सवाल


हमारी एक पारिवारिक प्रॉपर्टी थी मेरे पिता, बड़े भाई और मेरे नाम पर। कुछ महीने पहले यह मेरे बड़े भाई द्वारा सहमति व्यक्त की गई थी कि वह मुझे और मेरे पिता को हमारे शेयर के बदले कुछ पैसे दे देगा औरउसके बाद उसके नाम पर प्रॉपर्टी को ट्रांसफर कर देंगे। तो फिर हम उसके नाम पर प्रॉपर्टी हस्तांतरित कर दी। अब जब मेने पिता ने सहमति राशि की मांग की तो वो मुकर गया और पैसे देने से इनकार कर दिया। इस पैसे के बिना मेरे पिता के पास अपना खुद का कोई घर नहीं होगा और मेरे भाई उन्हें अपने घर में रहने की अनुमति नहीं देगा। हमारे पास आपसी समझौते के बारे में लिखित रूप में कुछ भी नहीं है।

उत्तर


अपने तथ्यों से गुजरने के बाद कहा जा सकता है कि, यह एक आपराधिक धोखाधड़ी और विश्वासघात की स्थिति है। आपको तुरंत एक पुलिस में शिकायत दर्ज करनी चाइये और साथ ही धोखाधड़ी का मुकदमा दायर करना होगा| आपको सिविल सूट भी दर्ज करना होगा राजस्व प्राधिकरण को लिखित में ये बताते हुए कि प्रॉपर्टी को आपके भाई के नाम पर ट्रांसफर न किया जाये क्योंकि यह एक धोखाधड़ी है|

भारतीय दंड संहिता, 1860 के अनुसार, धारा 420 में कहा गया है, कि यदि जो कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को धोखा देता है, और वह इस तरह बेईमानी करके किसी व्यक्ति को, किसी प्रकार की, संपत्ति को हस्तांतरित करने के लिए धोखा देता है, या किसी मूल्यवान संपत्ति को या उसके किसी भी हिस्से को बदलने या नष्ट करने, या किसी प्रकार के जाली हस्ताक्षर करने के लिए प्रेरित करता है, जबकि वह संपत्ति किसी बहुमूल्य संपत्ति में परिवर्तित होने के योग्य हो, तो ऐसे किसी व्यक्ति को भारतीय न्यायालय द्वारा कारावास के लिए दण्डित किया जा सकता है, जिसकी समय सीमा को सात बर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। कारावास के दंड के साथ ही साथ न्यायालय द्वारा उस व्यक्ति पर उचित आर्थिक दंड भी लगाया जा सकता है।

धोखा धड़ी से क्या तात्पर्य होता है?
भारतीय दंड संहिता की धारा 420 को समझने के लिए हमें सबसे पहले धारा 415 में परिभाषित धोखा धड़ी के प्रावधानों को समझना चाहिए, क्योंकि धारा 420 के तहत होने वाले सभी अपराधों में धारा 415 के धोखा धड़ी के तत्व जरूर ही मौजूद होते हैं।

भारतीय दंड संहिता की धारा 415 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति, किसी अन्य व्यक्ति को धोखा देकर, धोखे से या बेईमानी से कोई भी संपत्ति देता है, या इस बात की सहमति देता है, कि वह उस संपत्ति को खरीद सकता है, या धोखा देने के इरादे से जानबूझ कर किसी अन्य व्यक्ति को कोई काम करने के लिए कहता है। किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य को कोई कार्य करने के लिए प्रेरित करना या किसी व्यक्ति के साथ उसे धोखा देने के इरादे से किया गया कोई काम जिससे उस उस व्यक्ति के शरीर, मन, प्रतिष्ठा या संपत्ति को नुकसान पहुँचता है, या किसी प्रकार के नुकसान होने का कारण बनता है, या भविष्य में किसी प्रकार के नुक्सान होने की संभावना होती है, "धोखा धड़ी" के नाम से जाना जाता है।

धारा 420 के आवश्यक तत्व
1. धोखा (चीटिंग)
2. किसी भी मूल्यवान संपत्ति या किसी भी महत्वपूर्ण चीज़ को सील करने या उसके आकर, प्रकार में बदलाव करने के लिए या उस संपत्ति को नष्ट करने के लिए बेईमानी की भावना से किसी अन्य व्यक्ति को प्रेरित करना।
3. कोई धोखा धड़ी या बेईमानी करने के लिए किसी व्यक्ति की आपराधिक मन स्तिथि।
4. किसी व्यक्ति को धोखा देने के उद्देश्य से किसी भी बात का जान बूझकर झूठा प्रतिनिधित्व करना

धारा 420 के मामले में सजा और जमानत का प्रावधान
1. इस धारा के अंतर्गत अधिकतम सात वर्ष कारावास निर्धारित किया गया है, जो कि न्यायाधीश के द्वारा तय किया जाता है। कारावास के दंड के साथ साथ आर्थिक दंड देने का भी प्रावधान है, जो कि न्यायाधीश जुर्म की संगीनता के आधार पर तय करते हैं। यह एक गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध है, और किसी भी न्यायधीश द्वारा विचारणीय है, न्यायालय की अनुमति से पीड़ित व्यक्ति द्वारा समझौता भी किया जा सकता है।
2. किसी भी अभियुक्त को कारावास से छुड़ाने के लिए न्यायालय के सामने जो धनराशि जमा की जाती है, या राशि को जमा करने की प्रतिज्ञा ली जाती है, उस राशि को एक बॉन्ड के रूप में भरा जाता है, इसे ही जमानत की राशि कहा जाता है। और जमानत की राशि के बॉन्ड तैयार होने के बाद न्यायालय द्वारा न्यायाधीश के द्वारा उचित तर्क के आधार पर ही आरोपी को जमानत दी जाती है।
3. यदि किसी व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के अंतर्गत गिरफ्तार किया जाता है, तो वह सत्र न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिए भी आवेदन कर सकता है। न्यायाधीश द्वारा स्वीकृति प्रदान करने के उपरांत ही अभियुक्त को जमानत प्रदान कर दी जाती है। अभी तक जमानत के लिए कोई निर्धारित प्रक्रिया नहीं है। यह लेनदेन की प्रकृति और आरोपों की गंभीरता पर निर्भर करती है।
4. जमानत के लिए भारतीय दंड संहिता में कुछ ऐसी भी धाराएं हैं, जिसमे 10 वर्ष तक के कारावास का प्रावधान होता है, उसमें 90 दिनों के भीतर जांच एजेंसी को न्यायालय में चार्जशीट दाखिल करनी होती है, यदि इस समयावधि में किसी कारणवश चार्जशीट दाखिल नहीं हो पाती है, तो न्यायालय द्वारा अभियुक्त को जमानत दे दी जाती है। अगर किसी धारा में 10 वर्ष से कम सजा का प्रावधान होता है, तो ऐसे मामलों में जाँच एजेंसी को 60 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करनी होती है, यदि इस अवधि में चार्जशीट दाखिल नहीं होती है, तो भी न्यायालय द्वारा अभियुक्त को जमानत दे दी जाती है। जमानत के समय न्यायाधीश अभियुक्त के क्रिमिनल रिकार्ड की गहन जाँच करते हैं, जिसके आधार पर जमानत ही वह जमानत देने का निर्णय लेते हैं।

धारा 420 में वकील की जरुरत क्यों होती है?
यह एक संगीन और गैर जमानती अपराध है, जिसमें अधिकतम सात बर्ष की सजा के साथ - साथ आर्थिक दंड का भी प्रावधान दिया गया है। इसमें न्यायालय में आरोपी का इरादा साबित करने की आवश्यकता होती है, कि उसने धोखा धड़ी और किसी प्रकार का झूठा प्रतिनिधित्व किया है, या नहीं। जिसको साबित करने के लिए एक आपराधिक वकील ही उचित रूप से लाभकारी सिद्ध हो सकता है। और ऐसे मामलों में ऐसे किसी वकील को नियुक्त करना चाहिए जो कि ऐसे मामलों में पहले से ही पारंगत हो, और धारा 420 जैसे मामलों को उचित तरीके से सुलझा सकता हो। जिससे आपके केस को जीतने के अवसर और भी बढ़ सकते हैं।

इस मामले में कानूनी कार्रवाई शुरू करने में देरी हानिकारक हो सकती है इसलिए तुरंत कदम उठाये।

अपने शहर में सबसे अच्छा प्रॉपर्टी वकील खोजने के लिए यहां क्लिक करें

भारत के अनुभवी प्रॉपर्टी वकीलों से सलाह पाए

अस्वीकरण: उपर्युक्त सवाल और इसकी प्रतिक्रिया किसी भी तरह से कानूनी राय नहीं है क्योंकि यह LawRato.com पर सवाल पोस्ट करने वाले व्यक्ति द्वारा साझा की गई जानकारी पर आधारित है और LawRato.com में प्रॉपर्टी वकीलों में से एक द्वारा जवाब दिया गया है विशिष्ट तथ्यों और विवरणों को संबोधित करें। आप LawRato.com के वकीलों में से किसी एक से प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए अपने तथ्यों और विवरणों के आधार पर अपनी विशिष्ट सवाल पोस्ट कर सकते हैं या अपनी सवाल के विस्तार के लिए अपनी पसंद के वकील के साथ एक विस्तृत परामर्श बुक कर सकते हैं।


इसी तरह के प्रश्न



संबंधित आलेख