आपसी सहमति से तलाक क्या है और इसकी कानूनी प्रक्रिया क्या है
सवाल
उत्तर (1)
आपसी सहमति से तलाक (Mutual Consent Divorce) तब होता है जब पति और पत्नी दोनों मिलकर यह तय करते हैं कि वे अब एक साथ नहीं रह सकते और बिना किसी आरोप-प्रत्यारोप के गरिमापूर्ण तरीके से अलग होना चाहते हैं। भारत में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी (Section 13B) के तहत यह तलाक का सबसे आसान और तेज तरीका माना जाता है, जिसमें समय और धन दोनों की बचत होती है।
इस प्रक्रिया के लिए मुख्य रूप से तीन शर्तें पूरी होनी चाहिए। पहली यह कि दोनों पक्ष कम से कम एक साल से अलग रह रहे हों। दूसरा, उनके बीच सुलह की कोई गुंजाइश न बची हो और तीसरा, दोनों ने अपनी स्वतंत्र इच्छा से तलाक के लिए सहमति (Consent) दी हो। इसमें संपत्ति के बंटवारे, बच्चों की कस्टडी (Child Custody) और गुजारा भत्ता (Alimony) जैसे मुद्दों पर पहले ही लिखित समझौता कर लिया जाता है।
इसकी कानूनी प्रक्रिया में अदालत में दो बार पेश होना पड़ता है। सबसे पहले, दोनों पक्ष मिलकर फैमिली कोर्ट (Family Court) में एक संयुक्त याचिका दायर करते हैं, जिसे 'प्रथम प्रस्ताव' (First Motion) कहा जाता है। इसमें जज साहब दोनों के बयान दर्ज करते हैं। इसके बाद कोर्ट दोनों को अपने फैसले पर दोबारा विचार करने के लिए छह महीने का समय (Cooling-off Period) देता है। हालांकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार इस छह महीने की अवधि को कम या खत्म भी किया जा सकता है।
छह महीने बीतने के बाद, यदि दोनों अभी भी अलग होने पर अडिग हैं, तो वे 'दूसरा प्रस्ताव' (Second Motion) पेश करते हैं। कोर्ट सभी दस्तावेजों और बयानों की अंतिम जांच करने के बाद तलाक की डिक्री (Divorce Decree) जारी कर देता है, जिससे विवाह कानूनी रूप से समाप्त हो जाता है। ध्यान रहे कि दूसरे प्रस्ताव के पारित होने से पहले कोई भी पक्ष अपनी सहमति वापस ले सकता है, ऐसी स्थिति में आपसी तलाक रद्द हो जाता है।
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