अपराधिक 420 केस में सजा -कानूनी सहायता

सवाल


आईपीसी 420 अपराधिक मामले में अधिकतम सजा क्या है? मामला घर / संपत्ति धोखाधड़ी पैसे से संबंधित है अमानत के रूप में लिया गया था और मांग पर वापस लौटाया गया था (25/- रुपये के स्टांप पेपर पर रसीद और शपथ आयुक्त द्वारा नोटरी)। लेकिन शिकायतकर्ता जानबूझकर धन की प्राप्ति की बात को नकार रहा है| क्या वो नोटरी स्टांप पेपर पर रसीद से इनकार कर सकते हैं? अगर कोई व्यक्ति 8 लाख में अपनी संपत्ति बेचता है, तो क्या वो बिना किसी सबूत के 26 लाख में उसका दावा कर सकता है? बस एफआईआर @ 420 की खातिर?

उत्तर


420 के मामले में अधिकतम सजा जुर्माना या जुर्माने के बिना 7 साल है|

एक विधिवत नोटरी स्टांप पेपर एक वैध दस्तावेज है और शपथ आयुक्त के सबूत द्वारा, इसकी कानूनी वैधता अदालत में साबित की जा सकती है यदि अन्य पार्टी उसके निष्पादन को नकार रहा है|

भारतीय दंड संहिता, 1860 के अनुसार धारा 420 में इस बात का प्रावधान दिया गया है, कि यदि जो कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को किसी बात के लिए धोखा देता है, और वह इस तरह बेईमानी करके किसी व्यक्ति को, किसी प्रकार की, संपत्ति को हस्तांतरित करने के लिए धोखा देता है, या किसी मूल्यवान संपत्ति को या उसके किसी भी हिस्से को बदलने या नष्ट करने, या किसी प्रकार के जाली हस्ताक्षर करने के लिए प्रेरित करता है, जबकि वह संपत्ति किसी बहुमूल्य संपत्ति में परिवर्तित होने के योग्य हो, तो ऐसे किसी व्यक्ति को भारतीय न्यायालय द्वारा कारावास के लिए दण्डित किया जा सकता है, जिसकी समय सीमा को सात बर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। कारावास के दंड के साथ ही साथ न्यायालय द्वारा उस व्यक्ति पर उचित आर्थिक दंड भी लगाया जा सकता है, जिसकी राशि को न्यायालय अपराधी के द्वारा किये गए जुर्म की संगीनता को उसकी हैसियत के अनुसार तय करती है।

धारा 420 के आवश्यक तत्व क्या क्या होते हैं?

1. किसी व्यक्ति को धोखा (चीटिंग) देना

2. किसी भी मूल्यवान संपत्ति या किसी भी महत्वपूर्ण चीज़ को सील करने या उसके आकर, प्रकार में बदलाव करने के लिए या उस संपत्ति को नष्ट करने के लिए बेईमानी की भावना से किसी अन्य व्यक्ति को प्रेरित करना।

3. कोई धोखा धड़ी या बेईमानी करने के लिए किसी व्यक्ति की आपराधिक मन स्तिथि।

4. किसी व्यक्ति को धोखा देने के उद्देश्य से किसी भी बात का जान बूझकर झूठा प्रतिनिधित्व करना

किसी भी बात का झूठा प्रतिनिधित्व करना भी भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी का अपराध करने के लिए आवश्यक अवयवों में से एक है। न्यायालय में धोखाधड़ी के अपराध को सिद्ध करने के लिए केवल यह साबित करना ही आवश्यक नहीं होता है, कि एक व्यक्ति द्वारा किसी बात का गलत प्रतिनिधित्व किया गया था, अपितु यह साबित करना भी अत्यंत आवश्यक है, कि यह गलत प्रतिनिधित्व अभियुक्त जानकारी में किया गया था और जिसका उद्देश्य केवल शिकायतकर्ता को धोखा देना था।

धारा 420 के मामले में सजा और जमानत का प्रावधान

1. इस धारा के अंतर्गत अधिकतम सात वर्ष कारावास निर्धारित किया गया है, जो कि न्यायाधीश के द्वारा तय किया जाता है। कारावास के दंड के साथ साथ आर्थिक दंड देने का भी प्रावधान है, जो कि न्यायाधीश जुर्म की संगीनता के आधार पर तय करते हैं। यह एक गैर - जमानती और संज्ञेय अपराध है, और किसी भी न्यायधीश द्वारा विचारणीय है, न्यायालय की अनुमति से पीड़ित व्यक्ति द्वारा समझौता भी किया जा सकता है।

2. किसी भी अभियुक्त को कारावास से छुड़ाने के लिए न्यायालय के सामने जो धनराशि जमा की जाती है, या राशि को जमा करने की प्रतिज्ञा ली जाती है, उस राशि को एक बॉन्ड के रूप में भरा जाता है, इसे ही जमानत की राशि कहा जाता है। और जमानत की राशि के बॉन्ड तैयार होने के बाद न्यायालय द्वारा न्यायाधीश के द्वारा उचित तर्क के आधार पर ही आरोपी को जमानत दी जाती है।

3. यदि किसी व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के अंतर्गत गिरफ्तार किया जाता है, तो वह सत्र न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिए भी आवेदन कर सकता है। न्यायाधीश द्वारा स्वीकृति प्रदान करने के उपरांत ही अभियुक्त को जमानत प्रदान कर दी जाती है। अभी तक जमानत के लिए कोई निर्धारित प्रक्रिया नहीं है। यह लेनदेन की प्रकृति और आरोपों की गंभीरता पर निर्भर करती है।

जमानत के लिए भारतीय दंड संहिता में कुछ ऐसी भी धाराएं हैं, जिसमे 10 वर्ष तक के कारावास का प्रावधान होता है, उसमें 90 दिनों के भीतर जांच एजेंसी को न्यायालय में चार्जशीट दाखिल करनी होती है, यदि इस समयावधि में किसी कारणवश चार्जशीट दाखिल नहीं हो पाती है, तो न्यायालय द्वारा अभियुक्त को जमानत दे दी जाती है। अगर किसी धारा में 10 वर्ष से कम सजा का प्रावधान होता है, तो ऐसे मामलों में जाँच एजेंसी को 60 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करनी होती है, यदि इस अवधि में चार्जशीट दाखिल नहीं होती है, तो भी न्यायालय द्वारा अभियुक्त को जमानत दे दी जाती है। जमानत के समय न्यायाधीश अभियुक्त के क्रिमिनल रिकार्ड की गहन जाँच करते हैं, जिसके आधार पर जमानत ही वे जमानत देने का निर्णय लेते हैं।

धारा 420 में वकील की जरुरत क्यों होती है?

यह एक संगीन और गैर जमानती अपराध है, जिसमें अधिकतम सात बर्ष की सजा के साथ - साथ आर्थिक दंड का भी प्रावधान दिया गया है। इसमें न्यायालय में आरोपी का इरादा साबित करने की आवश्यकता होती है, कि उसने धोखा धड़ी और किसी प्रकार का झूठा प्रतिनिधित्व किया है, या नहीं। जिसको साबित करने के लिए एक आपराधिक वकील ही उचित रूप से लाभकारी सिद्ध हो सकता है। और ऐसे मामलों में ऐसे किसी वकील को नियुक्त करना चाहिए जो कि ऐसे मामलों में पहले से ही पारंगत हो, और धारा 420 जैसे मामलों को उचित तरीके से सुलझा सकता हो। जिससे आपके केस को जीतने के अवसर और भी बढ़ सकते हैं।

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