एफआरटी क्या है क्या इसका मतलब यह है कि पुलिस ने जांच बंद कर दी है


सवाल

एफआरटी (FRT) क्या होती है? क्या इसका मतलब यह है कि पुलिस ने केस पूरी तरह खत्म कर दिया है और अब हम न्याय के लिए अदालत नहीं जा सकते? अगर पुलिस ने एफआरटी लगा दी है, तो क्या शिकायत करने वाले के पास कोई रास्ता बचता है?

उत्तर (3)


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एफआरटी (Final Report True) का सरल मतलब यह है कि पुलिस ने अपनी जांच पूरी कर ली है और उन्हें आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं।

जब पुलिस को लगता है कि मामला बनता तो है लेकिन सबूतों की कमी है, तो वे अदालत में एक रिपोर्ट पेश करते हैं जिसे अंतिम रिपोर्ट (Final Report) कहा जाता है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आपके लिए इंसाफ के दरवाजे बंद हो गए हैं।

यहाँ विस्तार से समझें कि इसके बाद क्या होता है:

  • अदालत का फैसला: पुलिस सिर्फ अपनी राय देती है, फैसला अदालत करती है। जब पुलिस एफआरटी जमा करती है, तो मजिस्ट्रेट उसे सीधे स्वीकार नहीं करते। वे शिकायतकर्ता (जिसने केस किया है) को एक नोटिस भेजते हैं।

  • प्रोटेस्ट पिटीशन (Protest Petition): अगर आप पुलिस की इस रिपोर्ट से खुश नहीं हैं, तो आप अदालत में इसके खिलाफ 'प्रोटेस्ट पिटीशन' दायर कर सकते हैं। यह आपका कानूनी हक है। आप जज को बता सकते हैं कि पुलिस ने जांच ठीक से नहीं की है या कुछ गवाहों को छोड़ दिया है।

  • दोबारा जांच के आदेश: अगर जज आपकी बात से सहमत होते हैं, तो वे पुलिस को दोबारा जांच (Re-investigation) के आदेश दे सकते हैं या पुलिस की रिपोर्ट को खारिज करके खुद मामले का संज्ञान ले सकते हैं।

  • आरोपी के लिए राहत: अगर आप आरोपी हैं और पुलिस ने आपके पक्ष में एफआरटी दी है, तो यह आपके लिए राहत की बात है। जब तक शिकायतकर्ता इसे चुनौती नहीं देता, तब तक आपको अदालत के चक्कर काटने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

एफआरटी जांच का अंत हो सकता है, लेकिन कानूनी लड़ाई का नहीं। अगर आप शिकायतकर्ता हैं, तो आप धारा BNSS की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच की मांग कर सकते हैं।

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frt एक अंतिम रिपोर्ट है जिसमें आरोपी के खिलाफ मामला बंद करने की सिफारिश की जाती है। यदि आप एक अभियुक्त हैं तो जब तक वास्तविक शिकायतकर्ता उस रिपोर्ट को चुनौती नहीं देता और जांच की मांग नहीं करता तब तक आपको मुकदमे का सामना करने के लिए अदालत जाने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप वास्तव में शिकायतकर्ता हैं तो आप या तो रिपोर्ट को स्वीकार करने का विकल्प चुन सकते हैं या सीआरपीसी की धारा 173(8) के तहत जांच की मांग के लिए अदालत के समक्ष आवेदन कर सकते हैं।

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