धोखाधड़ी के केस में एफआईआर दर्ज करवाएं या कोर्ट में निजी शिकायत
सवाल
उत्तर (2)
धोखाधड़ी के मामलों में 'एफआईआर' (FIR) दर्ज करवाना हमेशा 'निजी परिवाद' (Private Complaint) से बेहतर और असरदार विकल्प होता है। अगर आपका उद्देश्य आरोपी को जल्द सजा दिलाना और ठगे गए पैसे या दस्तावेज बरामद करना है, तो पुलिस केस ही सबसे उत्तम रास्ता है।
इसकी मुख्य वजह यह है कि एफआईआर दर्ज होने पर पुलिस के पास जांच करने, आरोपी को गिरफ्तार करने और संपत्ति जब्त करने की शक्ति होती है। इसे 'राज्य मुकदमा' (State Case) माना जाता है, जिसमें सरकार आपकी तरफ से वकील (सरकारी अभियोजक) देती है और आपको कोई खर्चा नहीं करना पड़ता।
जबकि निजी शिकायत (पुराने CrPC की धारा 200 और नई 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' - BNSS की धारा 223) में, सारी जिम्मेदारी आप पर होती है। आपको ही गवाह लाने होंगे, सबूत पेश करने होंगे और अपना वकील करना होगा। इसमें पुलिस जांच नहीं करती, जिससे पैसा या सामान बरामद करना बहुत मुश्किल हो जाता है।
इसलिए, सबसे पहले थाने में एफआईआर कराने की कोशिश करें। धोखाधड़ी अब नई 'भारतीय न्याय संहिता' (BNS) की धारा 318 (जो पहले IPC 420 थी) के तहत आता है। अगर पुलिस एफआईआर न लिखे, तो आप कोर्ट में मजिस्ट्रेट के पास 'बीएनएसएस' (BNSS) की धारा 175(3) (जो पहले CrPC 156(3) थी) के तहत आवेदन करें।
इस आवेदन के जरिए मजिस्ट्रेट पुलिस को एफआईआर दर्ज करने और जांच करने का आदेश दे सकता है। यह रास्ता सबसे बेहतरीन है क्योंकि इसमें कोर्ट का आदेश भी मिल जाता है और पुलिस की जांच (Investigation) का लाभ भी मिलता है। निजी शिकायत का रास्ता तभी चुनें जब आपके पास पुलिस की मदद के बिना ही सारे पक्के दस्तावेजी सबूत मौजूद हों।
यदि अपराध संज्ञेय है, तो पुलिस को आपकी शिकायत के आधार पर, एक एफआईआर दर्ज करनी चाहिए, यदि पुलिस आपकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकती है, तो उस स्थिति में आप दर्ज कर सकते हैं, एक 156 (3) Cr.P.C. अपनी शिकायत के आधार पर संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 200 के साथ पढ़ें ताकि शिकायत एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, और जीतने की कला पेशेवर प्रारूपण है। । गौरतलब है कि, अगर पुलिस आपकी एफआईआर दर्ज करती है तो यह एक बेहतर तरीका है।
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