अनुच्छेद 300A- Article 300A in Hindi| भारतीय संविधान

भारतीय संविधान अनुच्छेद 300A (Article 300A in Hindi) - विधि के प्राधिकार के बिना व्यक्तियों को संपत्ति से वंचित न किया जाना


विवरण

किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से विधि के प्राधिकार से ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।]*

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* संविधान (चवालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 34 द्वारा (20-6-1978 से) अंतःस्थापित।


भारतीय संविधान का अनुच्छेद 300 A (विधि के प्राधिकार के बिना व्यक्तियों को संपत्ति से वंचित न किया जाना)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 300 ‘अ’ के अंतर्गत भारत के प्रत्येक नागरिक को उसकी संपत्ति के अधिकार के बारे में बताया गया है। इस अनुच्छेद के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति या कोई निजी या सार्वजनिक संस्था किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति का क़ानूनी तरीके से प्रयोग करने से या किसी अन्य व्यक्ति को बेचने या कोई नई संपत्ति खरीद कर अपनी संपत्ति का विस्तार करने से रोक नहीं सकता है। किन्तु इस अधिकार के लिए भी कुछ अपवाद हैं, जिनमें से यदि सार्वजनिक हित या देश हित में किसी बहुत आवश्यक काम से किसी व्यक्ति की संपत्ति की आवश्यकता पड़ती है, तो उस व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित भी किया जा सकता है, उदहारण के लिए सड़क का निर्माण, रेलवे का नवीनीकरण और नया निर्माण, या किसी सार्वजनिक भवन का निर्माण के लिए, हवाई अड्डा आदि के निर्माण और नवीनीकरण करने के लिए एक या अधिक व्यक्तियों की संपत्ति को लिया जा सकता है, लेकिन उसकी संपत्ति लेने के बदले में उस व्यक्ति को उचित मुआवजा देना अनिवार्य होता है। यदि उस व्यक्ति को उसकी संपत्ति की कीमत के हिसाब से उचित मुआवजा नहीं मिलता है, तो वह व्यक्ति न्यायालय में आवेदन कर सकता है।


संपत्ति के अधिकार में अभी तक क्या क्या परिवर्तन हुए

भारतीय संविधान के अनुसार संपत्ति का अधिकार एक मौलिक अधिकार हुआ करता था, किन्तु फिर बाद में इसे मौलिक अधिकार से हटाकर केवल एक क़ानूनी अधिकार बना दिया गया। भारत के स्वतन्त्र होने के बाद जब देश के लिए संविधान बनाने की जरुरत सामने आयी, तभी पहली बार अपने संविधान द्वारा संपत्ति के अधिकार को अपनाया गया, जब संविधान का निर्माण किया गया तब यह संपत्ति के अधिकार वाला अनुच्छेद मौलिक अधिकारों वाले भाग में अनुच्छेद 19 (1) (एफ) में निहित एक मौलिक अधिकार था। अनुच्छेद 19 (1) (एफ) को "कानून के अधिकार" के बिना सरकार को उस व्यक्ति की संपत्ति से वंचित करने से रोकने के लिए संविधान के अनुच्छेद 31 के साथ पढ़ा जाता है। अनुच्छेद 19 (1) (एफ) और अनुच्छेद 31 दोनों ही भारत सरकार के लिए बहुत बड़ी समस्या के रूप में सामने आये। क्योंकि इन प्रावधानों ने सरकार के लिए भूमि सुधारों और राष्ट्रीयकरण योजनाओं के अपने समाजवादी एजेंडे के साथ आगे बढ़ना बहुत मुश्किल बना दिया था।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा वर्ष 1975 में लगाए गए आंतरिक आपातकाल को हटाने के बाद हुए चुनावों में, सन 1977 में जनता पार्टी के महागठबंधन ने कांग्रेस पार्टी का सफाया कर दिया था। इसके एक साल बाद 1978 में जनता पार्टी ने भारत के संविधान में एक 44 वां संशोधन पारित किया था। इन संशोधनों के एक भाग के रूप में संविधान से अनुच्छेद 19 (1) (एफ) और अनुच्छेद 31 दोनों को हटा दिया गया था, जिसमें भारतीय नागरिकों के लिए संपत्ति का अधिकार एक मौलिक अधिकार के रूप में दिया गया था। हालांकि अनुच्छेद 31 को केवल इस अर्थ में हटा दिया गया था कि अनुच्छेद 31 (1) जो प्रदान करता था, वह है कि "किसी व्यक्ति को कानून के किसी भी प्रावधान से उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा", इसी कारण संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों के अध्याय से बाहर स्थानांतरित कर दिया गया था, और इस अधिकार को भारतीय संविधान के भाग XII में अनुच्छेद 300A के रूप में स्वीकार किया गया।


अनुच्छेद 300 'अ' के मामलों में एक वकील की जरुरत क्यों होती है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 300 'अ' प्रारम्भ में भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार का ही एक हिस्सा था, जिसे बाद में 44 वां संसोधन में मौलिक अधिकार की श्रेणी से हटाकर एक साधारण अधिकार बना दिया था, जिसमें यह कहा गया था, कि भारत में कोई भी व्यक्ति या संस्था या सरकार किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति के अधिकार से वंचित नहीं कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति या केंद्र या राज्य सरकार ऐसा कार्य करती है, तो उसे पीड़ित व्यक्ति को उचित मुआवजा देना अनिवार्य होगा, अगर कोई व्यक्ति या कोई सरकार ऐसा नहीं करती है तो पीड़ित व्यक्ति अपनी शिकायत न्यायालय में कर सकता है। इसी कारण एक वकील ही एकमात्र ऐसा यन्त्र होता है, जो किसी पीड़ित व्यक्ति को सही रास्ता दिखाने में लाभकारी सिद्ध हो सकता है, क्योंकि वकील को कानून और संविधान की उचित जानकारी होती है, तो वह मामले से सम्बंधित सभी प्रकार के उचित सुझाव भी दे सकता है। लेकिन इसके लिए हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस वकील को हम अपने मामले को सुलझाने के लिए नियुक्त कर रहे हैं, वह अपने क्षेत्र में निपुण वकील होना चाहिए, और उसे संविधान से सम्बंधित और अनुच्छेद 300 'अ' के मामलों से निपटने का उचित अनुभव होना चाहिए, जिससे आपके केस जीतने के अवसर और भी बढ़ सकते हैं।


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