क्या आदिवासी अपनी जमीन गैर-आदिवासी को बेच सकता है और इसकी प्रक्रिया क्या है


सवाल

आदिवासी की जमीन गैर-आदिवासी (Non-Tribal) के नाम कैसे ट्रांसफर हो सकती है? अगर कोई आदिवासी अपनी जमीन बेचना चाहे तो क्या प्रक्रिया है? क्या यह काम वसीयत, दानपात्र (Gift Deed) या किसी ट्रस्ट के नाम से किया जा सकता है?

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आदिवासी जमीन का गैर-आदिवासी को हस्तांतरण (Transfer) भारत में बहुत ही सख्त कानूनों के दायरे में आता है। इसका मुख्य उद्देश्य आदिवासियों की जमीन को भू-माफियाओं और शोषण से बचाना है। सामान्य तौर पर, एक आदिवासी अपनी जमीन केवल दूसरे आदिवासी को ही बेच सकता है।

हालांकि, विशेष परिस्थितियों में गैर-आदिवासी को जमीन ट्रांसफर करने के कुछ नियम हैं, जो इस प्रकार हैं:

1. कलेक्टर की विशेष अनुमति (Permission from Collector)

मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता (MPLRC) की धारा 165 और अन्य राज्यों के समान कानूनों के तहत, यदि कोई आदिवासी किसी गैर-आदिवासी को जमीन बेचना चाहता है, तो उसे जिले के कलेक्ट्रर (Collector) से लिखित में अनुमति लेनी अनिवार्य है।

  • कलेक्टर यह अनुमति तभी देता है जब वह संतुष्ट हो जाए कि जमीन बेचने का कारण बहुत गंभीर है (जैसे कि इलाज, बच्चों की शादी या शिक्षा)।

  • अनुमति देने से पहले कलेक्टर यह भी जांच करता है कि क्या कोई दूसरा आदिवासी उस जमीन को उचित मूल्य पर खरीदने के लिए तैयार है। यदि कोई आदिवासी खरीदार नहीं मिलता, तभी गैर-आदिवासी को अनुमति दी जा सकती है।

2. अनुसूचित क्षेत्र (Scheduled Areas) में नियम

यदि जमीन संविधान की 5वीं अनुसूची (5th Schedule) के तहत आने वाले "अनुसूचित क्षेत्र" में है, तो वहां नियम और भी कड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट के 'समता जजमेंट' (Samatha Judgment) के अनुसार, ऐसी जगहों पर गैर-आदिवासियों को जमीन का हस्तांतरण लगभग असंभव है, भले ही वह दान या ट्रस्ट के माध्यम से क्यों न हो।

3. वसीयत, दानपात्र या ट्रस्ट के माध्यम से हस्तांतरण

कई लोग कानून से बचने के लिए वसीयत (Will) या दानपात्र (Gift Deed) का सहारा लेते हैं, लेकिन कानून इसे भी "हस्तांतरण" (Transfer) ही मानता है।

  • वसीयत और दान: गैर-आदिवासी को वसीयत या दान के माध्यम से जमीन देना भी तब तक मान्य नहीं है जब तक कलेक्टर की अनुमति न हो। कोर्ट ऐसी वसीयतों को अक्सर 'शून्य' (Void) घोषित कर देता है।

  • ट्रस्ट: किसी गैर-आदिवासी द्वारा संचालित ट्रस्ट के नाम पर जमीन लेना भी बेनामी लेनदेन माना जा सकता है। ट्रस्ट केवल सामाजिक कार्यों के लिए और सरकारी मंजूरी के साथ ही ऐसी जमीन का उपयोग कर सकते हैं।

बिना कलेक्टर की अनुमति के आदिवासी जमीन खरीदना या उसका "पावर ऑफ अटॉर्नी" (GPA) लेना कानूनी रूप से अपराध है। ऐसी जमीन का नामांतरण (Mutation) कभी नहीं होता और सरकार उसे कभी भी वापस लेकर मूल आदिवासी मालिक को सौंप सकती है।

मेरी सलाह है कि ऐसी किसी भी डील में पड़ने से पहले संबंधित तहसील या कलेक्टर ऑफिस से उस जमीन का स्टेटस और अनुमति की संभावनाओं के बारे में लिखित जानकारी जरूर लें।

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इसके लिए प्रावधान जो है वह एमपीएलआरसी में ना सेक्शन 165 में दिया गया हुआ है उसमें आदिवासी लोग नहीं रहते हो आप जहां गवर्नमेंट का नोटिफिकेशन भी नहीं है तो फिर वह कलेक्टर के आज परमिशन के साथ परमिशन से किसी भी गैर आदिवासी को बेची जा सकती है


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