सवाल


मेरे पति ने जामताड़ा कोर्ट में मेरे खिलाफ धारा 9 के तहत आरसीआर का मामला दायर किया है। इसलिए समस्या यह है कि आरसीआर में प्रस्तुत प्रत्येक दस्तावेज और हलफनामे में उन्होंने उल्लेख किया है कि वह चाहते हैं कि मुझे अपनी सेवा स्थान पर ले जाएँ, जहां वह अपने अधिकांश दिन रहते हैं लेकिन मौखिक रूप से अदालत के सामने वह मुझे अपने वैवाहिक घर में ले जाकर और डंप करना चाहते है जहां वह वास्तव में केवल दो दिनों के लिए रहते हैं।
1) दो अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग रहने से मेरे पति की आरसीआर धारा 9 को बहाल कैसे किया जा सकता है?
2) क्या आईआरसीआर का अर्थ मेरी सहमति के बिना मुझे जबरन अपने ससुराल में सास और ससुर के साथ रहना है।

उत्तर


हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत दायर एक याचिका ऐसी याचिका है जो वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए दायर की जाती है, जब पति या पत्नी बिना किसी उचित बहाने के, दूसरे साथी के समाज से निकल अपने समाज में वापस आ जाए। ऐसी याचिका में पीड़ित पक्ष दूसरे पक्ष को पास वापस लौटने और पति या पत्नी के रूप में रहने तथा सहवास के निर्देशों की मांग करने के लिए अदालत में आवेदन कर सकता है।

हालांकि, वैवाहिक अधिकारों को बहाल करने का आदेश, उस पक्ष को जिसने दूसरे पक्ष के समाज से खुद को वापस ले लिया है, याचिका कर्ता के साथ रहने के लिए मजबूर कर, निष्पादित नहीं किया जा सकता है ।

इसके अलावा, अगर वैवाहिक अधिकार के पुनर्निर्माण के आदेश को एक वर्ष से अधिक अवधि के लिए सम्मानित नहीं किया जाता है, तो उस के बाद, यह तलाक के लिए एक आधार बन जाता है।

आजकल तलाक के बारे में अखबारों और न्यूज में काफी पढ़ने को मिल रहा है। कई नामी - गिरामी लोग अपने साथी से तलाक लेने के लिए न्यायालय में आवेदन करते हैं, और एक दूसरे के साथ बिताये हुए वर्षों के वैवाहिक जीवन को समाप्त कर देते हैं। और कई मामलों में तो तलाक लेने की बहुत छोटी - छोटी सी वजह बताई जाती है। विवाह दो पक्षों का मेल होता है, यह बात सही है, लेकिन इसमें एक अधिकार की कभी बात ही नहीं की जाती है, और वह है, वैवाहिक अधिकारों की बहाली। हिंदू विवाह कानून में वैवाहिक अधिकारों की बहाली का उल्लेख इस अधिनियम के सेक्शन 9 में किया गया है। इस प्रावधान का उद्देश्य मुख्य रूप से टूटती हुई शादी को बचाने के लिए रहता है। यह अधिकार विशुद्ध रूप से पति और पत्नी दोनों के बीच रहता है।

वैवाहिक अधिकारों की बहाली का अर्थ क्या होता है?
कानून की भाषा में भले ही पति या पत्नी दोनों में से कोई एक बिना किसी कारण के एक - दूसरे से अलग रहते हैं, या दोनों में से कोई एक, दूसरे को छोड़कर कहीं चला जाता है, तो छोड़कर जाने वाले साथी के विरुद्ध ‘वैवाहिक संबंधों की वापसी’ के लिए न्यायालय में मुकदमा दायर किया जा सकता है। यानी पति हो या पत्नी दोनों को ही वैवाहिक अधिकारों की बहाली का अधिकार रहता है, जिसमें न्यायालय द्वारा छोड़कर जाने वाले व्यक्ति को यह सलाह दी जाती है, कि वह अपने साथी के साथ अपने वैवाहिक संबंधों को कायम रखे और आगे से अपने साथी को छोड़ने की गलती न करे। यह एक कानूनी अधिकार है, और अदालत इसमें डिक्री दे सकती है। वैवाहिक संबंधों की बहाली में केवल भौतिक जरूरतों की पूर्ति नहीं है, लेकिन इसमें कई अन्य महत्वपूर्ण पहलू भी हैं। पति और पत्नी के बीच कुछ अधिकार और कर्तव्य होते हैं, जो दोनों के साथ रहने से ही पूरे होते हैं। ये अधिकार और कर्तव्य ही वैवाहिक अधिकारों के तहत आते हैं।

बिना तलाक के भी दूर रह सकते हैं, पति - पत्नी
वैवाहिक संबंधों की बहाली करना बहुत ही अच्छा उपाय होता है, जिसके माध्यम से अलग रह रहे पति और पत्नी को एक साथ रहने की हिदायत दी जाती है, किन्तु जब पति और पत्नी के बीच का विवाद कुछ अधिक ही बढ़ जाता है, और वे एक दूसरे से तलाक ही लेना चाहते हैं, तो ऐसे मामलों में हिन्दू विवाह अधिनियम के सेक्शन 10 के अंतर्गत एक ऐसा प्रावधान दिया गया है, जिसके माध्यम से पति और पत्नी बिना तलाक के एक दूसरे से अलग रह सकते हैं, और ऐसे प्रावधान को न्यायिक अलगाव के नाम से जाना जाता है। इसके साथ ही कुछ मामले ऐसे भी हो सकते हैं, जिनमें किसी भी पारिवारिक कारणों से पति और पत्नी एक दूसरे के साथ नहीं रह सकते हैं, किन्तु किन्हीं वजहों से वे एक दूसरे को तलाक भी नहीं दे सकते हैं, तो इसी बात को ध्यान में रखते हुए हिंदू विवाह कानून 1955 के सेक्शन 10 के अनुसार न्यायालय द्वारा कोई भी पति या पत्नी को जुडिशल सेपरेशन या न्यायिक अलगाव का आदेश प्राप्त करके एक दूसरे से बिना तलाक के अलग रहने का अधिकार प्राप्त हो सकता है। ज्यूडिशियल सेपरेशन की प्रक्रिया में न्यायालय को इस बात पर विचार नहीं करना होता है, कि शादी पूरी तरह से खत्म हो रही है। किन्तु तलाक की याचिका में इसका जिक्र करना जरूरी होता है।
लेकिन न्यायालय जुडिशल सेपरेशन का आदेश केवल कुछ ही शर्तों पर देती है, जिनका वर्णन हिन्दू विवाह अधिनियम के सेक्शन 13 के उप - सेक्शन 1 में किया गया है। इनमें क्रूरता, अकेलापन, धर्म परिवर्तन, कुष्ठ रोग, संक्रामक रोग, पति या पत्नी का त्याग कर देना, या आप पिछले 7 वर्षों से अपनी पत्नी या पति के बारे में कोई जानकारी नहीं है, आदि शर्तें शामिल हैं। एक बार न्यायिक अलगाव का आदेश मिल जाने पर किसी भी पति या पत्नी को अपने साथी के साथ रहने के लिए जरूरी नहीं होता है।

वैवाहिक संबंधों की बहाली के मामलों में वकील की जरूरत क्यों होती है
वैवाहिक संबंधों की बहाली के मामलों में कोई भी पति या पत्नी अपने अलग हुए साथी से पुनः जुड़ने के लिए न्यायालय में आवेदन करते हैं, जिसके लिए एक वकील ही कम समय और कम खर्चे में न्यायालय की प्रक्रिया को पूर्ण कर सकता है। चूँकि सभी धर्मों के कानून अलग - अलग तरीके से होते हैं, जिसके बारे में आम लोगों को जानकारी नहीं होती है, एक वकील ही सही तरीके से दोनों पति या पत्नी को उनके बीच की परेशानी के आधार पर उनको सही सुझाव देने में भी लाभकारी सिद्ध हो सकता है, यदि किसी पति और पत्नी के बीच की परेशानी बहुत ज्यादा होती है, और जो न्यायिक अलगाव का आदेश प्राप्त करने से ही हल हो सकती है, तो फिर वकील उन लोगों को न्यायिक अलगाव का सुझाव देगा, जिससे उन लोगों का रिश्ता भी बना रहेगा और उनके बीच की परेशानी भी हल हो सकती है, और शायद भविष्य में वो लोग अपने रिश्ते वैवाहिक संबंधों की बहाली करके फिर से शुरू भी कर सकते हैं।

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