बिना भुगतान किए बैंक द्वारा वापस कर  दिया जाता है, तो इसे चैक बाउंस या अस्वीकृत चैक कहा जाता है। चैक बाउंस कई कारणों से हो सकता है जब चैक पहली बार बाउंस होता है, तो बैंक चैक बाउंस के कारणों के साथ 'चैक रिटर्न मेमो' जारी करता है।



चैक बाउंस होने पर एनआई एक्ट की धारा 138 कब लगती है?

एनआई अधिनियम की धारा 138 के अंतर्गत अपराध गठित करने के लिए निम्नलिखित आवश्यक तत्व हैं:

  • किसी व्यक्ति द्वारा किसी ऋण या अन्य देनदारी को पूर्णतः या आंशिक रूप से चुकाने के लिए किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में चैक जारी करना।
  • चैक को वैधता अवधि के भीतर बैंक में भुगतान के लिए प्रस्तुत किया जाना चाहिए, यानी चेक की तारीख से तीन महीने के भीतर।
  • चेक निम्नलिखित दो कारणों में से किसी एक कारण से अस्वीकृत होना चाहिए पहला बैंक खाते में अपर्याप्त धनराशि और दुसरा चेक का मूल्य बैंक के साथ किए गए करार द्वारा ऐसे खाते से भुगतान की जाने वाली राशि से अधिक है।
  • प्राप्तकर्ता (Payee) लिखित रूप में नोटिस के माध्यम से ड्रॉअर/इश्यूअर (Drawer) से मांग करता है चैक बाउंस की सूचना प्राप्त होने के 15 दिनों के भीतर चेक की  राशि का भुगतान किया जाए।
  • नोटिस प्राप्त होने के 15 दिनों के भीतर ड्रॉअर द्वारा  चैक की राशि का भुगतान ना करना।


चैक बाउंस या चैक अस्वीकृत होने के कारण

चेक बाउंस या अस्वीकृत होने के कई कारण हो सकते हैं जो की निम्नलिखित है:

  • चैक की वैधता समाप्ति: चैक जारी करने की तारीख से केवल 3 महीने तक ही वैध होता है। इस अवधि की समाप्ति के बाद, अगर चेक बैंक मे प्रस्तुत किया जाता है तो वह चेक बाउंस या अस्वीकृत हो जाता है।
  • बैंक खाता संख्या मे गलती: चैक पर बैंक खाता संख्या लिखने मे गलती करना।
  • शब्द और अंको मे अंतर: चेक पर लिखे गए शब्दों और अंकों में अंतर होना।
  • हस्ताक्षर नही मिलना: चेक पर किए गए हस्ताक्षर का बैंक के आधिकारिक दस्तावेजों से मेल नही खाना।
  • ओवर-राइटिंग : चेक पर स्पष्ट रूप से ओवर-राइटिंग करना।
  • बैंक खाता बंद करना: यदि खाता धारक ने अपना खाता बंद कर दिया है या बैंक ने स्वयं उसका खाता बंद कर दिया हो तो एसी परिस्थिति मे चैक बाउंस हो जाता है।
  • कंपनी की मोहर नहीं लगी होना: अगर कंपनी द्वारा चैक जारी किया गया है तो चैक कंपनी की मोहर ना होना।
  • ड्रॉअर/इश्यूअर का पागल हो जाना: ड्रॉअर/इश्यूअर का मानसिक तौर पर अस्वस्थ हो जाना।
  • ड्रॉअर/इश्यूअर का दिवालिया हो जाना: ड्रॉअर/इश्यूअर के दिवालिया हो जाने पर है बैंक के द्वारा चैक बाउंस या अस्वीकृत कर दिया जाता है।
  • ट्रस्ट के नियमों का पालन नहीं होना: ट्रस्ट के नियमों के विरुद्ध चेक जारी करना।
  • चेक की प्रमाणिकता पर संदेह: यदि बैंक को चेक की प्रमाणिकता पर संदेह है।
  • अपर्याप्त धनराशि: जब चेक जारी करने वाले के खाते में धनराशि पर्याप्त न हो।
 

एनआई एक्ट के तहत चेक बाउंस केस दर्ज करने की प्रक्रिया क्या है?

भारत में चेक बाउंस केस दर्ज करने की निम्नलिखित प्रक्रिया है:

  • बाउंस चेक जारी करने वाले व्यक्ति को डिमांड नोटिस भेजना।
  • इस नोटिस में बाउंस हुए चेक के बारे में सभी जानकारी शामिल होनी चाहिए, जैसे कि चेक जारी करने की तारीख, बाउंस चैक की संख्या आदि।
  • नोटिस प्राप्तकर्ता को भुगतान करने के लिए प्राप्ति की तारीख से 15 दिन का समय दें।
  • यदि नोटिस 15 दिन के भीतर चैक की राशि का भुगतान नही किया जाता है तो बैंक के क्षेत्र-अधिकार वाले मजिस्ट्रेट न्यायालय में मुकदमा दर्ज कराएं।
  • चैक बाउंस प्रार्थना पत्र के साथ शपथ-पत्र, मूल चेक और रिटर्न मेमो, नोटिस की प्रति और डाक रसीद व साक्ष्य- शपथ पत्र को भी संलग्न करें।
  • न्यायालय आपके द्वारा दाखिल किए गए प्रार्थना पत्र का विश्लेषण कर उस का संज्ञान लेगा।
  • संज्ञान लेने के बाद न्यायालय विपक्षी को अपने समक्ष उपस्थित करने के लिए समन जारी करेगा।
  • शिकायतकर्ता, अपने वकील की मदद से न्यायालय के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करेगा।
  • दोनों पक्षों के उपस्थित होने, साक्ष्यों और गवाहों के सामने आने के बाद, दोनों पक्षों के वकीलों द्वारा अंतिम दलीलें पेश की जाती हैं। यह आम तौर पर न्यायालय के निर्णय से पहले का अंतिम चरण होता है।
  • न्यायालय की कार्यवाही, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायालय निर्णय देता है।


चैक बाउंस के लिए डिमांड नोटिस क्या है?

एनआई अधिनियम की धारा 138 के तहत डिमांड नोटिस, चैक प्राप्तकर्ता द्वारा ड्रॉअर को चैक बाउंस की सूचना देने और चैक की राशि का भुगतान करने के लिए एक नोटिस है।



चैक बाउंस के मामले में डिमांड नोटिस कब भेजा जाता है?

डिमांड नोटिस बैंक से चेक बाउंस होने की सूचना मिलने की तारीख से 15 दिनों के भीतर भेजा जाना चाहिए।



चेक बाउंस केस दर्ज करने के लिए आवश्यक दस्तावेज

चेक बाउंस केस दर्ज करने के लिए निम्नलिखित दस्तावेजों की आवश्यकता होती है:
 

  1. मूल चेक और रिटर्न मेमो।
  2. नोटिस की प्रति और मूल डाक रसीदें।
  3. साक्ष्य हलफनामा (एफिडेविट)।
  4. आधार कार्ड।
  5. 2 पासपोर्ट आकार फोटो।
  6. वकालत- नामा।
  7. चेक बाउंस फ़ार्म।


चेक बाउंस का मामला कहां दर्ज किया जा सकता है?

चेक बाउंस का मामला उस न्यायालय में दाखिल करना चहिए  जिसके क्षेत्राधिकार मे वह बैंक स्थित है जिस में चैक भुगतान के लिए प्रस्तुत किया हो।



चैक बाउंस के लिए पुलिस शिकायत कैसे दर्ज करें?

यह जानना महत्वपूर्ण है कि भले ही चैक बाउंस भारत में अपराध हैं, लेकिन इस के लिए पुलिस रिपोर्ट करने का आवश्यकता नहीं है। इसके बजाय, संबंधित मजिस्ट्रेट न्यायालय में एन.आई. एक्ट की धारा 138 के तहत मुकदमा दर्ज करने का प्रावधान है। 



एनआई अधिनियम की धारा 138 प्रकृति में सिविल है या आपराधिक?

धारा 138 की प्रकृति में आपराधिक है हालांकि चेक बाउंस होने पर एनआई अधिनियम के अलावा भारतीय न्याय संहिता और सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत भी मुकदमा दर्ज किया जा सकता है।



एन.आई. अधिनियम की धारा 138 के अलावा चेक बाउंस के लिए अन्य विकल्प

चेक बाउंस के मामले में एन.आई. एक्ट की धारा 138 के अलावा निम्नलिखित वैकल्पिक उपचार है:

  1. चेक बाउंस होने पर सिविल मुकदमा : शिकायतकर्ता द्वारा बकाया राशि वसूलने के लिए  सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 37 के तहत मुकदमा भी दायर किया जा सकता है विशेषकर जब राशि छोटी हो।
  2. भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 के तहत आपराधिक मुकदमा : गंभीर मामलों में जहां चेक की राशि बड़ी हो और जहां यह लागू हो, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318 के तहत धोखाधड़ी के लिए आपराधिक मुकदमा भी दर्ज की जा सकती है।


एन.आई. अधिनियम की धारा 143-ए के तहत शिकायतकर्ता को अंतरिम मुआवजा

इस धारा में न्यायालय को चेक जारी करने वाले व्यक्ति से शिकायतकर्ता को बाउंस चेक की राशि का 20% अंतरिम मुआवजा दिलवाने प्रावधान काया गया है।

चेक बाउंस के नए नियमों के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें



किसी कंपनी द्वारा चेक बाउंस होने पर निदेशक का दायित्व

जब चेक बाउंस का अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया हो तो उस कंपनी के निदेशक को एन.आई. एक्ट 1881 की धारा 141 के तहत उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। इस कानून के अनुसार, अपराध के समय कंपनी का निदेशक, प्रभारी और उसके व्यवसाय के लिए जिम्मेदार प्रत्येक व्यक्ति, कंपनी के साथ-साथ उत्तरदायी होगा।

 

चेक बाउंस डिमांड नोटिस का ड्राफ्ट

सेवा में,
                 ( विपक्षी का नाम व पता)
महोदय,
              मे अपने पक्षकार (पक्षकार का नाम व पता) के कहे अनुसार आपको निम्नलिखित विधिक नोटिस प्रेषित कर रहा हूँ की:

  1. यह है की आपने मेरे पक्षकार की उपरोक्त फर्म से (समान या माल का विवरण) जिसका शेष भुगतान की वावत आपने मेरे पक्षकार को एक चैक संख्या…………..(बैंक का नाम व पता) का मुवलिग (चैक की राशि) का दिनांकित (चैक की तारीख) का जारी किया और मेरे पक्षकार को आश्वासन दिया की उपरोक्त चैक में वर्णित धनराशि का भुगतान हर हाल में हो जायेगा।
  2. यह कि आपके द्वारा प्रदान किया उपरोक्त चैक को मेरे पक्षकार ने अपनी बैंक …………………… (बैंक का नाम व पता) में प्रस्तुत किया जो कि दिनांक …………. को (फंड इनसफीसियंट) की टिप्पणी के साथ वापस हो गया।
  3. यह की जब मेरे पक्षकार ने इस वावत सम्पर्क किया जिस पर आपने कोई संतोष जनक जवाब नही दिया ना ही चैक में वर्णित धन राशि अदा की।
  4. यह की आपके इस कृत्य से एसा प्रतीत होता है की आप मेरे पक्षकार से लिये (माल का विवरण) का भुगतान नही करना चाहते है इसी उद्देश्य से आपने यह जानता हुए भी की आपके बैंक खाते में पर्याप्त धनराशि नही है फिर भी उपरोक्त चैक जारी किया जो की बिना भुगतान वापस हो गया।
  5. यह कई आपका यह कृत्य एन.आई. एक्ट की धारा 138 के तहत दंडनीय अपराध है। जिसमें आपको न्यायालय द्वारा कारावास की सजा के साथ-साथ चैक में वर्णित धनराशि से दोगुनी धनराशि से दंडित किया जा सकता है।
 

          अतः आपको इस विधिक नोटिस के माध्यम से सख्त हिदायत दी जाती है की आप इस नोटिस प्राप्ति के 15 दिन के अन्दर मेरे पक्षकार को उपरोक्त चैक में वर्णित धनराशि नकद अदा करके चैक प्राप्त करलें अन्यथा मियाद निकलने पर मेरा पक्षकार आपके विरुद्ध सक्षम न्यायालय में विधिक कार्यवाही करने के लिये बाध्य होगा जिसके समस्त हर्ज-खर्चे व परिणामों की जिम्मेदारी आपकी स्वयं की होगी। साथ ही साथ इस विधिक नोटिस का व्यय 5000 रू भी आपके द्वारा देय होगा।

 

भवदीय

(वकील का नाम)

निष्कर्ष: अगर किसी ने आपको बाउंस चेक दिया है, या आप पर किसी ने चेक बाउंस का केस कर दिया है, तो आपको अपने अधिकार और विकल्प दोनों पता होने चाहिए। धारा 138 के तहत केस गंभीर हो सकता है लेकिन सही कानूनी सलाह लेकर समय पर कार्रवाई की जाए तो समाधान संभव है। अगर आप चेक बाउंस से जुड़ी कोई भी सलाह चाहते हैं - चाहे आप पीड़ित हों या आरोपी, अभी हमारे वकीलों से तुरंत बात करें।



अपने कानूनी मुद्दे के लिए अनुभवी चैक बाउन्स वकीलों से सलाह प्राप्त करें

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल


चेक बाउंस के कितने दिन बाद नोटिस भेजना होता है?

चेक बाउंस पर 15 दिन के अंदर नोटिस भेजें और 30 दिन के अंदर कोर्ट में केस करें।



क्या धारा 138 में बिना नोटिस भेजे केस दर्ज हो सकता है?

नहीं, नोटिस भेजना अनिवार्य है। बिना नोटिस भेजे सीधे केस दायर नहीं किया जा सकता।



क्या धारा 138 के अंतर्गत गिरफ्तारी होती है?

आमतौर पर गिरफ्तारी नहीं होती क्योंकि यह जमानती अपराध है। आरोपी को कोर्ट में पेश होकर जमानत मिल जाती है।



क्या धारा 138 के तहत समझौता संभव है?

हां, समझौता संभव है। अगर दोनों पक्ष सहमत हों, तो कोर्ट में आपसी सहमति से केस वापस लिया जा सकता है।



अगर नोटिस के बाद पैसा दे दिया जाए तो क्या केस खत्म हो जाता है?

हाँ, अगर नोटिस मिलने के 15 दिन के अंदर पूरा भुगतान कर दिया जाए, तो आमतौर पर धारा 138 का केस नहीं बनता।