भारतीय संविधान - भारतीय संविधान में वर्णित समानता का अधिकार (Right to Equality in Hindi)


विवरण

सामान्य भाषा में समानता का अर्थ किसी समाज की उस स्थिति से होता है, जिसमें उस समाज के सभी लोगों को समान अधिकार या प्रतिष्ठा प्राप्त होते हैं। सामाजिक समानता के लिए 'कानून के सामने समान अधिकार' एक न्यूनतम आवश्यकता होती है, जिसके अन्तर्गत सुरक्षा, मतदान का अधिकार, भाषण की स्वतंत्रता, किसी सार्वजानिक स्थान पर एकत्र होने की स्वतंत्रता, सम्पत्ति का अधिकार, सामाजिक वस्तुओं एवं सेवाओं पर समान अधिकार आदि आते हैं। सामाजिक समानता में स्वास्थ्य सेवाओं को प्राप्त करने की समानता, आर्थिक समानता, तथा अन्य सामाजिक सुरक्षा भी आती हैं। इसके अलावा समान अवसर तथा समान दायित्व भी समानता के अधिकार के अन्तर्गत आते है।

सामाजिक समानता किसी समाज की उस अवस्था को प्रदर्शित करती है, जिसके अन्तर्गत उस समाज के सभी व्यक्तियों को बिना किसी भेदभाव के सामाजिक आधार पर समान महत्व प्राप्त हो, चाहे वह किसी भी धर्म जाति या लिंग का हो। समानता की अवधारणा मानकीय राजनीतिक सिद्धांत के मर्म में निहित होती है। यह एक ऐसा विचार है, जिसके आधार पर करोड़ों लोग सदियों से निरंकुश शासकों, अन्यायपूर्ण समाज व्यवस्थाओं और अलोकतांत्रिक हुकूमतों या नीतियों के ख़िलाफ़ संघर्ष करते रहे हैं, और करते रहेंगे, हमारे देश का विशाल इतिहास भी कुछ ऐसा ही है, जिसमें न जाने कितने वीरों ने केवल अपनी स्वतंत्रता और सामान अवसर प्राप्त करने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन कभी भी अपना सिर दुश्मन के सामने नहीं झुकाया। इस हिसाब से समानता को स्थाई और सार्वभौम अवधारणाओं की श्रेणी में रखा जाता है।

दूसरे शब्दों में दो या दो से अधिक लोगों या समूहों के बीच संबंध की एक स्थिति ऐसी होती है, जिसे समानता के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। लेकिन, एक विचार के रूप में समानता इतनी सहज और सरल नहीं है, क्योंकि उस संबंध को परिभाषित करने के लिए, उसके लक्ष्यों को निर्धारित करने और उसके एक पहलू को दूसरे पर प्राथमिकता देने के एक से अधिक तरीके हमेशा उपलब्ध रहते हैं। अलग - अलग तरीकों से समानता को प्रदर्शित करने पर समानता के विचार की भिन्न - भिन्न परिभाषाएँ उभर कर सामने आती हैं। प्राचीन यूनानी सभ्यता से लेकर बीसवीं सदी तक इस विचार की रूपरेखा में कई बार ज़बरदस्त परिवर्तन हो चुके हैं। बहुत से चिंतकों ने इसके विकास और इसमें हुई तब्दीलियों में योगदान किया है, जिनमें अरस्तू, हॉब्स, रूसो, मार्क्स और टॉकवील जैसे महान विचारक प्रमुख हैं।
 

भारत के संविधान में समानता के अधिकारों का स्थान

हमारे देश के संविधान में समानता के अधिकारों का स्थान बहुत ही प्रमुख है। भारतीय संविधान के भाग 3 में वर्णित मौलिक अधिकारों की सूचि में समानता के अधिकारों को भी स्थान दिया गया है, ये अधिकार अनुच्छेद 14 से लेकर अनुच्छेद 18 तक व्याप्त हैं, जिनमें देश के प्रत्येक नागरिक को सभी क्षेत्र में सामान अधिकार प्रदान कराने की बात की गयी है, तो आइये देखते हैं किस प्रकार संविधान में समानता के अधिकारों को रखा गया है:
 

  1. विधि के समक्ष समानता का अधिकार

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में इस अधिकार का वर्णन किया गया है। विधि के समक्ष समता के अधिकार का यह भी अर्थ है, कि जन्म या विचार या संप्रदाय के आधार पर किसी भी व्यक्ति का कोई विशेषाधिकार नहीं होगा तथा देश का सामान्य कानून सभी वर्ग के लोगों पर समान रूप से लगाया जाएगा। कोई भी व्यक्ति देश के कानून से ऊपर नहीं है, और देश के सभी लोग देश के साधारण न्यायालयों की अधिकार सीमा में हैं। प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह देश के प्रधानमंत्री हो या सामान्य जीवन स्तर में रहने वाला गरीब किसान हो या कोई विदेशी व्यक्ति हो यदि उसने देश के राज्यक्षेत्र के भीतर किसी प्रचलित कानून का उल्लंघन किया है, तो वह व्यक्ति अपने उस कार्य के लिए समान रूप से जिम्मेदार होगा। इसी तरह आम नागरिक और पदाधिकारियों में भी भेद नहीं किया जाएगा।

केवल राष्ट्रपति और राज्यपाल को इस अधिकार में कुछ छूट मिली है। राष्ट्रपति और राज्यपाल अपने पद के किसी कार्य के लिए न्यायालय में जिम्मेदार नहीं होंगे। इसी तरह इनकी पदावधि के दौरान इन पर किसी भी न्यायालय में कोई भी फौजदारी मामला दाखिल नहीं किया जा सकता है। राष्ट्रपति या राज्यपाल का पद ग्रहण करने से पहले इनके द्वारा व्यक्तिगत हैसियत से किए गए किसी कार्य के लिए किसी भी न्यायालय में कोई दीवानी मामला 60 दिनों से पहले की लिखित पूर्व सूचना के बाद ही चलाया जा सकता है, अन्यथा नहीं। लेकिन सरकार के किसी कार्य के खिलाफ न्यायालय में वाद लाया जा सकता है, चाहे वह कार्य राज्यपाल या राष्ट्रपति के नाम से ही क्यों न किया गया हो।
 

  1. धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(1) के अनुसार राज्य, किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई भेद नहीं करेगा। यहां केवल शब्द बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि विभेदकारी व्यवहार के लिए इस अनुच्छेद में गिनाए गए आधार के अलावा अन्य आधार पर किया गया वर्गीकरण या विभेद संविधान विरुद्ध नहीं माना जाएगा। किंतु यदि किसी नागरिक के साथ राज्य द्वारा केवल इसलिए भेदभाव किया जाता है, कि वह किसी विशेष धर्म, वंश, जाति का है, या क्षेत्र अथवा स्थान विशेष में पैदा हुआ है, तो वह न्यायालय के माध्यम से राज्य की कार्यवाही को शून्य घोषित करवा सकता है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15(2) कुछ इस प्रकार है- भारत देश के किसी भी नागरिक को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी के आधार पर दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश करने से नहीं रोका जा सकता। इसी तरह कुओं, तालाबों, स्नान घाटों, सड़कों और सार्वजनिक स्थानों के उपयोग से भी किसी नागरिक को वंचित या बाधित नहीं किया जा सकता यदि वे पूरी तरह या अंशत: सरकरी खर्चे से बने हुए हों या सरकारी खर्च से संचालित हों या फिर निजी होते हुए भी सार्वजनिक उपयोग के लिए समर्पित हों।

लेकिन अनुच्छेद 15 का खंड 3  राज्य को यह अधिकार देता है, कि वह स्त्रियों और बालकों के कल्याण के लिए विशेष उपाय कर सकता है। इसी तरह खंड 4 के अनुसार राज्य सामाजिक या शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए या अनुसूचित जाति या जनजातियों के लिए विशेष उपाय कर सकता है। ठीक इसी तरह अनुच्छेद 15(1) में जाति के आधार पर भेदभाव का निषेध होते हुए भी अनुच्छेद 15 के खंड (5) के अनुसार राज्य उक्त वर्गों के लिए शिक्षण संस्थानों में प्रवेश हेतु आरक्षण तथा फीस में छूट आदि विशेष उपाय भी कर सकता है।
 

  1. लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानता का अधिकार

अनुच्छेद 16 के अनुसार देश के समस्त नागरिकों को शासकीय सेवाओं में सामान अवसर प्रदान किये जाएंगे। इसी अनुच्छेद के अनुच्छेद 16(3) के अनुसार संसद कोई ऐसा कानून बना सकती है, जिसमें किसी विशेष क्षेत्र में नौकरी के लिए किसी विशेष क्षेत्र के निवासी होने की शर्त रख सकती है। अनुच्छेद 16(4) के अनुसार देश के पिछड़े नागरिकों को उचित प्रतिनिधित्व के अभाव में आरक्षण की व्यवस्था की जा सकती है।
 

  1. अस्पृश्यता का अंत

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के अनुसार अस्पृश्यता का अन्त किया गया है । इसको समाप्त करने के लिए संसद ने अस्पृश्यता अपराध अधिनियम 1955 के तहत अस्पृश्यता को दण्डनीय बना दिया है । बाद में 1976 में इसको संशोधित करके सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम 1976 बनाया गया।
 

  1. उपाधियों का अंत

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 18 के अनुसार शिक्षा और सैनिक क्षेत्र को छोड़कर राज्य द्वारा सभी उपाधियों का अन्त कर दिया गया है, अनुच्छेद 18(2) के अनुसार भारत का कोई भी नागरिक किसी भी विदेशी पुरस्कार को राष्ट्रपति की अनुमति के बिना ग्रहण नहीं कर सकता।


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