बीएनएसएस (BNSS) की धारा 351 – अभियुक्त से सवाल पूछने की कोर्ट की शक्ति


​अदालत में जब कोई मुकदमा चलता है, तो उसमें आरोपी से अपराध से जुड़े कई सवाल किए जाते हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 351 के तहत आती है। इस धारा के अंतर्गत अदालत आरोपी से यह पूछती है कि उस पर जो आरोप लगाए गए हैं, उनके बारे में उसका क्या कहना है। इस कानून का  उद्देश्य यह है कि आरोपी को अपनी सफाई देने का मौका मिले, ताकि वह यह बता सके कि जो आरोप उसके खिलाफ लगाए गए हैं, वह सही नहीं हैं।

हम सभी को यह जानना जरूरी है कि कानूनी कार्यवाही के दौरान हमें अपनी बात रखने व खुद को निर्दोष साबित करने के लिए क्या-क्या कानूनी अधिकार मिलते है। आज के लेख में हम आपको भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 351 में आरोपी व्यक्ति से पुछे जाने वाले सवालों के विषय के बारे में जानकारी देंगे कि, बीएनएसएस सेक्शन 351 क्या है? धारा 351 के तहत नियम और आरोपी के क्या अधिकार है?  

समय के साथ, कानूनों में सुधार होते रहते हैं ताकि वे और भी बेहतर तरीके से काम कर सकें। पहले हमारे पास ऐसे मामलों के लिए सीआरपीसी की धारा 313 लागू होती थी, जिसमें अदालत आरोपी से उसके खिलाफ जो सबूत हैं, उनके बारे में पूछ सकती थी। अब भारत में नया कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) लागू हो गया है।

आरोपी को अपनी बात कहने का जो मौका पहले मिलता था, वो काम अब सेक्शन 351 के तहत होता है। इसलिए अगर आप इस नए कानूनी बदलाव के साथ-साथ यह भी समझना चाहते हैं कि अदालत में आरोपी को अपनी सफाई का मौका कैसे मिलता है, तो इस लेख को पूरा ज़रूर पढ़ें।


बीएनएसएस की धारा 351 क्या है?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 351 अदालत को यह अधिकार देती है कि वह किसी आपराधिक मुकदमे की सुनवाई के दौरान आरोपी व्यक्ति से सीधे सवाल पूछ सके, ताकि यह जाना जा सके कि आरोपी के खिलाफ जो सबूत पेश किए गए हैं, उसके बारे में उसे क्या कहना है।


भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 351 कब लागू होती है?

बीएनएसएस (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita) की धारा 351 तब लागू होती है जब सरकारी पक्ष यानी सरकार की तरफ से लाए गए गवाहों और सबूतों की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। इसके बाद अदालत आरोपी को एक मौका देती है कि वह अपने पक्ष में कुछ कह सके।

यह आरोपी के लिए अपना बचाव करने का पहला अवसर होता है, जहाँ वह यह बता सकता है कि वह बेगुनाह है, उस पर लगाए गए आरोप गलत हैं, या फिर वह सबूतों के बारे में अपनी सफाई दे सकता है।

बीएनएसएस की धारा 351 की कुल 5 उपधाराएं है जो अलग-अलग प्रकार से इस कानून के प्रावधानों को बताती है आइये इनके बारे में विस्तार से जानते है:

  1. उपधारा (1) अदालत का हक: इस उपधारा में बताया गया है कि अदालत के पास यह हक है कि वह किसी भी जांच या मुकदमे के दौरान आरोपी से सवाल पूछ सके। यह इसलिए किया जाता है ताकि आरोपी खुद बता सके कि उसके खिलाफ जो सबूत पेश किए गए हैं, उनके बारे में उसकी क्या राय है। अदालत कभी भी बिना बताए भी सवाल पूछ सकती है, हाँ, छोटे-मोटे मामलों में जहाँ आरोपी को खुद आने की ज़रूरत नहीं होती वहाँ अदालत सवाल पूछना छोड़ भी सकती है।
  2. उपधारा (2) कसम नहीं दी जाती: उपधारा 351(2) में इस बात के बारे में बताया गया है कि जब अदालत आरोपी से सवाल जवाब करेगी, तो उसे किसी भी प्रकार की कसम नहीं दिलाई जाएगी (जैसे गवाहों को दिलाई जाती है)
  3. उपधारा (3) सजा नहीं दी जाएगी: इस उपधारा में यह बताया गया है कि अगर आरोपी सवालों का जवाब देने से मना कर देता है या गलत जवाब देता है, तो उसे इसके लिए उसे कोई सजा नहीं मिलेगी।
  4. उपधारा (4) जवाब का इस्तेमाल: अगर किसी आरोपी से कोई सवाल पूछा गया और उसने जो भी कहा तो, वो उस केस की कार्यवाही में काम आएगा। लेकिन अगर उसकी बातों से यह भी पता चलता है कि उसने कोई और जुर्म किया है, तो फिर वही बातें उस नए जुर्म के केस में भी सबूत की तरह पेश की जा सकती हैं।
  5. उपधारा (5) मदद और लिखाई: उपधारा 351(5) में बताया गया है कि अदालत सरकारी वकील और आरोपी के वकील से कह सकती है कि वे आरोपी से पूछने के लिए ज़रूरी सवाल तैयार करने में मदद करें। इसके अलावा, अगर आरोपी चाहे तो सवालों के जवाब लिखकर भी अदालत को दे सकता है, और इसे माना जाएगा कि उसने धारा 351 की बात मान ली है।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 351 का उद्देश्य क्या है?

बीएनएसएस की धारा 351 का सबसे मुख्य उद्देश्य यह है कि अदालत किसी मामले में फैसला लेने से पहले केवल एक पक्ष की बात न सुने, बल्कि आरोपी को भी अपनी बात रखने का पूरा अवसर दे। इससे न्याय एकतरफा नहीं होता, बल्कि सभी पक्षों को बराबरी से सुना जाता है। आइये इसको विस्तार से जानते है:-

आरोपी को अपनी सफाई देने का अवसर देना

सेक्शन 351 अदालत को यह अधिकार देती है कि वह आरोपी से सीधे सवाल पूछे और यह जानने की कोशिश करें कि उसके खिलाफ जो गवाही और सबूत पेश किए गए हैं, उस पर उसकी क्या प्रतिक्रिया है। इसका उद्देश्य यह है कि किसी भी व्यक्ति को बिना मौका दिए दोषी न ठहराया जाए।

अदालत को सही निर्णय लेने में सहायता करना

जब आरोपी अपनी बात रखता है, तो कई बार ऐसे तथ्य सामने आते हैं जो पहले अदालत के सामने नहीं आए होते। इससे अदालत को पूरे मामले को बेहतर तरीके से समझने और सही निर्णय लेने में मदद मिलती है।


धारा 351 के तहत आरोपी को मिलने वाले कानूनी अधिकार क्या है?

जब अदालत किसी मामले की सुनवाई कर रही होती है और अभियोजन पक्ष (सरकारी वकील) अपने सभी गवाहों और सबूतों को पेश कर चुका होता है, तब अदालत धारा 351 के तहत आरोपी से कुछ सवाल करती है। इस समय आरोपी को कुछ खास कानूनी अधिकार मिलते हैं, जिनके बारे में जानना बहुत जरूरी है।

1. अपनी सफाई देने का पूरा अवसर

BNSS 351 के तहत आरोपी को यह अधिकार मिलता है कि वह अदालत में अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों और पेश किए गए सबूतों पर अपनी सफाई में कुछ भी कह सकता है। वह यह बता सकता है कि जो कहा जा रहा है वह सही है या गलत, और क्यों।

2. चुप रहने का अधिकार

यदि आरोपी यह समझता है कि वह कुछ नहीं कहना चाहता, तो उसे चुप रहने का भी अधिकार है। अदालत उसे जबरदस्ती कोई जवाब देने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। यह अधिकार उसे अपने खिलाफ गलत बयान देने से बचाता है।

3. अपने पक्ष में गवाह और सबूत पेश करने का अधिकार

अगर आरोपी चाहे, तो वह अपने पक्ष में गवाहों को बुला सकता है, या ऐसे सबूत अदालत को दे सकता है जो उसे निर्दोष साबित कर सकें। अदालत उसे यह अधिकार देती है कि वह खुद को बचाने के लिए जरूरी बातों को सामने रख सके।

4. बिना दबाव के बयान देने का अधिकार

सेक्शन 351 के तहत आरोपी से जो भी सवाल पूछे जाते हैं, उसका जवाब बिना किसी दबाव, डर या लालच के दिया जाना चाहिए। अदालत को यह सुनिश्चित करना होता है कि आरोपी का बयान उसकी मर्जी से और स्वतंत्र रूप से दिया गया हो।

5. अपने वकील की मदद लेने का अधिकार

भले ही अदालत सीधे आरोपी से सवाल पूछ रही हो, लेकिन आरोपी को अपने वकील से सलाह लेने का अधिकार होता है। वह अदालत में अपने बयान से पहले या बाद में अपने वकील से बात कर सकता है।


आरोपी से सवाल जवाब की प्रक्रिया कैसे होती है?

जब किसी आपराधिक मामले की सुनवाई अदालत में चल रही होती है, तब न्यायालय कुछ तय किए गए चरणों में आगे बढ़ती है। उन्हीं में से एक महत्वपूर्ण चरण होता है, धारा 351 के तहत आरोपी से सवाल पूछना। इस प्रक्रिया को आप नीचे दिए गए आसान चरणों के माध्यम से समझ सकते हैं:

1. सरकारी पक्ष अपनी गवाही पूरी करता है

सबसे पहले सरकारी वकील की ओर से पक्ष अपने गवाहों को अदालत में बुलाकर उनसे सवाल करता है और अपने पक्ष के सबूत अदालत के सामने रखता है। इसे गवाही और जाँच कहा जाता है।

2. अदालत यह देखती है कि आरोपी के खिलाफ मामला बनता है या नहीं

जब सभी गवाहों की गवाही पूरी हो जाती है, तब अदालत यह तय करती है कि इन सबूतों के आधार पर आरोपी के खिलाफ कोई मामला बनता है या नहीं। अगर लगता है कि मामला बनता है, तो अगला कदम लिया जाता है।

3. अदालत आरोपी से सवाल पूछती है

अब अदालत बीएनएसएस सेक्शन 351 के तहत आरोपी से सीधे सवाल करती है। जैसे:

  1. तुम्हारे खिलाफ यह बात कही गई है, तुम क्या कहना चाहते हो?
  2. क्या तुम्हारे पास अपनी सफाई में कुछ कहने के लिए है?
  3. क्या तुम इस घटना में शामिल थे?
  4. यह मौका आरोपी को दिया जाता है ताकि वह अपनी बात अदालत के सामने रख सके।

4. आरोपी जवाब दे सकता है या चुप रहने का अधिकार चुन सकता है

आरोपी इन सवालों के जवाब दे सकता है या चुप भी रह सकता है, जो कि उसका कानूनी अधिकार है। अदालत उसे जवाब देने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।

5. आरोपी अपने पक्ष में गवाह या सबूत दे सकता है

अगर आरोपी चाहे, तो वह अदालत में कह सकता है कि वह अपने पक्ष में गवाहों को बुलाना चाहता है या कोई दस्तावेज देना चाहता है, जिससे वह खुद को निर्दोष साबित कर सके।


यदि आरोपी चुप रहता है तो क्या होगा?

आरोपी का चुप रहना एक कानूनी अधिकार है। इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत आरोपी को दोषी मान लेगी। यह अधिकार आरोपी को इसलिए दिया जाता है ताकि वह अपनी इच्छा से बयान दे या न दे सके। अदालत उसे जबरदस्ती जवाब देने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।


भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 351 और गवाही की प्रक्रिया में क्या अंतर है?

1. धारा 351: आरोपी से सवाल पूछना

धारा 351 के तहत, अदालत आरोपी से सीधे सवाल पूछती है। यह सवाल इस उद्देश्य से किए जाते हैं कि अदालत यह जान सके कि आरोपी अपने खिलाफ पेश किए गए सबूतों और गवाहियों के बारे में क्या कहना चाहता है।

इसमें आरोपी को अपनी सफाई देने का मौका मिलता है, और वह यह बता सकता है कि वह निर्दोष है या किसी कारणवश गलत आरोप लगाए गए हैं।

2. गवाही की प्रक्रिया: गवाहों से बयान लेना

गवाही की प्रक्रिया में, गवाहों को अदालत में बुलाया जाता है और उनसे सवाल पूछे जाते हैं। ये गवाह वे लोग होते हैं जो घटना के बारे में कुछ जानते हैं या किसी विशेष जानकारी के गवाह हैं। गवाही की प्रक्रिया में दो प्रमुख हिस्से होते हैं:

  • मुख्य गवाही: इसमें सरकारी पक्ष अपने गवाह से पहली बार सवाल करता है ताकि मामला अदालत के सामने साफ हो सके।
  • काउंटर गवाही: इसके बाद, विपक्षी वकील गवाहों से सवाल पूछता है, ताकि उनकी गवाही को चुनौती दी जा सके।
  • मुख्य बात: गवाही की प्रक्रिया में सिर्फ गवाहों से जानकारी ली जाती है, जबकि धारा 351 में आरोपी से सीधे सवाल पूछे जाते हैं।

निष्कर्ष: बीएनएसएस सेक्शन 351 एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान है जो किसी कानूनी कार्यवाही या केस के समय आरोपी को अपनी बात को कहने का मौका देती है। यह धारा न केवल अदालत को सच्चाई तक पहुंचने में मदद करती है, बल्कि आरोपी के मन में भी निष्पक्ष सुनवाई की भावना को बल देती है।



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बीएनएसएस धारा 351 पर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल


बीएनएसएस की धारा 351 कोर्ट को क्या अधिकार देती हैं?

BNSS सेक्शन 351 अदालत को यह हक देती है कि वह मुकदमे या जांच के दौरान आरोपी से सवाल पूछ सके।



अदालत आरोपी से सवाल कब पूछ सकती है?

अदालत आरोपी से सवाल मुकदमे या जांच के किसी भी समय पूछ सकती है, और अभियोजन पक्ष के गवाहों के बाद और आरोपी की सफाई से पहले ज़रूर पूछती है।



क्या आरोपी को वकील से सलाह लेने का हक है?

हाँ, आरोपी को वकील से सलाह लेने का हक है, और अदालत वकील से सवाल तैयार करने में मदद भी ले सकती है।



क्या आरोपी लिखित में जवाब दे सकता है?

हाँ, आरोपी चाहे तो सवालों के जवाब लिखकर भी अदालत को दे सकता है।