धारा 33 - भारतीय साक्ष्य अधिनियम in Hindi (Section 33 of Indian Evidence Act)
विवरण
33. किसी साक्ष्य में कथित तथ्यों की सम्यता को प्रश्चात्वर्ती कार्यवाही मेंसाबित करने के लिए उस साक्ष्य की सुसंगति- वह साक्ष्य, जो किसी साक्षी ने किसी न्यायिक कार्यवाही में, या किसी साक्षी ने किसी न्यायिक कार्यवाही में, या विधि द्वारा उसे लेने के लिए प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष दिया है, उन तथ्यों की सत्यता को, जो उस साक्ष्य में कथित है, किसी पश्चातवर्ती न्यायिक कार्यवाहि में या उसी न्यायिक कार्यवाही के आगामी प्रक्रम में साबित करने के प्रयोजन के लिये तब सुसंगत है; जबकि वह साक्षी मर गया है या मिल नहीं सकता है, या वह साक्ष्य देने के लिए असमर्थ है या प्रतिपक्षी द्वारा उसे पहुँच के बाहर कर दिया गया है अथवा यदि उसकी उपस्थिति इतने विलम्ब या व्यय के बिना, जितना कि मामले को परिस्थितियों में न्यायालय अयुक्तियुक्त समझता है, अभिप्राप्त नहीं की जा सकती।
प्ररन्तु वह तब जब कि वह कार्यवाही उन्हीं पक्षकारों या उनके हित प्रतिनिधियों के बीच में थी, प्रथम कार्यवाही में प्रतिपक्षी को प्रतिपरीक्षा का अधिकार और अवसर था, विवाद्य प्रश्न ािर्यवाही में सारतः वही थे जो द्वितीय कार्यवाही में हैं।
स्पष्टीकरण- दाण्डिक विचारण या जांच इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत अभियोजक और अभियुक्त के बीच कार्यवाही समझी जायेगी।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम - 1872 ,अधिक पढ़ने के लिए, यहां क्लिक करें