रेप के मामले में समझौता होने पर जमानत मिलने की प्रक्रिया क्या है
सवाल
उत्तर (2)
नहीं, बलात्कार जैसे गंभीर मामलों में केवल समझौते के आधार पर जमानत (Bail) मिलना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 64 (जो पहले IPC की धारा 376 थी) के तहत दर्ज अपराध एक गैर-शमन योग्य (Non-Compoundable) अपराध है। इसका मतलब यह है कि कानून की नजर में यह अपराध समाज के विरुद्ध है और इसे केवल दोनों पक्षों की आपसी सहमति या समझौते (Compromise) से खत्म नहीं किया जा सकता है।
चूंकि मजिस्ट्रेट अदालत ने जमानत खारिज कर दी है, इसलिए अब आपको सत्र न्यायालय (Sessions Court) जिसे जज कोर्ट भी कहा जाता है, वहां जमानत के लिए आवेदन करना होगा। वहां आपके वकील यह दलील दे सकते हैं कि प्राथमिकी (FIR) गलतफहमी या गुस्से में दर्ज कराई गई थी। हालांकि, अदालत इस बात को बहुत गंभीरता से लेती है क्योंकि बलात्कार का झूठा आरोप लगाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाता है। जमानत देते समय न्यायाधीश महोदय यह देखेंगे कि क्या आरोपी के खिलाफ कोई ठोस सबूत मौजूद हैं या नहीं।
जमानत की संभावनाओं को बेहतर बनाने के लिए आप सत्र न्यायालय में एक हलफनामा (Affidavit) दाखिल कर सकती हैं जिसमें आप यह स्वीकार करें कि आपने शिकायत दबाव या गलत जानकारी के कारण दर्ज कराई थी। यदि अदालत को लगता है कि मुकदमा चलाने का कोई ठोस आधार नहीं बचा है, तो वह आरोपी को जमानत (Bail) दे सकती है। लेकिन ध्यान रहे, झूठी एफआईआर (False FIR) की बात स्वीकार करने पर आपके खिलाफ भी कानूनी कार्यवाही की जा सकती है।
यदि सत्र न्यायालय से भी राहत नहीं मिलती है, तो आपको मामले को पूरी तरह रद्द (Quashing) कराने के लिए उच्च न्यायालय (High Court) का दरवाजा खटखटाना होगा। उच्च न्यायालय के पास यह शक्ति होती है कि यदि पीड़िता खुद कह रही है कि मामला झूठा है या समझौता हो गया है, तो वह न्याय के हित में कार्यवाही को समाप्त कर सकता है।
गैर-जमानती धाराओं में आप अधिकार के मामले के रूप में जमानत का दावा नहीं कर सकते हैं, और आगे की धारा 376 कंपाउंडेबल अपराध के दायरे में नहीं आती है। इसलिए यह पूरी तरह से अदालत को तय करना है कि जमानत दी जानी चाहिए या नहीं। हालाँकि, आपको समझौता याचिका दायर करने और उस उचित तथ्य को बताने से रोक नहीं दिया जाता है जिसके द्वारा आप पर एक झूठी प्राथमिकी / शिकायत दर्ज की गई थी।
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