क्या पैतृक संपत्ति की बिक्री के बाद बेटी अपने हिस्से का दावा कर सकती है


सवाल

मेरे पिता ने फरवरी 2005 में हमारी पुश्तैनी (पैतृक) संपत्ति मेरे भाई की सहमति से बेच दी थी, लेकिन उन्होंने इसके लिए मेरी (बेटी की) सहमति नहीं ली थी। मैं जानना चाहती हूं कि क्या इतने साल बीत जाने के बाद भी मैं इस बिक्री के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा दायर कर सकती हूं और उस संपत्ति में अपना हिस्सा मांग सकती हूं?

उत्तर (2)


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यह मामला कानूनी पेचीदगियों से भरा है, लेकिन आपके लिए एक उम्मीद की किरण जरूर है। इसका जवाब 'हां' है, लेकिन इसमें 'समय सीमा' (Limitation) की एक बड़ी बाधा हो सकती है।

1. आपका कानूनी अधिकार (Legal Right): 'हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005' के तहत बेटियों को बेटों के बराबर पैतृक संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार (Coparcener Rights) मिला है। इस कानून में एक बहुत महत्वपूर्ण तारीख तय की गई थी - 20 दिसंबर 2004। कानून कहता है कि अगर कोई संपत्ति बंटवारा या बिक्री 20 दिसंबर 2004 से पहले हो चुकी है, तो उसे नहीं खोला जाएगा। चूंकि आपके मामले में बिक्री फरवरी 2005 में हुई है (जो 20 दिसंबर 2004 के बाद है), इसलिए कानूनन आपकी सहमति के बिना पुश्तैनी संपत्ति बेचना गलत था। सुप्रीम कोर्ट के विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) फैसले के अनुसार, आपका उस संपत्ति पर पूरा अधिकार था और आपकी सहमति अनिवार्य थी।

2. समय सीमा की चुनौती (Law of Limitation): कानूनी अधिकार होना एक बात है और समय पर कोर्ट जाना दूसरी बात। किसी भी संपत्ति की बिक्री को चुनौती देने की अधिकतम समय सीमा आमतौर पर बिक्री की तारीख से 12 साल होती है। चूंकि बिक्री 2005 में हुई थी, इसलिए सामान्य तौर पर केस करने का समय 2017 में समाप्त हो चुका है।

3. अब आप क्या कर सकती हैं? बावजूद इसके, आप अभी भी मुकदमा दायर कर सकती हैं, बशर्ते आप कोर्ट में यह साबित कर दें कि आपको इस बिक्री की जानकारी पहले नहीं थी।

  • जानकारी की तारीख (Date of Knowledge): आप कोर्ट में दलील दे सकती हैं कि आपको इस फर्जीवाड़े या बिक्री का पता हाल ही में चला है। परिसीमा अधिनियम (Limitation Act) के तहत, मुकदमा करने का समय उस दिन से गिना जा सकता है जिस दिन आपको धोखाधड़ी का पता चला।

  • कानूनी आवश्यकता (Legal Necessity): अगर पिता ने संपत्ति परिवार की भलाई या कानूनी जरूरत (जैसे बीमारी या शादी) के लिए बेची थी, तो उसे चुनौती देना मुश्किल होगा। लेकिन अगर उन्होंने मनमाने ढंग से बेची है, तो आप अपना हिस्सा मांग सकती हैं।

आपको तुरंत एक दीवानी वकील (Civil Lawyer) से मिलकर केस फाइल करना चाहिए, क्योंकि जितनी देरी होगी, आपका पक्ष उतना ही कमजोर होता जाएगा।

263 votes

हां निश्चित रूप से, हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के अनुसार एक विवाहित बेटी का अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार है। 2005 में, सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) के रूप में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में एक ऐतिहासिक संशोधन पारित किया था। अधिनियम, 2005, बेटियों को उनके पुरुष रिश्तेदारों के साथ पैतृक संपत्ति में विरासत का अधिकार प्रदान करता है। लेकिन एक बेटी केवल पैतृक संपत्ति पर अधिकार रख सकती है यदि पिता की मृत्यु 2005 में इस संशोधन के लागू होने के बाद हुई हो, सुप्रीम कोर्ट के नियम। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी, 2018 को फिर से इस मामले पर गौर किया और संशोधन की तारीख पर एक बेटी (जीवित या मृत) को पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी का अधिकार दिया, इस प्रकार उसके बच्चों को भी इस अधिकार का दावा करने के लिए मजबूर किया। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया, "संशोधित प्रावधान (हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6) अब वैधानिक रूप से बेटियों के साथ-साथ जन्म से ही सहदायिकों के अधिकारों को मान्यता देता है। और एक कोपार्सनर की बेटियां जन्म के आधार पर कोपार्सनर बन जाती हैं।”


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