BNSS Section 183 (CRPC 164) - बयान और इक़रार (कबूलनामा) दर्ज करना


जब कोई व्यक्ति पुलिस या अदालत के सामने अपना बयान देता है, तो यह बहुत जरूरी होता है कि वह अपनी मर्जी से और बिना किसी दबाव के बयान दे। खासकर जब मामला बहुत गंभीर हो या बयान देने वाला कोई महिला, बच्चा या कमजोर व्यक्ति हो, कानून में ऐसे लोगों के लिए कुछ खास नियम बनाए गए हैं। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 183 मजिस्ट्रेट के समक्ष गवाहों के बयान और आरोपी के इक़रार (कबूलनामा) दर्ज करने की प्रक्रिया से संबंधित है।

आज के इस लेख में हम आपको कोर्ट में बयान देने व अपराध कबूल करने के नियमों से जुडी इस धारा के बारे में बताएंगे कि, बीएनएसएस सेक्शन 183 क्या है? बीएनएसएस की धारा 183 के तहत कबूलनामा और बयान का मतलब क्या होता है? सभी उपधाराओं के नियम और कानूनी प्रावधान?

अगर कोई व्यक्ति पुलिस या मजिस्ट्रेट के सामने किसी अपराध को कबूल करता है (जिसे हम स्वीकृति कहते हैं) या कोई बयान देता है, तो उसे सही तरीके से दर्ज किया जाना बहुत ही आवश्यक होता है। पहले यह काम दंड प्रक्रिया संहिता (CRPC) की धारा 164 के तहत होता था, लेकिन अब बीएनएसएस लागू हो चुका है और नई धारा के नियमों के हिसाब से यह प्रक्रिया पूरी की जाती है।

बीएनएसएस की धारा 183 और सीआरपीसी की धारा 164 में सबसे बड़ा फर्क यह है कि अब बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग भी जरूरी कर दी गई है। आइये इस सेक्शन के बारे में विस्तार से जानते है। 


बीएनएसएस​ धारा 183 क्या है - यह कब लगती है?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 183 में यह बताया गया है कि जब कोई व्यक्ति किसी अपराध के बारे में मजिस्ट्रेट को कुछ बताना चाहता है, या किसी अपराध को कबूल करता है, तो उसे कैसे लिखा जाएगा। सीधे शब्दों में कहें तो, ये धारा यह बताती है कि मजिस्ट्रेट के सामने किसी व्यक्ति के द्वारा दिए गए बयान को कैसे लिखा जाएगा।

यह कानूनी प्रावधान इस नियम को ध्यान में रखता है कि जब कोई व्यक्ति किसी अपराध के बारे में कोर्ट में बताता है, या बयान देता है तो वह अपनी बात बिना किसी डर के कह सके और उसके अधिकारों की सही तरीके से रक्षा हो।

यह नियम कब लागू होता है?

यह नियम दो मुख्य स्थितियों में लागू होता है:

  1. जब पुलिस जाँच कर रही हो: जब पुलिस किसी अपराध की जाँच कर रही होती है, तो उन्हें लोगों से जानकारी लेने की ज़रूरत होती है। ऐसे मामले के बारे में अगर कोई व्यक्ति मजिस्ट्रेट को कुछ बताना चाहता है, तो बीएनएसएस की धारा 183 के नियमों का पालन किया जाएगा।
  2. जाँच और सुनवाई से पहले: कोई भी व्यक्ति अपराध की जाँच के दौरान या बाद में, लेकिन अदालत में मामला शुरू होने से पहले, मजिस्ट्रेट को अपनी बात बता या किसी अपराध के बारे में बता सकता है। यह नियम तब लागू होता है जब पुलिस जाँच कर रही होती है और अदालत में मामला शुरू होने से पहले।

उदाहरण: मान लीजिए कि एक व्यक्ति जिसका नाम राहुल है, उसने सड़क पर होने वाले एक हादसे को देखा। अब पुलिस उस दुर्घटना की जाँच कर रही है, तो राहुल मजिस्ट्रेट को उस दुर्घटना के बारे में बताना चाहता है। इस स्थिति में धारा 183 लागू होगी। मजिस्ट्रेट राहुल का बयान लिखते समय इन बातों का ध्यान रखेगा कि राहुल अपनी बात बिना किसी दबाव के बता रहा है। मजिस्ट्रेट राहुल के बयान को लिखेगा और राहुल से उस पर हस्ताक्षर करवाएगा। मजिस्ट्रेट यह भी लिखेगा कि राहुल ने अपनी बात अपनी इच्छा से बताई है।


बीएनएसएस की धारा 183 के तहत स्वीकृति और बयान का मतलब क्या होता है?

  • स्वीकृति (कबूल करना) का मतलब है जब कोई व्यक्ति अपनी गलती या अपराध को खुद स्वीकार करता है। जैसे अगर किसी ने चोरी की है और वह खुद कहे, "हां, मैंने चोरी की थी," तो यह उसकी स्वीकृति होती है, यानी उसने अपनी गलती कबूल की।
  • बयान का मतलब है जब कोई व्यक्ति अपनी बात, जो उसने देखा या अनुभव किया, मजिस्ट्रेट (अदालत के अधिकारी) के सामने बताता है। यह हो सकता है कि वह किसी घटना के बारे में जानकारी दे या किसी चीज़ को स्पष्ट करें।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 183 को कुल 7 उपधाराओं में बताया गया है, आइये विस्तार से जानते है कि कौन सी उपधारा क्या बताती है:-

BNSS 183(1) उपधारा : व्यक्ति को समझाना

उपधारा 1 बताती है कि जब कोई व्यक्ति अपनी बात बताने या किसी बयान को बताने के लिए तैयार होता है, तो मजिस्ट्रेट उसे पहले यह समझाएगा कि वह अपनी मर्जी से बयान दे सकता है और उसे किसी भी तरह से मजबूर नहीं किया जा रहा है। मजिस्ट्रेट यह भी बताएगा कि अगर वह अपनी बात बताता है, तो उसका बयान उसके खिलाफ सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

उप-धारा 2: बयान दर्ज करने से पहले मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी

इसमें बताया गया है कि, मजिस्ट्रेट तभी किसी व्यक्ति का बयान दर्ज करेंगे, जब उन्हें यह यकीन हो कि वह व्यक्ति अपनी मर्जी से और बिना किसी दबाव के अपनी बात बता रहा है। इसके लिए मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति से पूछताछ करेंगे ताकि यह सुनिश्चित कर सके कि उसका बयान स्वेच्छा (खुद की इच्छा) से दिया गया है।

उप-धारा 3: यदि व्यक्ति स्वीकृति (किसी बात को स्वीकार करने) देने से मना करता है

अगर कोई व्यक्ति मजिस्ट्रेट के सामने जाकर अपना अपराध कबूलने से मना कर देता है, तो मजिस्ट्रेट उसे पुलिस के पास रखने की अनुमति नहीं देगा। इसका मतलब यह है कि अगर वह व्यक्ति अपनी मर्जी से कुछ नहीं बताना चाहता, तो मजिस्ट्रेट उसे पुलिस हिरासत में नहीं भेज सकते।

उप-धारा 4: स्वीकृति का रिकॉर्ड और मजिस्ट्रेट का तरीका

स्वीकृति (स्वीकार करना) कैसे दर्ज की जाती है

जब कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से कुछ स्वीकार करता है, जैसे कि उसने कोई अपराध किया है, तो यह बयान एक खास तरीके से दर्ज किया जाएगा, जैसा कि आरोपी से पूछताछ करते वक्त किया जाता है। इस बयान पर उस व्यक्ति को हस्ताक्षर करना होता है।

मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी

मजिस्ट्रेट उस बयान के नीचे एक छोटा नोट लिखेगा, जिसमें वह यह बताएगा कि उसने उस व्यक्ति को यह समझाया है कि वह अपनी मर्जी से ही यह बात कह सकता है। मजिस्ट्रेट यह भी लिखेगा कि अगर उस व्यक्ति ने यह बात स्वीकार की, तो यह उसके खिलाफ सबूत के रूप में इस्तेमाल हो सकती है। मजिस्ट्रेट को यह भी यकीन होना चाहिए कि उस व्यक्ति ने स्वेच्छा से (अपनी मर्जी से) यह बयान दिया है।

यह प्रक्रिया कैसे होती है?

यह पूरा काम मजिस्ट्रेट के सामने होता है। मजिस्ट्रेट इस बात का ध्यान रखते है, कि बयान देने वाला व्यक्ति पूरी तरह से समझे और फिर उसने जो कहा है, उसे सही मानकर हस्ताक्षर करें।

मजिस्ट्रेट का नोट

मजिस्ट्रेट इस तरह लिखेंगे:

"मैंने (व्यक्ति का नाम) को यह समझाया कि वह अपनी मर्जी से यह बात कह सकता है और अगर वह ऐसा करता है, तो यह उसके खिलाफ सबूत बन सकता है। मुझे विश्वास है कि यह बयान उसने अपनी इच्छा से दिया है। यह बयान मेरी उपस्थिति में लिया गया है और उसे पढ़कर सुनाया गया है, और उसने इसे सही माना है।"

उप-धारा 5: बयान कैसे दर्ज किया जाएगा

अगर कोई व्यक्ति मजिस्ट्रेट के सामने गवाह के तौर पर अपना बयान देता है, तो मजिस्ट्रेट बयान को सही तरीके से रिकॉर्ड करते है और ज़रूरत हो तो शपथ भी दिलवा सकते है।

उपधारा 6 — कुछ खास मामलों में बयान दर्ज करने के नियम

उपधारा 6 बताती है कि अगर किसी व्यक्ति पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की कुछ खास धाराओं (जैसे धारा 64, 65, 66, 67, 68, 69, 70, 71, 74, 75, 76, 77, 78, 79 या 124) के तहत अपराध करने का आरोप है, तो मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति का बयान विशेष रुप से कैसे दर्ज करेंगें।

इसके अलावा यह भी कोशिश की जाएगी कि यदि बयान किसी महिला का है, तो उसे महिला मजिस्ट्रेट द्वारा ही दर्ज किया जाए। और अगर महिला मजिस्ट्रेट मौजूद नहीं है, तो पुरुष मजिस्ट्रेट के साथ एक महिला की उपस्थिति में बयान लिया जाएगा।

अगर अपराध ऐसा है, जिसमें सज़ा दस साल या उससे ज़्यादा की हो सकती है, या आजीवन कारावास या फाँसी की सज़ा हो सकती है, तो मजिस्ट्रेट पुलिस द्वारा लाए गए गवाहों का भी बयान दर्ज करेगा।

अगर बयान देने वाला व्यक्ति शारीरिक या मानसिक रूप से कमजोर है (जैसे बोलने-सुनने में दिक्कत हो), तो मजिस्ट्रेट उसे बयान देने में मदद के लिए किसी जानकार व्यक्ति या विशेष शिक्षक की मदद लेगा। और ऐसे मामलों में कोशिश होगी कि उस व्यक्ति का बयान मोबाइल फोन जैसे उपकरण से ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के जरिए दर्ज किया जाए, ताकि बाद में कोई गड़बड़ी न हो।

अगर बयान देने वाला व्यक्ति शारीरिक या मानसिक रूप से कमजोर है, तो उसका जो बयान दर्ज किया गया है, उसे अदालत में सीधे मुख्य गवाही (Chief Examination) मान लिया जाएगा। मतलब कि ऐसे व्यक्ति को अदालत में दोबारा अपना बयान देने के लिए बुलाना जरूरी नहीं होगा सिर्फ उस बयान पर दूसरी तरफ के वकील जिरह (सवाल-जवाब) कर सकते हैं।

उपधारा 7 - बयान या कबूलनामे को सही मजिस्ट्रेट तक भेजने का नियम

जिस मजिस्ट्रेट ने बयान या कबूलनामा रिकॉर्ड किया है, उसका काम होता है कि वह उसे सही समय पर उस मजिस्ट्रेट के पास भेज दे, जो आगे उस केस को देखेगा। ताकि केस की जांच और सुनवाई में वह बयान सही तरीके से इस्तेमाल किया जा सके।


बीएनएसएस​ सेक्शन 183 के तहत स्वीकृति और बयान कैसे दर्ज किए जाते हैं?

जब कोई व्यक्ति किसी अपराध के बारे में मजिस्ट्रेट के सामने अपनी कोई बात बताना चाहता है, तो यह प्रक्रिया कुछ आसान तरीके से होती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि व्यक्ति अपनी मर्जी से और बिना डर के बयान दे रहा है।

1. बयान देने का तरीका

जब व्यक्ति अपनी बात बताने के लिए आता है, तो मजिस्ट्रेट उसकी बातें लिखता है, यानी जो भी व्यक्ति कहता है, उसे कागज पर लिख लिया जाता है।

2. बयान पर हस्ताक्षर

जब बयान लिख लिया जाता है, तो व्यक्ति को उस पर हस्ताक्षर करने होते हैं। इसका मतलब यह है कि व्यक्ति यह मानता है कि जो कुछ भी उसने कहा है, वह सही है और उसने अपनी मर्जी से यह सब कहा है।

3. मजिस्ट्रेट की जांच

मजिस्ट्रेट यह सुनिश्चित करता है कि व्यक्ति ने अपनी बात बिना किसी दबाव के, अपनी इच्छा से कही है। मजिस्ट्रेट लिखता है कि उसने व्यक्ति को यह समझाया था कि वह अपनी बात बताने के लिए मजबूर नहीं है, और उसने अपनी मर्जी से ही यह सब कहा है।

4. दबाव से बचाव

यह प्रक्रिया इसलिए है ताकि व्यक्ति को बयान देने में किसी भी तरह का डर या दबाव महसूस न हो। मजिस्ट्रेट यह लिखता है कि व्यक्ति ने अपनी मर्जी से और बिना किसी दबाव के बयान दिया है।


इक़रार (कबूलनामा)​ और बयान कौन दर्ज कर सकता है?

मजिस्ट्रेट के सामने कबूल करना

जब कोई व्यक्ति अपना अपराध कबूल करता है या कुछ बताने के लिए बयान देता है, तो यह काम मजिस्ट्रेट के सामने ही किया जा सकता है। मजिस्ट्रेट वह व्यक्ति होते हैं जो अदालत में मामलों की सुनवाई करते हैं और फैसले सुनाते हैं। यदि कोई व्यक्ति अपना अपराध कबूल करता है, तो उसे मजिस्ट्रेट के सामने अपनी बात कहनी होती है, और वही इस बयान को दर्ज करते हैं।

पुलिस अधिकारी क्या नहीं कर सकते?

पुलिस अधिकारी कबूल (स्वीकृति) या बयान दर्ज नहीं कर सकते। इसका मतलब है कि जब कोई व्यक्ति अपनी गलती या अपराध कबूल करता है, तो पुलिस इसे नहीं लिख सकती। हालांकि, कुछ खास मामलों में कानून पुलिस को कुछ अधिकार दे सकता है, लेकिन पुलिस फिर भी कबूल करने का बयान नहीं ले सकती।

इसका कारण यह है कि पुलिस जाँच करते समय किसी पर दबाव डाल सकती है, और हम नहीं चाहते कि कोई बिना अपनी मर्जी के कबूल करें। इसलिए यह जरूरी है कि यह बयान सिर्फ मजिस्ट्रेट (अदालत के अधिकारी) के सामने लिया जाए, ताकि इस बात का ध्यान रखा जा सके कि व्यक्ति बिना डर या दबाव के अपनी बात कह रहा है।


बीएनएसएस​ धारा 183 में कुछ अपराधों और कमजोर व्यक्तियों के लिए विशेष नियम

कुछ अपराधों के मामलों में बयान दर्ज करने के लिए विशेष नियम होते हैं। इनमें से कुछ खास मामलों के बारे में निम्नलिखित हैं:

महिला से जुड़े अपराध:

महिला से जुड़ी किसी भी घटना, जैसे दुर्व्यवहार, बलात्कार या अन्य कोई अपराध, में बयान सिर्फ एक महिला मजिस्ट्रेट ही ले सकती है। यह इसलिए जरूरी होता है ताकि महिला को खुलकर अपनी बात रखने का सुरक्षित और आरामदायक माहौल मिले। इस नियम का पालन यह सुनिश्चित करता है कि महिला को कोई असुविधा या डर न हो।

शारीरिक या मानसिक रूप से कमजोर व्यक्ति:

अगर कोई व्यक्ति शारीरिक या मानसिक रूप से कमजोर है, तो मजिस्ट्रेट को उस व्यक्ति की बात समझने के लिए एक विशेष व्यक्ति की मदद लेनी पड़ती है, जो उस व्यक्ति की भाषा को समझता हो या जिसे वह समझा सके। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति बोलने या सुनने के काबिल नहीं है, तो मजिस्ट्रेट को उस व्यक्ति को समझने के लिए मदद लेने की आवश्यकता होती है।

बच्चों के मामले:

अगर कोई बच्चा किसी अपराध के बारे में बयान देता है, तो विशेष ध्यान रखा जाता है कि उसके बयान को कैसे लिया जाए। इस मामले में भी एक महिला मजिस्ट्रेट का होना जरूरी होता है, और किसी ऐसे व्यक्ति की मदद ली जाती है जो बच्चे से सही तरीके से बात कर सके और उसे बिना डर के अपनी बात रखने में मदद कर सके।

निष्कर्ष: बीएनएसएस सेक्शन 183 का मकसद यह है कि जब कोई व्यक्ति अपना बयान देता है या किसी अपराध को कबूल करता है, तो उसे बिना किसी दबाव के, अपनी मर्जी से और सही तरीके से दर्ज किया जाए। इस धारा में महिलाओं, बच्चों और शारीरिक या मानसिक रूप से कमजोर लोगों के लिए भी खास ध्यान रखा गया है, ताकि उनके साथ न्याय हो सके।



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बीएनएसएस धारा 183 पर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल


भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 183 क्या है?

यह धारा उस प्रक्रिया के बारे में बताती है जिसका पालन तब किया जाता है जब कोई व्यक्ति किसी अपराध के बारे में मजिस्ट्रेट के सामने बयान या किसी अपराध को कबूल करता है। 



स्वीकृति और बयान में क्या अंतर है?

स्वीकृति (confession) का मतलब है कि आरोपी व्यक्ति ने यह स्वीकार किया है कि उसने अपराध किया है।

बयान (statement) का मतलब है कि व्यक्ति ने अपराध से संबंधित कोई जानकारी दी है, लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि उसने अपराध स्वीकार किया हो।



BNSS 183 की कुल कितनी उपधाराएँ है?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 183 में कुल 7 उपधाराएँ है। 



बीएनएसएस की धारा 183 के तहत स्वीकृति और बयान कौन दर्ज कर सकता है?

सेक्शन 183 के तहत केवल एक मजिस्ट्रेट ही स्वीकृति और बयान दर्ज कर सकता है। पुलिस अधिकारी को यह अधिकार नहीं है।