माता पिता की संपत्ति में बेटी का अधिकार - पैतृक संपत्ति में शादीशुदा बेटी का हक



हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम, 2005 के तहत बेटियों को उनके पिता की पैतृक संपत्ति में बेटों के समान अधिकार प्राप्त हैं। पिता की संपत्ति में पुत्री का अधिकार जन्म से ही लागू होता है। शादी के बाद भी यह अधिकार बना रहता है, क्योंकि अब अविवाहित और विवाहित दोनों बेटियों को बेटों के समान ही संपत्ति का अधिकार मिलता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से यह स्पष्ट हो गया है कि बेटियों को 2005 से पहले पिता की मृत्यु होने पर भी हक मिल सकता है, यदि संपत्ति का बंटवारा, हस्तांतरण या बिक्री 20 दिसंबर 2004 से पहले नहीं हुआ था। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि बाप की संपत्ति में बेटी का कितना हक़ होता है, पैतृक और माँ की संपत्ति में उनकी हिस्सेदारी कैसे तय होती है, और इसके लिए आवश्यक कानूनी प्रक्रिया।


विषयसूची

  1. माता-पिता की संपत्ति पर बेटी का अधिकार (Daughter Rights In Parents Property)
  2. पैतृक संपत्ति में बेटियों का अधिकार (Daughter?s Right In Ancestral Property)
  3. क्या लड़की पिता की संपत्ति में अपना हिस्सा मांग (दावा कर) सकती है?
  4. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 क्या है? (What is Hindu Succession Act 1956)
  5. हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 क्या है?
  6. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अनुसार संपत्ति के प्रकार
  7. पिता की स्व-अर्जित (खरीदी हुई) संपत्ति में बेटी का अधिकार
  8. विवाहित पुत्री का पैतृक संपत्ति पर अधिकार (Married Daughter's Right In Property)
  9. शादीशुदा बेटी का पिता की खरीदी हुई संपत्ति पर अधिकार
  10. माँ की संपत्ति में बेटी का अधिकार
  11. 2005 के संशोधन से पहले पिता की मृत्यु होने पर बेटी का उत्तराधिकार का अधिकार
  12. मुस्लिम, ईसाई और पारसी कानूनों के तहत बेटियों का विरासत का अधिकार
  13. मुसलमानों में लड़की का संपत्ति पर अधिकार
  14. ईसाई और पारसियों में लड़की का संपत्ति पर अधिकार
  15. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल


माता-पिता की संपत्ति पर बेटी का अधिकार (Daughter Rights In Parents Property)

जहां बेटों को जन्म से अपने माता- पिता की संपत्ति पर अधिकार था, वहीं बेटियों को यह हक पहले नही था,  हालाँकि, 2005 के हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम के तहत शादी से पहले और शादीशुदा बेटियों को भी बेटों के समान ही संपत्ति में अधिकार प्रदान कर दिए गए है।



हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 क्या है? (What is Hindu Succession Act 1956)

हिंदुओं (बौद्ध, जैन और सिख सहित) के लिए, उत्तराधिकार से संबंधित कानूनी मुद्दे हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 द्वारा शासित होते हैं। यह अधिनियम उत्तराधिकार से संबंधित है, जब कोई व्यक्ति वसीयत किए बिना मर जाता है, या इस बारे में घोषणा किए बिना कि उसकी संपत्ति का उत्तराधिकारी कौन होना चाहिए।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 हिंदुओं में उत्तराधिकार के मामलों के लिए एक समान प्रणाली निर्धारित करता है जिसमें उत्तराधिकार और विरासत दोनों शामिल हैं।

जाने - वसीयतनामा क्या होता है? वसीयत बनाने के नियम और प्रारूप



हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 क्या है?

वर्ष 2005 में संसद द्वारा हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम लाया गया, जिसके तहत संयुक्त हिंदू परिवार में बेटियों को बेटों के समान ही पैतृक संपत्ति अधिकार प्रदान किए गए। ये एक्ट 174वें विधि आयोग की रिपोर्ट की सिफारिशों पर आधारित था, जिसमें दोनों लिंगों (बेटे-बेटी) के लिए समान व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए कोड में बदलाव लाने की वकालत की गई थी।



हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अनुसार संपत्ति के प्रकार

  1. पैतृक संपत्ति: यह वह अविभाजित संपत्ति है जो चार पीढ़ियों से हिंदू संयुक्त परिवार को अपने पिता, दादा या परदादा से जन्म के आधार पर विरासत में मिलती है।
  2. स्व-अर्जित संपत्ति: यह एक ऐसी संपत्ति है जिसे किसी व्यक्ति ने अपने स्वयं के धन से खरीदा हो। जिस व्यक्ति ने इसे खरीदा है, उसके पास इसके उपयोग और निपटान पर पूर्ण अधिकार और नियंत्रण है।
 

पैतृक संपत्ति में बेटियों का अधिकार (Daughter’s Right In Ancestral Property)

हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 के लागू होने के बाद बेटियों को बेटे की तरह ही कानूनी उत्तराधिकारी के रूप में जन्म से ही पैतृक संपत्ति में बराबर का अधिकार प्राप्त हो गया है, भले ही उनके पिता की मृत्यु 2005 से पहले हो गई हो।
 



पिता की स्व-अर्जित (खरीदी हुई) संपत्ति में बेटी का अधिकार

हालांकि, हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 के अनुसार पैतृक संपत्ति की तरह ही पिता की स्व-अर्जित संपत्ति में भी बेटियों को बराबरी का अधिकार प्राप्त हो गया है।

लेकिन जैसा की हम पहले ही बता चुके है की स्व-अर्जित संपत्ति वह संपत्ति होती है जिसे कोई व्यक्ति अपने स्वयं के धन से खरीदता है, इसलिए उस व्यक्ति को अपनी स्व-अर्जित संपत्ति के संबंध में अपनी इच्छानुसार फैसला लेने का अधिकार होता है।

माता पिता स्वर अपने पैसे से खरीदी प्रॉपर्टी के मामले में, एक पिता अपने बेटों या बेटियों को संपत्ति नहीं देने का फैसला भी कर सकता है, और उसके पास अपनी इच्छानुसार वसीयत के द्वारा किसी अन्य को वह संपत्ति देने का विकल्प भी होता है।
 

विवाहित पुत्री का पैतृक संपत्ति पर अधिकार (Married Daughter's Right In Property)

भारत में, विवाहित (शादीशुदा) पुत्री को पैतृक संपत्ति में अविवाहित बेटी के समान ही अधिकार है। हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 के अनुसार, संपत्ति को बेटियों और बेटों सहित सभी कानूनी उत्तराधिकारियों के बीच बराबरी से बांटा जाएगा।
 



शादीशुदा बेटी का पिता की खरीदी हुई संपत्ति पर अधिकार

पैतृक संपत्ति की तरह ही विवाहित पुत्री को पिता की स्व-अर्जित (खरीदी हुई) संपत्ति मे अविवाहित बेटी के समान ही अधिकार दिया गया है।

इसमें वसीयत या बिना वसीयत के उत्तराधिकार के अधिकार से अपने पिता की चल और अचल संपत्ति में हिस्सा पाने का अधिकार शामिल है।

अगर पिता ने अपनी खरीदी हुई संपत्ति वसीयत के द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के नाम करदी तो उत्तराधिकार का यह अधिकार समाप्त हो जाता है। यदि पिता की मृत्यु बिना वसीयत के हो जाती है तो संपत्ति में पुत्री का अधिकार

हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 के अनुसार यदि पिता की मौत बिना वसीयत के हो जाती है तो बेटी को स्वतः ही अपने पिता की संपत्ति में कानूनी अधिकार मिल जाता है। पिता की पैतृक और स्व-अर्जित दोनों संपत्ति को सभी कानूनी उत्तराधिकारियों (माता और बच्चों) में बराबरी से बांटा जाता है।
 



क्या लड़की पिता की संपत्ति में अपना हिस्सा मांग (दावा कर) सकती है?

भारत में, पुत्री कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से अपने पिता की संपत्ति पर दावा कर सकती है। यदि बेटी को उसका उचित हिस्सा नहीं दिया जा रहा है, तो वह संपत्ति का बंटवारा कराने के लिए न्यायालय में जा सकती है या अपने संपत्ति अधिकारों को लागू करने के लिए मुकदमा दायर कर सकती है।

यह दावा विभिन्न कारकों पर आधारित होता है जैसे कि संपत्ति का प्रकार, परिवार का धर्म, पिता की वसीयत या पिता की मृत्यु बिना वसीयत के हुई हो आदि।



माँ की संपत्ति में बेटी का अधिकार

माँ की संपत्ति में विवाहित या अविवाहित पुत्री को पुत्र के समान ही अधिकार प्राप्त हैं भले ही माँ को वह संपत्ति विरासत में मिली है या नहीं, यह मायने नहीं रखता, क्योंकि यह स्व-अर्जित संपत्ति में परिवर्तित हो जाती है।

ध्यान रखने वाली एक महत्वपूर्ण बात यह है कि एक विवाहित बेटी को अपनी माँ के जीवनकाल के दौरान उसकी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता है।
 



2005 के संशोधन से पहले पिता की मृत्यु होने पर बेटी का उत्तराधिकार का अधिकार

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है, कि लड़की का जन्म 9 सितंबर 2005 से पहले या उसके बाद हुआ था, वह तारीख है, जब हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन किया गया था। विभाजन के समय एक बेटी को एक बेटे के समान ही अधिकार प्राप्त होंगे आइये इसे पैतृक संपत्ति में बेटी के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के कुछ ऐतिहासिक निर्णयों की मदद से समझते हैं:

  • दानम्मा उर्फ ​​सुमन सुरपुर व अन्य बनाम अमर (2018): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट यह स्पष्ट किया की हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 से पहले दायर किए गए संपत्ति के बंटवारे के मुकदमों पर भी लागू होता है।
  • विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा एवं अन्य (2020) - इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बेटियों को जन्म से ही अपने पिता की संपत्ति में उत्तराधिकार प्राप्त होता हैं, भले ही उनके पिता की मृत्यु हिंदू उत्तराधिकार संशोधन 2005 के लागू होने से पहले हो गई हो।
 

मुस्लिम, ईसाई और पारसी कानूनों के तहत बेटियों का विरासत का अधिकार

भारत में मुस्लिम, ईसाई और पारसी धर्म में उत्तराधिकार संबंधित मामले व्यक्तिगत कानूनों द्वारा शासित होते हैं जो निम्नलिखित है:



मुसलमानों में लड़की का संपत्ति पर अधिकार

मुसलमानों में उत्तराधिकार के मामले में, मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) 1937 के द्वारा शासित होते हैं। जिसके अनुसार पिता की मौत के बाद बेटा और बेटी दोनों विरासत में मिली संपत्ति के कानूनी उत्तराधिकारी बन जाते हैं हालांकि बेटे की तुलना में बेटी को संपत्ति में आधा हिस्सा ही मिलता है।
 



ईसाई और पारसियों में लड़की का संपत्ति पर अधिकार

क्रिश्चियन और पारसियों में संपत्ति के मामले भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 द्वारा शासित होते हैं। इस अधिनियम के अनुसार, यदि पिता या माता की मृत्यु हो जाती है, तो बेटी को उसके भाई के बराबर ही संपत्ति में हिस्सा मिलेगा।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल


पैतृक (माता-पिता की) प्रॉपर्टी में बेटी का कितना अधिकार है?

हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 के अनुसार माता-पिता की संपत्ति में बेटी का अधिकार बेटों के बराबर ही है।



क्या शादीशुदा बेटी पिता की प्रॉपर्टी पर दावा कर सकती है?

पिता की प्रॉपर्टी पर शादीशुदा बेटी का अधिकार कुंवारी बेटी के समान ही होता इसलिए शादीशुदा बेटी भी पिता की प्रॉपर्टी पर दावा कर सकती है।



पिता की खरीदी हुई सम्पति में बेटी का हिस्सा कितना होता है?

बेटियों को भी पिता की स्वअर्जित संपत्ति में बेटे के समान अधिकार प्राप्त है, लेकिन यदि पिता ने अपनी खरीदी हुई संपत्ति वसीयत के माध्यम से किसी अन्य व्यक्ति के नाम करदी है, तो ना बेटी और ना ही बेटा पिता की स्वअर्जित संपत्ति पर अपना दावा कर सकते हैं।


क्या पिता बेटी की सहमति के बिना संपत्ति बेच सकता है?

यदि संपत्ति पिता द्वारा स्वयं अर्जित की गई है तो वह अपनी स्वतंत्र इच्छा से पुत्री या पुत्र की सहमति के बिना उसे बेच सकता है। लेकिन पैतृक संपत्ति के मामले में वह अन्य जीवित उत्तराधिकारियों की सहमति के बिना संपत्ति नहीं बेच सकता, सिवाय संपत्ति पर ऋण चुकाने के मामले में।



क्या बेटी पैतृक संपत्ति पर दावा कर सकती है?

हां, यदि बेटी को पैतृक संपत्ति के बंटवारे पर उसका उचित हिस्सा नहीं दिया जाता है तो वह न्यायालय के माध्यम से  संपत्ति में अपने हिस्से का दावा कर सकती है।