भारतीय संविधान अनुच्छेद 21 (Article 21 in Hindi) - प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण


विवरण

किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण)

अनुच्‍छेद 21 के अंतर्गत स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य की सावधानी का अधिकार वैसा ही है, जैसे जीवन का अधिकार होता है। यह अनुच्छेद भारत के प्रत्येक नागरिक के जीवन जीने और उसकी निजी स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है, यदि कोई अन्य व्यक्ति या कोई संस्था किसी व्यक्ति के इस अधिकार का उल्लंघन करने का प्रयास करता है, तो पीड़ित व्यक्ति को सीधे उच्चतम न्यायलय तक जाने का अधिकार होता है। अन्य शब्दों में किसी भी प्रकार का क्रूर, अमाननीय उत्‍पीड़न या अपमान जनक व्‍यवहार चाहे वह किसी भी प्रकार की जॉंच के दौरान पूछे जाने वाले प्रश्‍न से या किसी अन्‍य स्‍थान पर हो, तो यह इस अनुच्‍छेद 21 का अतिक्रमण करता है, जो कि भारतीय संविधान के अनुसार वर्जित है। यह एक मूल अधिकार है, इसमें कहा गया है, कि किसी व्‍यक्ति को उसके जीवन और निजता की स्‍वतंत्रता से बंछित किये जाने संबंधी कार्यवाही उचित ऋजु एवं युक्तियुक्‍त होनी चाहिए। य‍ह सब अनुच्‍छेद 21 के अंतर्गत आता है।
 

अनुच्‍छेद 21 का इतिहास

भारत में इस व्यापक अनुच्छेद का जन्म भारतीय संविधान के बनने के साथ ही हुआ था, और इसे संविधान के भाग 3 में मौलिक अधिकारों की श्रेणी में रखा गया। संविधान के निर्माण के उपरांत इसे 26 जनवरी 1950 में पूरे देश में लागू कर दिया गया था, और यह जापान से लिया गया है, जिसके अंतर्गत देश का कोई भी नागरिक अपने जीवन या फिर व्यक्तिगत स्‍वतंत्रता से वंछित नहीं रहेगा।
 

अनुच्‍छेद 21 का उद्धेश्‍य

जैसे कि हम जानते है, कि यह अनुच्छेद भारतीय संविधान के भाग 3 में मौलिक अधिकारों की श्रेणी में वर्णित है। यह बहुत ही महत्वपूर्ण अनुच्छेद माना जाता है, इस अनुच्छेद का उद्देश्य भी बहुत व्यापक है, जिसके अनुसार सभी व्‍यक्तियों को समान रूप से जीवन जीने दिया जाये और किसी व्यक्ति पर किसी प्रकार की जोर जबरदस्‍ती न की जाये, इसके अंतर्गत ह‍र व्‍यक्ति को एक गुरूत्‍वाकर्षण जीवन जीने की जरूरत है, ताकि वह अपने जीवन को अच्‍छा और फलदायी तथा उसे बेहतर से बेहतर बना सके। यहां जीवन जीने का अधिकार अपने आप में एक व्यापक अर्थ लिए हुए हैं जीवन जीने के अधिकार से मतलब पशुओं की भाँति जीवन जीने से नहीं है बल्कि प्रतिष्ठित अथवा मानव गरिमा युक्त जीवन जीने से है।
जीवन जीने के अधिकार के अंतर्गत निम्न अधिकारों को सम्मिलित किया गया है यह निम्न प्रकार है:

  1. चिकित्सा का अधिकार

  2. शिक्षा का अधिकार

  3. पर्यावरण संरक्षण का अधिकार

  4. त्वरित विचारण का अधिकार

  5. कामकाजी महिलाओं का यौन शोषण से संरक्षण का अधिकार

  6. निशुल्क विधिक सहायता का अधिकार

  7. लावारिस मृतकों का शिष्टता एवं शालीनता से दाह संस्कार का अधिकार

  8. भिखारियों के पुनर्वास का अधिकार

  9. धूम्रपान से संरक्षण का अधिकार

  10. विद्यार्थियों का रैगिंग से संरक्षण का अधिकार

  11. सौंदर्य प्रतियोगिताओं में नारी गरिमा को बनाए रखने का अधिकार

  12. बिजली एवं पानी का अधिकार

  13. हथकड़ी , बेडियों एवं एकांतवास से संरक्षण का अधिकार

  14. प्रदूषण रहित जल एवं हवा का उपयोग करने का अधिकार
     

यहाँ यह उल्लेखनीय है, कि प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार भी अबाध नहीं है, अर्थात् इस अधिकार में भी कुछ प्रतिबन्ध लगाए गए हैं, जिसे विधि द्वारा विहित प्रक्रिया द्वारा छीना भी जा सकता है। लेकिन ऐसी विधि का युक्तियुक्त एवं नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के अनुकूल होना चाहिए कोई भी मनमानी विधि बनाकर किसी व्यक्ति को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
 

अनुच्छेद 21 का विस्तार क्षेत्र

अनुच्छेद 21 का दायरा 1950 के दशक तक थोड़ा संकरा था, क्योंकि ए. के. गोपालन बनाम स्टेट ऑफ़ मद्रास में शीर्ष न्यायालय द्वारा यह निष्कर्ष निकाला गया था, कि अनुच्छेद 21 और 19 (1) (डी) की विषय वस्तु और विषय समान नहीं हैं। इस मामले में वंचित शब्द को संकुचित अर्थ में रखा गया था और यह निष्कर्ष निकाला गया था कि वंचितता अनुच्छेद 19 (1) (डी) के तहत आने वाले किसी व्यक्ति को देश में स्वतंत्र रूप से स्थानांतरित करने के अधिकार पर रोक नहीं लगाती है। उस समय संविधान के कुछ अन्य लेखों के साथ अनुच्छेद 21 के संबंध में ए. के. गोपालन मामला बहुत ही प्रमुख मामला था, लेकिन बाद में गोपालन मामले को अनुच्छेद 21 के दायरे के संबंध में कुछ अन्य मामलों के साथ संसोधन करके विस्तार किया गया है, और यह माना जाता है, कि किसी व्यक्ति के घर में या जब वह जेल में बंद हो तब उसकी स्वतंत्रता के साथ हस्तक्षेप करने के लिए कानून के अधिकार की आवश्यकता होगी। क्या अनुच्छेद 19 के संदर्भ में दंडात्मक कानून की निष्पक्षता की जांच की जा सकती है, यह मेनका गांधी बनाम भारत संघ के मामले में गोपालन मामले के बाद मुद्दा था, इसके बाद शीर्ष न्यायालय ने एक नया आयाम खोला और कहा कि यह प्रक्रिया मनमानी, अनुचित या अनुचित नहीं हो सकती है। अनुच्छेद 21 ने भारत के राज्यों पर भी प्रतिबंध लगाया कि कोई भी राज्य किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं कर सकता है।
 

अनुच्छेद 21 किस - किस पर लागू हो सकता है

इस अनुच्छेद का अधिकार क्षेत्र बहुत ही व्यापक है, और यह नियम उन सभी व्यक्तियों पर लागू होता है, जो कि भारत के मूल निवासी हैं, और जिनके पास भारत देश की नागरिकता है। इसमें किसी भी व्यक्ति के लिए कोई रोक - टोक नहीं होती है, सभी को समानता का अधिकार है।
 

अनुच्छेद 21 के मामलों में एक वकील की जरुरत क्यों होती है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 संविधान के मौलिक अधिकार का एक हिस्सा है, जिसमे यह कहा गया है कि भारत में कानून द्वारा स्थापित किसी भी प्रक्रिया के आलावा कोई भी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को उसके जीवित रहने के अधिकार और निजी स्वतंत्रता से वंचित नहीं कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति ऐसा कार्य करता है, तो पीड़ित व्यक्ति को अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सर्वोच्छ न्यायालय जाने का अधिकार है, वह सर्वोच्छ न्यायालय में किसी सुप्रीम कोर्ट के वकील के माध्यम से अपनी याचिका दायर कर सकता है। इसी कारण एक वकील ही एकमात्र ऐसा यन्त्र होता है, जो किसी पीड़ित व्यक्ति को सही रास्ता दिखने में लाभकारी सिद्ध हो सकता है, क्योंकि वकील को कानून और संविधान की उचित जानकारी होती है, तो वह मामले से सम्बंधित सभी प्रकार के उचित सुझाव भी दे सकता है। लेकिन इसके लिए हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस वकील को हम अपने मामले को सुलझाने के लिए नियुक्त कर रहे हैं, वह अपने क्षेत्र में निपुण वकील होना चाहिए, और उसे संविधान से सम्बंधित और अनुच्छेद 21 के मामलों से निपटने का उचित अनुभव होना चाहिए, जिससे आपके केस जीतने के अवसर और भी बढ़ सकते हैं।


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