भारतीय संविधान अनुच्छेद 14 (Article 14 in Hindi) - विधि के समक्ष समता


विवरण

राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।
 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता का अधिकार)

अनुच्छेद 14 द्वारा भारतीय संविधान भारत के प्रत्येक व्यक्ति को समानता का अधिकार प्रदान करता है, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में समानता के सामान्य नियम को बताया गया है, जो कि देश के सभी नागरिकों के बीच अयुक्तियुक्त विभेद को वर्जित करता है। संविधान की प्रस्तावना में प्रकल्पित समता का आदर्श, अनुच्छेद 14 में निहित है। समता या समानता का अधिकार वैश्विक मानवाधिकार के लक्ष्यों के प्राप्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र के अनुसार भी विश्व के सभी लोग विधि के समक्ष समान सेवा के हक़दार हैं। कोई भी व्यक्ति, राज्य या देश किसी भी व्यक्ति को उसके इस अधिकार से वंचित नहीं कर सकता है।
 

क्या होता है अनुच्छेद 14?

भारत के संविधान में यह कहा गया है, कि कोई भी राज्य, भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को कानून के समक्ष समता से या कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के हिसाब से इसका मतलब यह है, कि सरकार भारत में किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं करेगी। भारतीय संविधान के भाग - 3 में मौजूद समता का अधिकार में अनुच्छेद 14 के साथ ही अनुच्छेद - 15 भी जुड़ा हुआ है। इसमें कहा गया है, कि "राज्य किसी नागरिक के खिलाफ सिर्फ धर्म, मूल, वंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई भेद नहीं कर सकता है।"

अनुच्छेद 14 का साधारण सा मतलब यह है, कि "भारत राज्य - क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से अथवा विधियों के समान संरक्षण से राज्य द्वारा वंचित नहीं किया जायेगा।" इस अनुच्छेद में दो वाक्यांश का प्रयोग किया गया है, एक - ''विधि के समक्ष समता'' तथा दूसरा है - "विधियों का समान संरक्षण"। विधि के समक्ष समता वाक्यांश लगभग सभी लिखित संविधान में पाया जाता है, जो नागरिकों को मूल अधिकार प्रदान करते संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार घोषणा - पत्र के अनुच्छेद 7 में उक्त दोनों वाक्यांश प्रस्तुत किये गये है, मानव अधिकार घोषणा - पत्र का अनुच्छेद 1 यह कहता है, कि "विधि के समक्ष सभी समान है, और बिना किसी विभेद के सभी विधि के संरक्षण के अधिकारी हैं"। विधि के समक्ष समता वाक्यांश ब्रिटिश संविधान से लिया गया है, जिसे प्रोफेसर डायसी के अनुसार 'विधि शासन' कहा जाता है; दूसरा वाक्यांश अमेरिका के संविधान से लिया गया है। इस दोनों वाक्यांश का उद्देश्य भारतीय संविधान की प्रस्तावना में प्रकल्पित स्तर की समानता की स्थापना करना है।
 

भारत में समता / समानता का अधिकार

भारतीय संविधान के अनुसार, भारतीय नागरिकों को मौलिक अधिकारों के रूप में समता / समानता का अधिकार अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18 तक दिए गए हैं, जो कि न्यायालय में भी वाद करने योग्य हैं। ये अधिकार निम्न हैं-

अनुच्छेद 14 = विधि के समक्ष समानता का अधिकार।
अनुच्छेद 15 = किसी भी व्यक्ति के साथ उसके धर्म, वंश, जाति, लिंग और जन्म स्थान आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जायेगा।
अनुच्छेद15(4) = सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टि से पिछडे वर्गो के लोगों के लिए कुछ प्रमुख अधिकार।
अनुच्छेद 16 = लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानता का अधिकार।
अनुच्छेद 17 = छुआछूत (अस्पृश्यता) की भावना का अन्त कर दिया गया है।
अनुच्धेद 18 = प्रदान की जाने वाली उपाधियों का भी अन्त कर दिया गया है।
अब भारत में केवल दो तरह की उपाधियाँ ही मान्य हैं - अनुच्छेद 18(1) राज्य सेना द्वारा दी गयी व विद्या द्वारा अर्जित उपाधि। इसके अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार की उपाधियाँ वर्जित कर दी गयी हैं। वहीं, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 18(2) द्वारा यह निर्देश दिया गया है, कि भारत का कोई भी नागरिक विदेशी किसी भी राज्य से कोइ उपाधि नहीं ले सकता है।
 

अनुच्छेद 14 का संरक्षरण

अनुच्छेद 14 का संरक्षण नागरिक और गैर नागरिक दोनो को प्राप्त है - अनुच्छेद 14 में व्यक्ति शब्द का प्रयोग किया गया है। इसका साधारण सा तात्पर्य यह है, कि यह अनुच्छेद भारत के भू - क्षेत्र में रहने वाले सभी व्यक्तियों को चाहे वह भारत का नागरिक हो या विदेशी हो, विधि के समक्ष समता का अधिकार प्राप्त करने का अधिकार रखता है। भारत में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति चाहे भारतीय नागरिक हो अथवा नहीं समान विधि के अधीन होगा और उसे विधि का समान संरक्षण भी प्रदान किया जाएगा । इसके विपरीत अनुच्छेद 15, 16, 17,18 आदि के उपबन्धों का लाभ केवल नागरिकों को ही प्राप्त होता है। अनुच्छेद 14 में उल्लिखित मूल अधिकार केवल विधि के समक्ष समता का अधिकार सभी व्यक्तियों को बिना किसी मूलवंश, रंगभेद और राष्ट्रीयता का भेदभाव किये बिना प्रदान किया गया है।

अनुच्छेद 14 में विधिक व्यक्ति भी शामिल है - "क्या व्यक्ति शब्द के अर्थान्तर्गत विधिक व्यक्ति भी आते हैं"? यह प्रश्न "चिरंजीत लाल बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया" के मामले में उच्चतम न्यायालय के विचार में आया था, उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि अनुच्छेद 14 में दिए गए व्यक्ति शब्द के अन्तर्गत विधिक व्यक्ति भी सम्मिलित है। अतः वे सभी जो कि विधिक व्यक्ति है, को भी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के अंतर्गत विधि के समक्ष समता का अधिकार उपलब्ध है।
 

अनुच्छेद 14 के मामलों में एक वकील की जरुरत क्यों होती है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 संविधान के मौलिक अधिकार का एक हिस्सा है, जिसमे यह कहा गया है, कि भारत का कोई भी राज्य किसी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता या भारत के क्षेत्र के भीतर कानूनों के समान संरक्षण से इनकार नहीं कर सकता है। यदि किसी व्यक्ति के साथ ऐसा किया जाता है, तो उसे अपने हक के लिए सीधे सर्वोच्छ न्यायालय जाने का अधिकार है, वह सर्वोच्छ न्यायालय के वकील के माध्यम से अपनी याचिका दायर कर सकता है। इसी कारण एक वकील ही एकमात्र ऐसा यन्त्र होता है, जो किसी पीड़ित व्यक्ति को सही रास्ता दिखने में लाभकारी सिद्ध हो सकता है, क्योंकि वकील को कानून और संविधान की उचित जानकारी होती है, तो वह मामले से सम्बंधित सभी प्रकार के उचित सुझाव भी दे सकता है। लेकिन इसके लिए हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस वकील को हम अपने मामले को सुलझाने के लिए नियुक्त कर रहे हैं, वह अपने क्षेत्र में निपुण वकील होना चाहिए, और उसे संविधान से सम्बंधित और अनुच्छेद 14 के मामलों से निपटने का उचित अनुभव होना चाहिए, जिससे आपके केस जीतने के अवसर और भी बढ़ सकते हैं।


भारत का संविधान , अधिक पढ़ने के लिए, यहां क्लिक करें

लोकप्रिय भारतीय संविधान अनुच्छेद