BNSS Section 175 (CRPC 156) - संज्ञेय अपराध में पुलिस जांच की शक्ति


​हमारे आसपास रोज़ाना कई तरह के अपराध होते हैं, जैसे चोरी, झगड़ा, धोखा, या और कोई अन्य गंभीर घटना। कुछ अपराध ऐसे होते हैं जिनमें तुरंत जांच करना बहुत ज़रूरी होता है, नहीं तो अपराधी भाग सकते हैं या सबूत मिट सकते हैं। ऐसे मामलों में अगर पुलिस को गिरफ्तारी के लिए हर बार मजिस्ट्रेट से पूछना पड़े, तो समय खराब हो सकता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175 ऐसे ही अपराधों के बारे में बताती है कि कुछ मामलों में पुलिस बिना मजिस्ट्रेट से पूछे भी जांच शुरू कर सकती है।

आज के इस लेख में आप जानेंगे कि, बीएनएसएस की धारा 175 क्या है? इस धारा के तहत पुलिस की शक्तियाँ क्या है? बीएनएसएस सेक्शन 175 में सजा क्या मिलती है?

ऐसे मामलों की जांच प्रक्रिया कुछ समय पहले तक मुख्य रूप से दंड प्रक्रिया संहिता (CRPC ) की धारा 156 के तहत लागू होती थी। यह धारा पुलिस के द्वारा गंभीर अपराधों की जांच करने के कानून के बारे में बताती थी। लेकिन, कानूनों में बदलाव होने के बाद से अब CRPC की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) ने ले ली है। इस नए कानून के लागू होने के बाद संज्ञेय अपराधों की जांच से जुड़े प्रावधान भी बदल गए हैं। अब, ऐसे मामलों पर बीएनएसएस की धारा 175 लागू होती है। आइये इसके बारे में विस्तार से जानते है।


विषयसूची

  1. बीएनएसएस की धारा 175 क्या है और यह कब लागू होती है?
  2. BNSS 175 की उपधारा (1): मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना पुलिस को जांच का अधिकार
  3. BNSS 175 (2): इस अधिकार का विरोध नहीं किया जा सकता।
  4. उपधारा 175 (3): मजिस्ट्रेट जांच शुरू करने का आदेश दे सकता है।
  5. उप-धारा 175(4): सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ जांच
  6. धारा 175 के तहत संज्ञेय अपराधों की जांच में पुलिस की शक्तियाँ क्या है?
  7. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 के तहत क्या सजा मिलती है?
  8. बीएनएसएस धारा 175 पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बीएनएसएस की धारा 175 क्या है और यह कब लागू होती है?

बीएनएसएस धारा 175 यह बताती है कि पुलिस कब और कैसे किसी गंभीर अपराध की जांच खुद शुरू कर सकती है, बिना किसी मजिस्ट्रेट से अनुमति लिए। सरल भाषा में कहें तो, जब कोई गंभीर अपराध होता है, तो पुलिस को बिना वारंट के गिरफ्तारी करने का अधिकार होता है, तो ऐसे मामलों में पुलिस को जांच शुरू करने के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति लेने की जरूरत नहीं होती।

बीएनएसएस 175 कब लागू होती है इस बात को विस्तार से समझने के लिए इस धारा की चार मुख्य उपधाराओं को जानना बहुत जरुरी हैं। आइए, इन उपधाराओं को आसान भाषा में समझते हैं:


BNSS 175 की उपधारा (1): मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना पुलिस को जांच का अधिकार

इस उप-धारा के अनुसार किसी भी पुलिस थाने का प्रभारी अधिकारी (SHO) अपने इलाके में अगर किसी संज्ञेय अपराध (यानि ऐसा गंभीर अपराध जिसमें पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तारी कर सकती है) की सूचना पाता है, तो वह बिना मजिस्ट्रेट की इजाजत के खुद उस मामले की जांच शुरू कर सकता है।

परंतु अगर मामला बहुत गंभीर हो, तो केवल पुलिस अधीक्षक (SP) के पास यह अधिकार होता है कि वह खुद मामले की जांच करें, या फिर पुलिस उपाधीक्षक (DSP) को जांच करने का निर्देश दें। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि महत्वपूर्ण मामलों की देखरेख और जांच जिम्मेदार और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा की जाए, ताकि सही और निष्पक्ष तरीके से जांच हो सके।


BNSS 175 (2): इस अधिकार का विरोध नहीं किया जा सकता।

इस उप-धारा के अनुसार, अगर पुलिस ने किसी मामले की जांच शुरू कर दी है, तो उस जांच को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकता कि पुलिस अधिकारी को उस मामले की जांच करने का विशेष अधिकार नहीं था।

इसका मतलब है कि किसी भी पुलिस अधिकारी द्वारा की गई जांच को केवल इस कारण से रुकवाना या चुनौती देना गलत होगा कि उस अधिकारी को उस मामले को संभालने का अधिकार नहीं था। इसका उद्देश्य यह है कि जांच में कोई रुकावट न आए और कानूनी कारणों से समय की बर्बादी न हो।


उपधारा 175 (3): मजिस्ट्रेट जांच शुरू करने का आदेश दे सकता है।

इस उप-धारा के अनुसार, मजिस्ट्रेट को यह अधिकार होता है कि वह किसी गंभीर मामले में जांच का आदेश दे सकते हैं। यह अधिकार मजिस्ट्रेट तब इस्तेमाल कर सकते हैं, जब:

मजिस्ट्रेट ने स्वयं कोई जरूरी जांच की हो, जिससे उन्हें मामले के बारे में जानकारी हो।

पुलिस द्वारा दी गई जानकारी पर भी विचार किया गया हो, ताकि पुलिस का नजरिया भी समझा जा सके। इसका मतलब यह है कि मजिस्ट्रेट जांच का आदेश देने से पहले पुलिस की जानकारी और मामले की स्थिति को ध्यान में रखते हैं।


उप-धारा 175(4): सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ जांच

अगर किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ उसकी नौकरी के दौरान कोई शिकायत आती है, तो मजिस्ट्रेट जांच का आदेश दे सकते हैं। लेकिन यह आदेश देने से पहले दो बातें जरूरी हैं:

(a) उस कर्मचारी के बड़े अधिकारी से पूरी जानकारी लेनी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि अधिकारी को शिकायत के बारे में जानकारी है या नहीं।

(b) उस कर्मचारी का जवाब भी सुनना चाहिए, ताकि मजिस्ट्रेट यह जान सकें कि कर्मचारी का अपने पक्ष में क्या कहना है। इसका मतलब है कि मजिस्ट्रेट को जांच शुरू करने से पहले दोनों पक्षों की जानकारी लेनी चाहिए।


धारा 175 के तहत संज्ञेय अपराधों की जांच में पुलिस की शक्तियाँ क्या है?

भारतीय नागरिक सुरक्षा कानून की धारा 175 पुलिस को अपराध की खबर मिलते ही तेज़ी से काम करने और अपराधियों को पकड़कर पीड़ितों को इंसाफ दिलाने में मदद मिलती है, जिससे कानून बना रहता है।

  • बिना पूछे जांच शुरू करना: अगर कोई ऐसा अपराध होता है जिसमें पुलिस सीधे किसी को पकड़ सकती है (जैसे चोरी, लड़ाई-झगड़ा), तो पुलिस को तुरंत जांच शुरू करने की ताकत मिलती है। उन्हें इसके लिए किसी जज या बड़े अफसर से हर बार पूछने की ज़रूरत नहीं होती।
  • घटना की जगह पर जाना और देखना: पुलिस को अपराध की जगह पर जाने, उसे ध्यान से देखने, नक्शा बनाने और जो भी ज़रूरी चीज़ें (सबूत) वहाँ पड़ी हों, उन्हें उठाने का हक होता है।
  • लोगों से पूछताछ करना: पुलिस उस मामले से जुड़े किसी भी आदमी से सवाल-जवाब कर सकती है, चाहे वह शिकायत करने वाला हो, पीड़ित हो या जिसने कुछ देखा हो। पुलिस उनका बयान लिख सकती है और उनसे जानकारी ले सकती है।
  • ज़रूरी चीज़ें अपने कब्ज़े में लेना: अगर पुलिस को जांच के दौरान कोई ऐसे कागज़ या चीज़ मिलती है जो मामले को सुलझाने में मदद कर सकती है, तो पुलिस उसे अपने कब्ज़े में ले सकती है।
  • संदिग्ध लोगों की तलाशी लेना: अगर पुलिस को लगता है कि किसी आदमी के पास ऐसी कोई चीज़ है जो जांच के लिए ज़रूरी है, तो वे कानून के हिसाब से उसकी तलाशी ले सकते हैं।
  • पकड़ने की ताकत: चूँकि यह धारा ऐसे अपराधों की बात करती है जिनमें पुलिस सीधे पकड़ सकती है, तो पुलिस को उन लोगों को पकड़ने की ताकत भी मिलती है जिन्होंने अपराध किया हो या जिन पर शक हो।
  • बड़े अफसरों का कहना मानना: जो बड़े पुलिस अफसर होते हैं (जैसे जिले के एसपी), वे खुद भी जांच कर सकते हैं या अपने नीचे के अफसरों को जांच करने का ऑर्डर दे सकते हैं। पुलिस को उनके कहे अनुसार भी काम करना होता है।
  • जज साहब के कहने पर जांच करना: कभी-कभी जज साहब भी पुलिस को किसी मामले की जांच करने का ऑर्डर दे सकते हैं। ऐसे में पुलिस को जज साहब के कहने पर जांच करनी पड़ती है।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 के तहत क्या सजा मिलती है?

बीएनएसएस सेक्शन 175 मुख्य रूप से पुलिस को संज्ञेय अपराधों की जांच करने की शक्ति देती है। यह धारा खुद किसी अपराध को परिभाषित नहीं करती है और न ही इसके तहत किसी सजा का प्रावधान है। इसलिए, धारा 175 के तहत कोई अलग से सजा नहीं है। यह सिर्फ पुलिस को जांच करने का तरीका और अधिकार बताती है।

निष्कर्ष: बीएनएसएस सेक्शन 175 पुलिस के द्वारा गंभीर अपराधों में की बिना कोर्ट की अनुमति के की जाने वाली कार्यवाही के बारे में बताती है। जिसका उद्देश्य जल्द से जल्द आरोपियों को पकड़ना है, और पीड़ितों की रक्षा करना है।

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बीएनएसएस धारा 175 पर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल


पुलिस कब बिना मजिस्ट्रेट की परमिशन के जांच शुरू कर सकती है?

अगर कोई ऐसा अपराध होता है जो थोड़ा गंभीर हो (जैसे चोरी, मारपीट, धोखाधड़ी), तो पुलिस थाने का इंचार्ज (SHO) बिना किसी जज से पूछे अपनी जांच शुरू कर सकता है।


मजिस्ट्रेट कब पुलिस को जांच करने का ऑर्डर दे सकते हैं?

कुछ मामलों में, अगर किसी को लगता है कि पुलिस ठीक से जांच नहीं कर रही है या जांच करनी चाहिए, तो वह मजिस्ट्रेट के पास जा सकता है। अगर मजिस्ट्रेट को लगता है कि बात में दम है, तो वह पुलिस को जांच करने का ऑर्डर दे सकता है।



BNSS Section 175 क्या है?

BNSS 175 कानून का एक हिस्सा है जो पुलिस को यह बताता है कि वह कब और कैसे किसी ऐसे अपराध की जांच कर सकती है जिसमें वह बिना वारंट के किसी को पकड़ सकती है। आसान भाषा में, यह पुलिस को गंभीर मामलों की तुरंत जांच करने की ताकत देता है।



अगर मुझे लगे कि पुलिस मेरी शिकायत पर ध्यान नहीं दे रही है, तो मैं क्या कर सकता हूँ?

अगर आपको लगे कि पुलिस आपकी शिकायत पर ठीक से कार्रवाई नहीं कर रही है, तो आप अपने इलाके के बड़े पुलिस अफसर (जैसे एसपी) से मिल सकते हैं या मजिस्ट्रेट के पास अपनी बात रख सकते हैं। BNSS 175 में इन बातों का भी ध्यान रखा गया है।