आपसी सहमति से तलाक कैसे लें – नियम, प्रक्रिया, पेपर और प्रारूप

आपसी सहमति से तलाक (Mutual Consent Divorce) तब लिया जाता है जब पति और पत्नी दोनों शादी खत्म करने पर सहमत हों। तलाक लेने के लिए दोनों को कम से कम 1 साल से अलग रहना, कोर्ट में संयुक्त याचिका दायर करना, और 6 महीने की प्रतीक्षा अवधि पूरी करनी होती है।
तलाक की प्रक्रिया फैमिली कोर्ट में होती है और इसमें जरूरी डॉक्युमेंट्स जैसे शादी का प्रमाण पत्र, पहचान पत्र और तलाक समझौता ड्राफ्ट इत्यादि शामिल होते हैं। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया क्या है, तलाक के पेपर और दस्तावेज़ कौन से लगते हैं, और विभिन्न धर्मों में आपसी तलाक की प्रक्रिया में क्या अंतर होता है।
विषयसूची
- आपसी सहमति से तलाक क्या होता है?
- आपसी तलाक कैसे लेते है - प्रक्रिया
- आपसी तलाक के पेपर�और प्रारूप
- हिंदू, मुस्लिम और ईसाई धर्मों के आधार पर आपसी तलाक
- आपसी तलाक के लिए आधार,�नियम और शर्तें
- तलाक की अर्जी दायर करने के लिए�क्षेत्राधिकार और कोर्ट
- 1. कोर्ट में पहली अर्जी डालना (First Motion)
- 2. 6 महीने का इंतज़ार (Cooling Period) और छूट
- 3. दूसरी अर्जी और अंतिम आदेश (Second Motion)
- आपसी तलाक की प्रक्रिया पूरी होने लगने वाला समय
- 1. तलाक के ज़रूरी दस्तावेज़ों की सूची
- 2. तलाक के प्रारूप में शामिल मुख्य बिंदु
- 1. हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन धर्म (Hindu Marriage Act - HMA)
- 2. ईसाई धर्म (Divorce Act, 1869)
- 3. मुस्लिम धर्म (खुला और मुबारत)
- अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

आपसी सहमति से तलाक क्या होता है?
आपसी सहमति से तलाक वह कानूनी प्रक्रिया है जिसमें शादी को खत्म करने के लिए पति और पत्नी दोनों की सहमति जरुरी होती है। ऐसा तलाक हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B और विशेष विवाह अधिनियम की धारा 28 के तहत लिया जाता है।
जब पति और पत्नी दोनों इस बात पर सहमत हों कि अब साथ रहना संभव नहीं है और वो अपनी इच्छा से शादी खत्म करना चाहते हैं, और एक साल से ज़्यादा समय से अलग रह रहे हैं, तो वे आपसी सहमति से तलाक के लिए आवेदन कर सकते हैं।
इस तरह के तलाक में पति पत्नी को कोर्ट में लंबे झगड़े या आरोप-प्रत्यारोप करने की ज़रूरत नहीं होती, इसलिए इसे दोनों पक्षों के लिए सबसे सम्मानजनक और कम तनावपूर्ण तरीका माना जाता है। आपसी सहमति से तलाक जल्दी मिल जाता है और इसमें खर्च भी कम आता है।
आपसी तलाक के लिए आधार, नियम और शर्तें
आपसी सहमति से तलाक तभी मिल सकता है जब पति-पत्नी कुछ महत्वपूर्ण कानूनी शर्तों को पूरा करते हों। ये शर्तें यह साबित करती हैं कि उनका रिश्ता पूरी तरह से टूट चुका है और उनमे सुलह की उम्मीद नहीं है।
- अलग रहने की अवधि: तलाक की अर्जी डालने से पहले, पति-पत्नी को कम से कम एक वर्ष (1 साल) से अलग रहना चाहिए। वे एक ही घर में भी अलग कमरों में रह सकते हैं, लेकिन उन्हें पति-पत्नी के रूप में साथ नहीं रहना चाहिए। इस शर्त का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तलाक का फैसला जल्दबाजी या गुस्से में न लिया गया हो।
- दोनों की सहमति ज़रूरी: आपसी सहमति से तलाक लेने के लिए यह सबसे बड़ी शर्त है। पति और पत्नी दोनों को तलाक के लिए राज़ी होना चाहिए और फॅमिली कोर्ट में मिलकर अर्जी डालने के लिए तैयार होना चाहिए। अगर एक भी पक्ष सहमत नहीं है, तो उन्हें एकतरफा तलाक का रास्ता अपनाना पड़ता है।
- सभी बातों पर समझौता: तलाक से जुड़े सभी मुद्दों (जैसे गुज़ारा भत्ता, बच्चों की कस्टडी, और तलाक के बाद संपत्ति का बँटवारा) पर दोनों पक्षों के बीच पूरी सहमति बन चुकी होनी चाहिए।
तलाक की अर्जी दायर करने के लिए क्षेत्राधिकार और कोर्ट
आपसी सहमति से तलाक की अर्जी सही कोर्ट में डालना ज़रूरी है। यह याचिका उस फैमिली कोर्ट में दायर की जा सकती है जो निम्नलिखित में से किसी एक शर्त को पूरा करता हो:
- विवाह स्थल: जहाँ शादी हुई थी।
- अंतिम निवास: जहाँ पति-पत्नी आखिरी बार एक साथ रहे थे।
- वर्तमान निवास: जहाँ पत्नी या पत्नी में से कोई एक अभी रह रहा है।
आपसी तलाक कैसे लेते है - प्रक्रिया
आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया में मुख्य रूप से दो बार कोर्ट में हाज़िर होना (First Motion और Second Motion) ज़रूरी होता है, और बीच में एक समाया अवधि के लिए इंतज़ार करना पड़ता है।
1. कोर्ट में पहली अर्जी डालना (First Motion)
- तलाक याचिका का प्रारूप: पति-पत्नी के वकील तलाक की याचिका तैयार करते हैं। आपसी तलाक का प्रारूप एक कानूनी दस्तावेज़ होता है जिसमें सहमति, अलगाव की अवधि, और तलाक के कारणों का संक्षिप्त विवरण होता है।
- दस्तावेज़ जमा करना: याचिका के साथ सभी ज़रूरी तलाक के पेपर (डॉक्यूमेंट्स) और समझौता पत्र भी कोर्ट में जमा किए जाते हैं।
- कोर्ट में पेशी और बयान: पति और पत्नी दोनों को कोर्ट में मौजूद रहना अनिवार्य है। जज दोनों के बयानों को रिकॉर्ड करते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि सहमति किसी दबाव में नहीं ली गई है।
2. 6 महीने का इंतज़ार (Cooling Period) और छूट
- कलिंग ऑफ पीरियड: पहली अर्जी (First Motion) के बाद कोर्ट दोनों पक्षो को 6 महीने का समय देती है, ताकि पति-पत्नी अपने फैसले पर सोच-विचार कर सकें।
- छूट: अगर दोनों पक्ष यह साबित कर दें कि वे काफी समय से अलग रह रहे हैं और सुलह की कोई उम्मीद नहीं है, तो कोर्ट इस 6 महीने की अवधि को छोड़ (माफ़) सकता है, जिससे तलाक जल्दी हो जाता है।
3. दूसरी अर्जी और अंतिम आदेश (Second Motion)
पति पत्नी के 6 महीने तक अलग रहने का समय पूरा होने के बाद, तलाक को अंतिम रूप दिया जाता है।
- दूसरी सुनवाई: 6 महीने पूरे होने के बाद, पति और पत्नी को फिर से कोर्ट में हाज़िर होना पड़ता है।
- तलाक की पुष्टि: इस बार वे जज के सामने पुष्टि करते हैं कि वे अभी भी तलाक के लिए सहमत हैं और सुलह नहीं हुई है।
- तलाक का आदेश (Decree): दोनों पक्षों की पुष्टि के बाद, जज तलाक का अंतिम आदेश (Decree of Divorce) जारी कर देते हैं।
आपसी तलाक की प्रक्रिया पूरी होने लगने वाला समय
- न्यूनतम समय: अगर पति पटना को 6 महीने के कूलिंग ऑफ पीरियड में छूट नहीं मिल पाती, तो आपसी सहमति से तलाक को अंतिम रूप देने में कम से कम 6 महीने 15 दिन लगते हैं।
- कोर्ट की अधिकतम समय सीमा: कोर्ट को इस तलाक पर 18 महीनों के भीतर फैसला देना होता है।
आपसी तलाक के पेपर और प्रारूप
1. तलाक के ज़रूरी दस्तावेज़ों की सूची
आपसी सहमति से तलाक की अर्जी के साथ ये सभी दस्तावेज़ों जमा करने होते हैं:
- पहचान प्रमाण: पति और पत्नी के पते का प्रमाण (आधार कार्ड, वोटर आईडी) और पहचान पत्र।
- शादी का प्रमाण: शादी का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट और शादी का निमंत्रण कार्ड।
- फोटोग्राफ: पति और पत्नी के पासपोर्ट साइज़ फोटो और शादी के कुछ सामूहिक फोटो।
- अलगाव प्रमाण: पिछले एक वर्ष से अलग रहने का प्रमाण (जैसे अलग रेंट एग्रीमेंट या अलग बिजली बिल, अगर एक ही घर में नहीं रह रहे हैं)।
- वित्तीय दस्तावेज़: पिछले दो-तीन साल की सैलरी स्लिप या आयकर रिटर्न (ITR) की कॉपी (गुज़ारा भत्ता तय करने के लिए)।
2. तलाक के प्रारूप में शामिल मुख्य बिंदु
तलाक की याचिका का प्रारूप वकील द्वारा तैयार किया जाता है, जिसमें ये सभी बातें स्पष्ट रूप से शामिल होनी चाहिए:
1. शादी का विवरण: शादी की तारीख, स्थान और दोनों पक्षों की पहचान।
2. तलाक का आधार: यह बताना कि वे कम से कम एक साल से अलग रह रहे हैं और अब साथ नहीं रह सकते ।
3. समझौता पत्र: आपसी सहमति से तलाक लेने के प्रारूप में समझौते की शर्ते सबसे महत्वपूर्ण होती है। इसमें निम्नलिखित पर अंतिम सहमति लिखी जाती है:
- गुज़ारा भत्ता (Alimony): पत्नी को दी जाने वाली एकमुश्त रकम या मासिक रकम।
- बच्चों की कस्टडी: बच्चे की कस्टडी (Permanent Custody) किसको मिलेगी और दूसरा पेरेंट बच्चों से कब और कैसे मिल सकेगा।
- संपत्ति का बँटवारा: सभी साझा संपत्तियों (Joint Property), लोन और देनदारियों का अंतिम बँटवारा।
4. शपथ पत्र (Affidavit): दोनों पक्षों द्वारा यह शपथ पत्र देना कि वे अपनी पूरी मर्ज़ी से तलाक के लिए सहमत हैं, और किसी के दबाव में नहीं हैं।
हिंदू, मुस्लिम और ईसाई धर्मों के आधार पर आपसी तलाक
भारत में तलाक के नियम धार्मिक कानूनों पर आधारित हैं। आपसी तलाक की प्रक्रिया में तीनों प्रमुख धर्मों के लोगों के लिए कुछ अंतर हैं।
1. हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन धर्म (Hindu Marriage Act - HMA)
- कानून: हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13B लागू होती है।
- प्रक्रिया: इसमें 1 साल का अलग रहना ज़रूरी है, और 6 महीने से 18 महीने की अनिवार्य इंतज़ार अवधि होती है। तलाक के लिए कोर्ट जाना और दो बार (First & Second Motion) हाज़िर होना ज़रूरी है।
2. ईसाई धर्म (Divorce Act, 1869)
- कानून: भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 10A के तहत ईसाई जोड़ों को आपसी सहमति से तलाक लेने की अनुमति है।
- प्रक्रिया: यह प्रक्रिया हिंदू कानून जैसी ही होती है, जिसमें 1 साल का अलग रहना और कोर्ट में दो बार पेश होना ज़रूरी है।
3. मुस्लिम धर्म (खुला और मुबारत)
- कानून: मुस्लिम कानून (शरीयत) के तहत खुला और मुबारत के ज़रिए तलाक होता है।
- मुबारत (Mubarat): यह आपसी सहमति का सबसे करीब का रूप है, जहाँ पति और पत्नी दोनों तलाक चाहते हैं। इस प्रक्रिया में तलाक के लिए कोर्ट जाना ज़रूरी नहीं है, लेकिन दस्तावेज़ों को नोटरीकृत कराना और काज़ी के ज़रिए तलाकनामा बनवाना ज़रूरी होता है।
अगर आप या आपका कोई जानने वाला आपसी सहमति से तलाक लेना चाहता है, तो अभी भारत के अनुभवी तलाक वकील से सलाह लें ताकि प्रक्रिया आसान और कानूनी रूप से सही हो सके।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अगर 6 महीने के इंतज़ार के बाद एक पक्ष मना कर दे तो क्या होगा?
तलाक की याचिका दायर करने के बाद, अगर 6 महीने बाद कोई भी एक पक्ष तलाक से मना कर देता है या कोर्ट में हाज़िर नहीं होता है, तो आपसी सहमति से तलाक नहीं हो सकता और अर्जी ख़ारिज हो जाएगी। दूसरे पक्ष को अब एकतरफा तलाक का केस लड़ना पड़ेगा।
क्या 6 महीने के कूलिंग पीरियड को कम किया जा सकता है?
हाँ। सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुसार, विशेष परिस्थितियों में कोर्ट को यह अवधि छोड़ने (माफ़) की अनुमति है, अगर दोनों पक्ष पूरी तरह सहमत हों।
आपसी सहमति से तलाक की अर्जी फाइल करने के लिए शादी को कितना समय होना चाहिए?
हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक की अर्जी फाइल करने से पहले शादी को कम से कम एक साल हो जाना चाहिए।
क्या आपसी तलाक में गवाहों की ज़रूरत होती है?
हाँ। दोनों मोशन (First and Second Motion) में पति-पत्नी के साथ के अलावा 2 गवाहों की ज़रूरत पड़ सकती है, जो यह प्रमाणित करते हैं कि वे तलाक के लिए दोनों अपनी इच्छा से सहमत हैं।
क्या तलाक के बाद पति गुज़ारा भत्ता (Alimony) देने से बच सकता है?
नहीं। अगर समझौते में पत्नी को एकमुश्त (Lump sum) या मासिक गुज़ारा भत्ता देने की शर्त है, तो पति उस देनदारी से बच नहीं सकता।