in my case nder pml ac 2002 ed has sbmied an applicain in cr ha he has bained prsicin sancin nder 17


सवाल

in my case under pml act 2002 ed has submitted an application in court that he has obtained prosicution sanction under 197 crpc(218 BNSS) against me from railways. as far as i know this can be obtained before court taking cognigence kya after 7 years of trial enforcement diractorate can submit prosicution sanction under 197 crpc now 218 bnss.

उत्तर (2)


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आपके प्रश्न का सीधा उत्तर यह है कि आपकी समझ कानून की दृष्टि से पूर्णतः सही है। धारा (जो पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा थी और अब नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की संगत धारा है) के तहत अभियोजन के लिए पूर्व-मंजूरी लेना एक अनिवार्य पूर्व शर्त है, जो कि न्यायालय द्वारा मामले का संज्ञान लेने से पहले ही होनी चाहिए। इसका मूल उद्देश्य यह है कि सरकारी कर्मचारी को उसके सरकारी कर्तव्यों के पालन के दौरान किए गए कार्यों के लिए उत्पीड़न से बचाया जा सके। इसलिए, यह मंजूरी किसी भी स्थिति में विचारण शुरू होने और सात वर्ष बीत जाने के बाद, किसी भी स्तर पर देर से नहीं दी जा सकती।

आपके मामले में, जब प्रवर्तन निदेशालय ने अब (यानी सात वर्ष बाद) यह मंजूरी न्यायालय में प्रस्तुत की है, तो आपके पास इसके खिलाफ लड़ने का पूरा कानूनी अधिकार है। इस देरी का सबसे बड़ा प्रभाव यह होगा कि इस मंजूरी के अभाव में, न्यायालय द्वारा शुरू में संज्ञान लेना ही कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण हो जाता है। यह कोई मामूली औपचारिकता नहीं है, बल्कि इसके अभाव में पूरी कानूनी कार्यवाही ही अवैध हो जाती है। न्यायालय को यह देखना होगा कि जब मंजूरी पहले नहीं थी, तो उसने किस आधार पर संज्ञान लिया और विचारण शुरू किया। अदालतें इस बात को बहुत गंभीरता से लेती हैं कि संज्ञान लेने के समय आवश्यक मंजूरी अवश्य होनी चाहिए।

हालाँकि, यहाँ एक महत्वपूर्ण बिंदु यह भी है कि धन शोधन निवारण अधिनियम के मामलों में कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन सामान्यतः देर से प्रस्तुत की गई यह मंजूरी आपकी कार्यवाही को रद्द करने का एक बहुत मजबूत आधार बन जाती है। इसलिए, आपको अपने वकील के माध्यम से न्यायालय के समक्ष यह स्पष्ट रूप से रखना चाहिए कि यह मंजूरी विचारण के सात वर्ष बाद देना न्यायिक प्रक्रिया का गंभीर उल्लंघन है, क्योंकि संज्ञान ग्रहण करने का आधार ही दोषपूर्ण था। आप सीधे तौर पर यह मांग कर सकते हैं कि चूंकि शुरुआत से ही मंजूरी का अभाव था, इसलिए न्यायालय द्वारा संज्ञान लेने और उसके बाद की सभी कार्यवाहियों को निरस्त किया जाए। यह तर्क न्यायालय के समक्ष कानूनी रूप से बहुत प्रभावी होगा।


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