सवाल


मेरे भाई जिसकी एक प्रिंटिंग प्रेस है को 3 दिन पहले पुलिस ने आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471 आदि के तहत गिरफ्तार किया था। वह मुख्य रूप से चुनाव मतदाता पहचान पत्र, आवासीय प्रमाण, विद्यालय / कॉलेज अंक तालिका आदि को बदलने में अहम भूमिका निभाता है। पुलिस ने एक दर्जन से अधिक चुनाव मतदाता पहचान पत्र, आवासीय प्रमाण, अंक तालिका और लैपटॉप पकड़े। किस समय और किस प्रकार मेरे भाई को जमानत मिल सकती है?

उत्तर


भारतीय दंड संहित में जालसाजी का अपराध
भारतीय दंड संहिता की धारा 463 के अनुसार, "जो कोई व्यक्ति झूठे दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड या दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का कुछ हिस्सा सार्वजनिक या किसी खास व्यक्ति को नुकसान या चोट पहुंचाने, या किसी भी दावे या शीर्षक का समर्थन करने के इरादे से बनाता है, या किसी भी व्यक्ति को संपत्ति के साथ धोखाधड़ी करके नकली दस्तावेज बनाकर, या किसी भी कथित या निहित कॉन्ट्रैक्ट में प्रवेश करने के लिए, या किसी व्यक्ति की संपत्ति या किसी मूल्यवान वास्तु को अपने कब्जे में करने के इरादे से उसके साथ धोखाधड़ी करता है, तो वह व्यक्ति भारतीय दंड संहिता की धारा 463 के अनुसार जालसाजी का अपराध करता है।

जालसाजी के अपराध में कई और धाराएं भी शामिल हैं
भारतीय दंड संहिता में धरा 463 से लेकर धारा 474 अ तक जालसाजी के अपराध और इस अपराध के कई अन्य तरीकों को परिभाषित किया गया है, और केवल अपराध को ही नहीं बल्कि उन अपराधों के लिए न्यायालय द्वारा दी जाने वाली सजा को भी उचित रूप से समझाया गया है। जालसाजी के अपराध की कुछ प्रमुख धाराएं निम्न हैं

भारतीय दंड संहिता की धारा 467
जब किसी व्यक्ति द्वारा कोई ऐसा फर्जी दस्तावेज बनाया जाता है, जो एक मूल्यवान संपत्ति या इच्छाशक्ति, या एक बेटा गोद लेने के लिए अधिकार प्रदान करता है, या किसी भी व्यक्ति को किसी भी मूल्यवान संपत्ति को बनाने या स्थानांतरित करने के लिए अधिकार प्रदान करता है। या किसी भी धन, चल संपत्ति, या मूल्यवान सुरक्षा, या किसी भी दस्तावेज को अपने या फिर किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर करने के लिए कोई फर्जी दस्तावेज बनाता है, जबकि वह संपत्ति या वह वास्तु उस व्यक्ति की खुद की नहीं हो तो ऐसी स्तिथि में ऐसे व्यक्ति को न्यायालय द्वारा कारावास के दंड के साथ दंडित किया जा सकता है, जिसकी समय सीमा को 10 बर्षों तक बढ़ाया जा सकता है, या आजीवन कारावास से भी दण्डित किया जा सकता है, और इसके अतिरक्त आर्थिक दंड से भी दण्डित किया जा सकता है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 468
जब कोई व्यक्ति किसी जाली दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का उपयोग करके किसी अन्य व्यक्ति के साथ धोखाधड़ी करने के उद्देश्य से अपराध करता है, तो उस व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता की धारा 468 के अनुसार कारावास की सजा से दण्डित किया जा सकता है, जिसकी समय सीमा को 7 बर्षों तक बढ़ाया जा सकता है, कारावास के दंड के साथ साथ ऐसे व्यक्ति को आर्थिक दंड से भी दण्डित किया जा सकता है, जिसकी राशि को न्यायलाय आरोपी की हैसियत और जुर्म की गंभीरता के अनुसार तय करती है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 471
जब कोई व्यक्ति बेईमानी या धोखेबाजी करने के उद्देश्य से किसी जाली दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का उपयोग उस तरीके से करता है, जैसे की वह दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड जाली न होकर असली हो। तो ऐसी स्तिथि में उस व्यक्ति को न्यायालय से उसी सजा से दण्डित किया जाता है, जो सजा उस व्यक्ति को तब दी जाएगी, जब उसने वह जाली दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड खुद ही तैयार किया हो।

क्या होती है, धारा 420?
भारतीय दंड संहिता, 1860 के अनुसार, धारा 420, में कहा गया है, कि यदि जो कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को धोखा देता है, और वह इस तरह बेईमानी करके किसी व्यक्ति को, किसी प्रकार की, संपत्ति को हस्तांतरित करने के लिए धोखा देता है, या किसी मूल्यवान संपत्ति को या उसके किसी भी हिस्से को बदलने या नष्ट करने, या किसी प्रकार के जाली हस्ताक्षर करने के लिए प्रेरित करता है, जबकि वह संपत्ति किसी बहुमूल्य संपत्ति में परिवर्तित होने के योग्य हो, तो ऐसे किसी व्यक्ति को भारतीय न्यायालय द्वारा कारावास के लिए दण्डित किया जा सकता है, जिसकी समय सीमा को सात बर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। कारावास के दंड के साथ ही साथ न्यायालय द्वारा उस व्यक्ति पर उचित आर्थिक दंड भी लगाया जा सकता है।

जालसाजी के अपराध में जमानत का प्रावधान
किसी भी अभियुक्त को कारावास से छुड़ाने के लिए न्यायालय के सामने जो धनराशि जमा की जाती है, या राशि को जमा करने की प्रतिज्ञा ली जाती है, उस राशि को एक बॉन्ड के रूप में भरा जाता है, इसे ही जमानत की राशि कहा जाता है। और जमानत की राशि के बॉन्ड तैयार होने के बाद न्यायालय द्वारा न्यायाधीश के द्वारा उचित तर्क के आधार पर ही आरोपी को जमानत दी जाती है।
यदि किसी व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता में वर्णित जालसाजी के अपराध में गिरफ्तार किया जाता है, तो वह सत्र न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिए भी आवेदन कर सकता है। न्यायाधीश द्वारा स्वीकृति प्रदान करने के उपरांत ही अभियुक्त को जमानत प्रदान कर दी जाती है। अभी तक जमानत के लिए कोई निर्धारित प्रक्रिया नहीं है। यह लेनदेन की प्रकृति और आरोपों की गंभीरता पर निर्भर करती है।

जमानत की अवधि परिभाषित नहीं की जा सकती। सभी तथ्यों को जाने बिना हम आपको जमानत का सही समय नहीं बता सकते।

जमानत कई कारकों पर निर्भर करती है। हम आपसे अनुरोध करेंगे कि आप अपने मामले की चर्चा एक आपराधिक विशेषज्ञ के साथ करें जो आपको उचित तरीके से मार्गदर्शित कर सकता है।

आप इस प्रक्रिया की शुरुआत सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय में जमानत के लिए आवेदन से कर सकते हैं।

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