SC ST एक्ट में आरोपी ने सरेंडर किया है उसकी जमानत अर्जी कैसे खारिज कराएं


सवाल

SC ST ACT 3(1D) 3(1DHA) CHARGESHEET DAKHUL HO GAYA HAI 2 BAAR SUMMAN 2 BW 1 NBW HUA HAI NBW HONE KE BAAD ABHIYUKT COURT ME SURRENDER KAR DIYA HAI USNE BAIL KE LIYE APPLICATION DALA HAI BAI APPLICATION KAISE REJECTED HO SAKTA HAI

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अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम की दो धाराओं के तहत अभियोग पत्र न्यायालय में दाखिल हो चुका है। उसके पश्चात दो बार समन, फिर दो बार गिरफ्तारी वारंट और अंत में एक कुटज्ञापन वारंट जारी होने के बाद आरोपी व्यक्ति ने न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया है, और अब उसने जमानत के लिए आवेदन दिया है। यहाँ एक महत्वपूर्ण बात यह है कि आत्मसमर्पण करने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि जमानत अवश्य मिलेगी।

हालाँकि, कुटज्ञापन वारंट के बाद अपनी इच्छा से न्यायालय में उपस्थित होना एक सकारात्मक पहलू अवश्य है, परंतु इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि जमानत से वंचित होने की संभावना समाप्त हो गई है। न्यायालय जमानत पर विचार करते समय अनेक पहलुओं को गंभीरता से परखता है। अधिनियम की विशेष प्रकृति के कारण, न्यायालय अपना निर्णय देने से पहले राज्य के वकील को सुनना अनिवार्य मानता है, जिससे अभियोजन पक्ष को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलता है।

यदि अभियोजन पक्ष यह सफलतापूर्वक सिद्ध कर देता है कि आरोपी के मुक्त रहने पर वह गवाहों को धमका सकता है, साक्ष्यों को मिटा सकता है, या अपनी उपस्थिति से दूर भाग सकता है, तो न्यायालय उसकी जमानत को अस्वीकार कर सकता है। एक और बात जो उसके लिए संकट उत्पन्न कर सकती है, वह है पहले जारी हुए कुटज्ञापन वारंट का तथ्य, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि वह पहले न्यायिक प्रक्रिया से बचने का प्रयास कर चुका है, जो उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़ा करता है। साथ ही, यदि उसके विरुद्ध पूर्व में कोई अन्य आपराधिक मामला दर्ज है, या जाँच रिपोर्ट में उसकी भूमिका को अत्यंत गंभीर माना गया है, तो ऐसी परिस्थिति में न्यायालय उसके आवेदन को अस्वीकार कर सकता है। इसलिए, मात्र आत्मसमर्पण जमानत की गारंटी नहीं है; सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके विधि विशेषज्ञ न्यायालय को उसके मुक्त रहने से फरार न होने, साक्ष्यों से छेड़छाड़ न करने, और न्यायिक प्रक्रिया में पूर्ण सहयोग देने की गहन आश्वस्ति कितनी सक्षमता से दिला पाते हैं।


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