स्टे ऑर्डर क्या है? स्थगन आदेश कैसे लेते है – रोक, फीस, कॉपी और नियम



स्टे ऑर्डर लेने की प्रक्रिया, फीस और कानूनी नियम की जानकारी

स्टे ऑर्डर (स्थगन आदेश) किसी कोर्ट द्वारा जारी किया गया ऐसा आदेश होता है जो कोर्ट में चल रही किसी भी कानूनी कार्रवाही, जैसे कि जमीन विवाद, मुकदमे या किसी अन्य विवादित मामले में रोक लगाने या स्थगित करने के लिए दिया जाता है। जिसका मतलब है जब तक अदालत उस मामले में अंतिम फैसला नहीं सुनाती, तब तक वो रोक बनी रहती है।

जमीन या प्रॉपर्टी पर स्टे लेने का खर्च भी केस की जटिलता और वकील की फीस पर निर्भर करता है - जो लगभग 10,000 से 1 लाख रूपए तक हो सकता है। इस लेख में आप विस्तार से जानेंगे कि स्टे ऑर्डर क्या होता है, जमीन, किसी अन्य विवादित प्रॉपर्टी या झगडे पर स्टे कब और कैसे मिलता है, स्टे लेने की प्रक्रिया में लगने वाला समय और खर्च कितना होता है।



Property Dispute

आपने बहुत सी फिल्मों व समाचारों में जरुर देखा होगा कि कोई व्यक्ति अचानक स्टे ऑर्डर ले आता है तो उसी समय कोई भी तोड़-फोड का या किसी भी प्रकार का कार्य रोक दिया जाता है या किसी व्यक्ति को पुलिस पकड़ कर ले जा रही होती है तो पुलिस इस आदेश को देखते ही उस व्यक्ति को उसी समय छोड़ देती है। लेकिन असल मे हमें पूरी तरह से इस आदेश के नियमों व कार्यों की बिल्कुल भी जानकारी नहीं होती।

आज हम स्टे ऑर्डर की शक्तियों के बारे में भी जानेंगे कि यह आदेश कहाँ और कब इस्तेमाल होता है। इसके साथ ही हम आपको बहुत ही सरल भाषा में कोर्ट से स्टे ऑर्डर लेने की पूरी प्रक्रिया भी बताएंगे।

स्टे ऑर्डर क्या होता है – Stay Order Meaning in Hindi

भारत में “स्टे आर्डर” अदालत द्वारा जारी किया जाने वाला एक आदेश है जो पहले जारी किए गए अदालती आदेश, फैसले, विवादित मामलों या किसी कानूनी कार्रवाई को रोकने के लिए उपयोग किया जाता है।

एक बार किसी मामले में स्टे लग जाता है तो उस मामले में होने वाली कार्यवाही को रोक दिया जाता है। इसके बाद स्टे ऑर्डर तब तक लागू रहता है जब तक कि न्यायालय द्वारा उस मामले में जांच पूरी नहीं हो जाती।

स्टे आर्डर का हिन्दी में मतलब होता है - Stay = रोकना, Order = आदेश जिसका मतलब है किसी कार्य या कार्यवाही को रोकने का आदेश इसे हिन्दी में स्थगन आदेश भी कहा जाता है।

उदाहरण

मान लीजिए किसी जमीन को लेकर दो पक्षों में विवाद होता है, तो इनमें से एक पक्ष उस जमीन को विवाद होने के बावजूद भी किसी को बेच ना दे या उस पर कोई इमारत ना बना दे। इसलिए इस कार्य को रोकने के लिए दूसरे पक्ष द्वारा कोर्ट से स्टे ऑर्डर लिया जाता है।

एक बार कोर्ट से स्टे मिलने के बाद पहले पक्ष का व्यक्ति उस जमीन को ना तो बेच पाएगा और ना ही उस पर कुछ निर्माण कर पाएगा। ऐसा तब तक होगा जब तक कि कोर्ट सबूतों की जाँच करके उचित निर्णय तक नहीं पहुँचती।



स्टे ऑर्डर से संबंधित कानून क्या है?

भारत में स्टे ऑर्डर का कानून मुख्य रूप से सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के द्वारा शासित होता है। जिसके द्वारा किसी भी कानूनी कार्यवाही या किसी निर्णय पर अदालत द्वारा जारी किए आदेश से रोक लगा दी जाती है। यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके साथ किसी कानूनी या गैर-कानूनी निर्णय से अन्याय (Injustice) हो रहा है तो वह कोर्ट में स्थगन आदेश की मांग कर सकता है।   



स्थगन आदेश कितने प्रकार का होता है और यह कब लिया जाता है?

भारत मे स्टे आर्डर के बहुत से प्रकार होते है जिनके अलग-अलग कार्यें होते है। इसलिए इन सभी के बारे में विस्तार से जानना आपके लिए बहुत जरूरी है। साथ ही आप में से बहुत से लोगों का यह भी सवाल रहता है कि स्टे ऑर्डर कब लिया जाता है? तो आपकों नीचे दी गई जानकारी के द्वारा अपने सभी सवालों के जवाब मिल जाएंगे।

  • अंतरिम रोक: अंतरिम रोक (Interim Stay) का मतलब होता है कि जब तक किसी मामले के अंतिम निर्णय तक कोर्ट नहीं पहुँच जाता तब तक अस्थायी रूप से रोक लगी रहती है। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति से बेदखली का सामना कर रहा है, तो वह बेदखली की प्रक्रिया को रोकने के लिए कोर्ट के सामने अंतरिम रोक का अनुरोध कर सकता है जब तक कि अदालत मामले की पूरी तरह से जांच नहीं कर लेती।
  • निष्पादन पर रोक: यह आदेश ऐसे आपराधिक मामलों से संबंधित होता है जिनमें किसी व्यक्ति को दोषी ठहराया जाता है और उसे कारावास या मृत्युदंड की सजा का सामना करना पड़ रहा है। इसकी मदद से उस व्यक्ति की फांसी की सजा पर रोक लगाई जाती है और ऐसा तब होता है जब उस व्यक्ति के मामले में कोई नया कानूनी मुद्दा या सबूत सामने आता है तो ऐसे मामलों में दोबारा जांच की मांग की जाती है।   
  • कार्यवाही पर रोक: इसके द्वारा किसी भी मामले में सभी कानूनी कार्यवाही पर अस्थायी रोक लग जाती है। उदाहरण के लिए यदि अदालत के अधिकार क्षेत्र को लेकर पक्षों के बीच असहमति है या मामले के किसी महत्वपूर्ण पहलू से संबंधित कोई अपील लंबित है, तो कार्यवाही पर रोक लगाने का आदेश दिया जा सकता है।
  • नीलामी पर रोक: यदि किसी भी मामले में ऋण वसूल करने या किसी अन्य कारण से किसी संपत्ति की नीलामी की जा रही है तो उस निलामी पर रोक की मांग की जा सकती है। इस प्रकार के मामलों को भी तब तक रोका जा सकता है जब तक अदालत मामले की पूरी तरह से जांच नहीं कर लेती।
  • विध्वंस पर रोक: यदि किसी भी कारण से किसी संपत्ति को तोड़ने या गिराने की योजना है तो उस पर रोक लगाने का अनुरोध किया जा सकता है। इस रोक के द्वारा तब तक रोक लगाई जा सकती है कि जब तक की उसके तोड़ने के कारण को कोर्ट के द्वारा सही नहीं पाया जाता।
  • गिरफ्तारी से बचने के लिए: पुलिस आपको किसी कारण से गिरफ्तार करने के लिए वारंट लेकर आती है तो ऐसे में आप अपनी गिरफ्तारी से कुछ समय के लिए बचने के लिए अपने वकील की मदद से Stay order ले सकते है।
 

कोर्ट से स्टे ऑर्डर कैसे लेते है – पूरी प्रक्रिया

क्या आप बहुत समय से इस सवाल का जवाब खोज रहे हैं कि कोर्ट से स्टे ऑर्डर कैसे लेते हैं?  तो हमारे द्वारा आपके लिए भारत में स्टे ऑर्डर लेने की चरण-दर-चरण प्रक्रिया बहुत ही आसान भाषा मे दी गई है। जिसके द्वारा आपको इस विषय की पूरी जानकारी हो जाएगी।

चरण 1: वकील की सलाह ले

स्टे ऑर्डर लेने के लिए सबसे पहले आपको एक अनुभवी वकील से कानूनी सलाह लेनी चाहिए। वकील को अपने मामले के बारे में सारी जानकारी दे व स्टे आर्डर लेने के लिए कहे।

चरण 2: प्रासंगिक दस्तावेज़ इकट्ठा करें

इसके बाद अपने मामले से संबंधित सभी जरुरी दस्तावेजों को इक्ट्ठा करें जैसे मूल शिकायत की फोटोकॉपी, सभी जरुरी सबूत,अदालत के आदेश, व अन्य कोई आवश्यक दस्तावेज।

चरण 3: एक याचिका तैयार करें

इसके बाद अपने वकील की मदद से स्टे के लिए एक याचिका तैयार करें। इस याचिका में आप स्टेआर्डर क्यों लेना चाहते है उन सभी बातों का जिक्र करें, व अपने दावे को साबित करने के लिए सभी सबूत भी प्रदान करें। जिसके लिए आपका वकील आपकी मदद करेगा।

चरण 4: याचिका दायर करें

इसके बाद अपनी याचिका को अपने वकील की मदद से न्यायालय में लेकर जाएं और याचिका को जमा कराने की निर्धारित शुल्क को देकर जमा करें। 

चरण 5: विरोधी पक्ष को नोटिस भेजें

आपकी याचिका दायर हो जाने के बाद अपने विरोधी पक्ष  को नोटिस भिजवाएँ। जिसमें आप दूसरे पक्ष को आपके द्वारा दायर की गई याचिका व अन्य ज़रूरी दस्तावेजों की एक प्रति पहुँचाएँ।

चरण 6: सुनवाई में भाग लें

इसके बाद अदालत आपके मामले के सुनवाई के लिए तारीख निर्धारित करेगी। इसलिए अदालत द्वारा दी गई तिथि पर आपको अपने वकील के साथ अदालत में उपस्थित होना पड़ेगा। उसी दिन सभी जरूरी जानकारी व आवश्यक दस्तावेज न्यायाधीश के सामने प्रस्तुत करें। जिसके बाद आपका वकील स्टे ऑर्डर के लिए कोर्ट में बहस करेगा।

चरण 7: स्थगन आदेश प्राप्त करें

यदि अदालत आपके द्वारा दिए गए तर्कों और सभी सबूतों को सही मानती है तो स्टे ऑर्डर के आदेश दे सकती है। जिसके बाद आपके मामले से संबंधित कार्यवाही या कार्यों पर अस्थायी रुप (Temporary) से रोक लगा दी जाती है।  

चरण 8: स्थगन आदेश दे

कोर्ट से स्टे ऑर्डर मिलने के बाद दूसरे पक्ष को इसकी एक प्रति देनी होगी। जिससे उन्हें कोर्ट के फैसले का पता चल सकें व उनके द्वारा आदेशों की पालना भी की जा सकें।  

चरण 9: स्थगन आदेश का अनुपालन करें

इसके बाद दोनों पक्षों को स्टे ऑर्डर के नियमों व शर्तों का पालन करना होगा। यदि विरोधी पक्ष स्टे लगी हुई किसी भी चीज के साथ छेड़-छाड़ करता है या कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं करता है तो इसके बारे में अपनी वकील को सूचित करें।
 



स्थगन आदेश के बाद क्या होता है

भारत में स्थगन आदेश दिए जाने के बाद, आम तौर पर आगे क्या होता है:

  • स्थगन आदेश जारी होने के बाद आपके मामले से संबंधित कार्यों को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया जाता है। इसका मतलब यह है कि आपके केस से संबंधित किसी भी गतिविधि या निर्णय को अंतिम निर्णय आने तक रोक दिया जाता है।
  • इस आदेश के जारी होने के बाद आदेश के प्राप्तकर्ता को लगाई गई रोक के सभी नियमों व शर्तों का पालन करना होगा। यदि कोई भी इसका उल्लंघन करता है तो उस पर कार्रवाई की जा सकती है।
  • इसके बाद विरोधी पक्ष को स्टे ऑर्डर के बारे में सूचित करवाना जरुरी होता है जिससे उसे पता चल सके कि उसके किसी भी मामले पर आपके द्वारा कोर्ट से रोक लगवाई गई है। इसलिए विरोधी पक्ष को आदेश की एक प्रति देना ज़रूरी होता है।  
  • स्टे आर्डर के आदेश के बाद आपको अपने वकील से आगे की कानूनी कार्यवाही के लिए  तैयारी करने की कहना चाहिए। इसके साथ ही अपने केस को मजूबत करने के लिए सबूत इक्ट्ठा करें, व अंतिम निर्णय के लिए अपने वकील की सलाह लेते रहे।
  • इसके साथ ही आगे की कार्यवाही के दौरान होने वाली कोर्ट की सुनवाई व कार्यवाही के बारे में अपने वकील से पूछते रहे।
  • स्टे ऑर्डर के लगने के बाद अदालत दोनों पक्षों की ओर से सुनवाई करती है। और अंत में सभी बातों पर विचार करते हुए जिस पक्ष का केस मजबूत व सही होगा उसके लिए अपना निर्णय सुनाती है।


स्टे ऑर्डर कितने समय के लिए लिया लगता है?

स्टे लेने के लिए हाई कोर्ट या सिविल कोर्ट में अर्ज़ी लगाई जाती है, और आमतौर पर इसके लिए 7 से 21 दिन का समय लग सकता है। स्टे आर्डर में लगने वाला समय नीचे दिए गए फैक्टर पर निर्भर करता है। 

  • स्टे ऑर्डर की अवधि आपके केस पर निर्भर करती है। यदि आपका केस ज्यादा विवादित है तो उसमें समय ज्यादा लगता है।
  • इसके अलावा अलग-अलग न्यायालयों के अनुसार भी इसके समय में अंतर हो सकता  है।
  • अगर कोर्ट को स्टे ऑर्डर को बदलने या रद्द करने की आवश्यकता महसूस होती है, तो वह अपनी विवेकपूर्ण शक्ति का उपयोग करके स्टे आर्डर के समय को कम या ज्यादा भी कर सकता है।
  • कुछ विशेष परिस्थितियों में भी स्टे ऑर्डर के समय को बढ़ाया जा सकता है या उसे समाप्त भी किया जा सकता है।


स्थगन आदेश ना मानने पर क्या परिणाम होते हैं

यदि कोई व्यक्ति स्थगन आदेश का उल्लंघन करता है तो उसे भारतीय कानून के अनुसार गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए चलिए जानते हैं कि कोर्ट का स्टे ऑर्डर न मानने वाले व्यक्ति पर क्या कार्रवाई हो सकती है।  

  • कोर्ट की अवमानना करना:- स्थगन आदेश का उल्लंघन करना न्यायालय की अवमानना माना जाता है। जिसका अर्थ होता है न्यायालय के आदेशों का अपमान करना, और यह एक दंडनीय अपराध है।
  • जुर्माना:-  जो भी व्यक्ति अदालत के आदेशों का उल्लंघन करता है उस पर कोर्ट द्वारा जुर्माना लगाया जा सकता है।
  • कानूनी परिणाम:- इन आदेशों का उल्लंघन करने से आपके मामले की कानूनी स्थिति पर बहुत गलत प्रभाव पड़ता है। जिसके कारण कोर्ट के सामने आपकी विश्वसनीयता कमजोर हो जाती है और कोर्ट ऐसे मामलों को नकारात्मक रुप से देखती है।
  • आपराधिक कार्यवाही: कुछ मामलों में इन आदेशों का उल्लंघन करने पर आपके खिलाफ आपराधिक मामला भी दर्ज किया जा सकता है। जिसके कारण आपको गिरफ्तार कर मुकदमा भी दर्ज किया जा सकता है।
 

संबधित लेख:

 

कोर्ट से स्टे ऑर्डर लेने में फीस कितनी लगती है

स्टे ऑर्डर की फीस अदालत और केस के प्रकार पर निर्भर करती है, जिसमें निचली अदालतों के लिए लगभग 5000 रूपए से 10000 रूपए और उच्च न्यायालयों के लिए 30000 रूपए से 1 लाख या उससे अधिक शामिल हो सकते हैं।

वकील की फीस एक अतिरिक्त खर्च है, जो मामले के आधार पर 5000 रुपये से 50,000 या उससे अधिक हो सकती है। नीचे हमने स्टे आर्डर लेने में आने वाले खर्च को निर्धारित करने वाले फैक्टर के बारे में डिटेल में बताया है। 

  • वकील की फीस: स्थगन आदेश लेने के लिए सबसे पहले आपको एक वकील की आवश्यकता पड़ती है। जिसके लिए आपको अपने लिए किसी अच्छे वकील का चयन करना पड़ता है। आप जितना अनुभवी व अच्छा वकील अपने केस के लिए करेंगे, उतनी ही ज्यादा फीस आपको देनी पड़ेगी। इसलिए किसी भी वकील को अपना मामला सौपने से पहले उसकी फीस के बारे में अच्छे से जान ले।   
  • न्यायालय शुल्क: स्थगन आदेश के लिए याचिका दायर करते समय आपको न्यायालय के द्वारा तय किए गए शुल्क का भुगतान करना होता है। कोर्ट की फीस आपके मामले के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों के आधार पर भी फीस में बदलाव मिल सकता है। ये फीस संबंधित राज्य सरकार द्वारा निर्धारित की जाती है और कुछ सौ रुपये से लेकर कई हजार रुपये तक हो सकती है। इसलिए याचिका दायर करते समय अपने मामले पर लागू होने वाली अदालती शुल्क के बारे में अपने क्षेत्र में या अपने वकील से पूछताछ करें।  
  • प्रोसेस सर्वर शुल्क: कुछ मामलों में विरोधी पक्ष को इस आदेश का नोटिस देने की आवश्यकता पड़ती है जिसके लिए प्रोसेस सर्वर की फीस भी आपको देनी पड़ सकती है। प्रोसेस सर्वर एक व्यक्ति होता है जिसका काम किसी आदेश, नोटिस, या कानूनी प्रक्रिया के दौरान दस्तावेजों को दूसरे पक्ष तक पहुँचाने का होता है।
  • अन्य खर्च:- इन सब के अलावा भी आपका कुछ अन्य चीजों में खर्च आ सकता है जैसे सभी दस्तावेजों की फोटोकापी कराने में नोटरी शुल्क, विरोधी पक्ष को दस्तावेज भेजने के लिए कूरियर खर्च जैसे खर्च देने पढ़ सकते है।
 

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल


Stay Order क्या होता है?

यह कोर्ट द्वारा जारी किया जाना वाला कानूनी निर्देश होता है जो निचली अदालत के फैसले, आदेश या किसी भी कार्यवाही को अस्थायी रुप से रोक देता है।  


स्टे आर्डर कौन ले सकता है?

किसी भी मामले का कोई भी पक्ष स्टे आर्डर का अनुरोध कर सकता है। आमतौर पर यह उस पक्ष के द्वारा लिया जाता है जो निचली अदालत के फैसले से असहमत है और उस फैसले से होने वाली कार्यवाही को जब तक रोकना चाहता है जब तक ऊपरी अदालत उस मामले की पूरी तरह से समीक्षा ना कर ले।


क्या Stay Order के विरुद्ध अपील की जा सकती है?

हां, स्थगन आदेश से प्रभावित पक्ष इसमें बदलाव करवाने या इसके विरुद्ध High Court में अपील कर सकता है। जिसके लिए उसे सभी सबूत व तर्क प्रस्तुत करने होंगे की यह अब क्यों लागू नहीं किया जाना चाहिए।  


स्टे आर्डर कब लिया जा सकता है?  

कानूनी कार्यवाही के किसी दौरान किसी भी चरण में स्टे आर्डर लिए जाने का अनुरोध किया जा सकता है। जैसे मुकदमे के दौरान, निचली अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले के बाद, या केस शुरु होने से पहले भी। इसको लेने के  लिए उस पक्ष के पास वैध आधार या कारण होना चाहिए।


क्या स्टे ऑर्डर लगने के बावजूद संपत्ति बेची जा सकती है?

नहीं, स्टे ऑर्डर लागू रहने तक कोई भी कानूनी रूप से उस संपत्ति को नहीं बेच सकता। अगर ऐसा किया जाता है, तो यह अवमानना (Contempt of Court) मानी जाएगी और संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।