महिला/नारी सशक्तिकरण कानून क्या है?| निबंध,विवाद,लेख

महिला या नारी सशक्तिकरण क्या है


August 20, 2019
एडवोकेट चिकिशा मोहंती द्वारा



‘महिला सशक्तिकरण’ के बारे में जानने से पहले हमें ये समझ लेना चाहिये, कि हम ‘सशक्तिकरण’ से क्या समझते है। ‘सशक्तिकरण’ से तात्पर्य किसी व्यक्ति की उस क्षमता से है, जिससे उस व्यक्ति में वह योग्यता आ जाती है, जिसमें वो अपने जीवन से जुड़े सभी महत्वपूर्ण निर्णय स्वयं ले सके, और खुद के बारे में उचित और अनुचित न्याय कर सके। महिला सशक्तिकरण में भी हम उसी क्षमता की बात कर रहे हैं, जहाँ महिलाएँ परिवार और समाज के सभी बंधनों से मुक्त होकर अपने निर्णयों की निर्माता खुद हों।

महिला सशक्तिकरण आज के युग में विकास और अर्थशास्त्र में चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है। क्योंकि प्राचीनकाल से यह देखा जा रहा है, की समाज में महिलाओं को पुरुषों के समक्ष तुच्छ समझा जाता था, तथा सती प्रथा, दहेज़ हत्या जैसी बहुत सी कुरीतियाँ समाज में फैली हुई थी। और महिला सशक्तिकरण किसी विशेष राजनीतिक या सामाजिक संदर्भ में अन्य मुद्दों से संबंधित दृष्टिकोणों को भी इंगित कर सकता है।

महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण से तात्पर्य महिलाओं को संसाधनों, परिसंपत्तियों, आय और अपने स्वयं के समय के साथ - साथ जोखिम या कठिनाइयों को नियंत्रित करने और उनके प्रबंधन और जोखिम को प्रबंधित करने के साथ साथ उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार करने की क्षमता से लाभ उठाने का अधिकार है।
 

भारत में महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता

भारत में प्राचीन काल की तुलना में मध्य काल में भारतीय महिलाओं के सम्मान स्तर में काफी कमी आयी, हालांकि आधुनिक युग में कई भारतीय महिलाएं कई सारे महत्वपूर्ण राजनैतिक तथा प्रशासनिक पदों पर पदस्थ थीं, और उन्होंने अपने पद का काफी अच्छे ढंग से पालन भी किया था। फिर भी सामान्य ग्रामीण महिलाएं आज भी अपने घरों में रहने के लिए बाध्य हैं, और उन्हें सामान्य स्वास्थ्य सुविधा और शिक्षा जैसी अत्यंत आवश्यक सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं।

शिक्षा के मामले में भी भारत में महिलाएं पुरुषों की तुलना में काफी पीछे हैं। भारत में पुरुषों की शिक्षा दर 75.7 प्रतिशत है, जबकि महिलाओं की शिक्षा दर मात्र 62 प्रतिशत ही है। हमारे देश में बहुत सारी महिलाओं को शिक्षा की सुविधा तक उपलब्ध नहीं कराई जा रही है, और अगर कहीं शिक्षा उपलब्ध भी है, तो कुछ ही कक्षाओं की पढाई के बाद ही उनकी पढाई को छुड़वा दिया जाता है। भारत में शहरी क्षेत्रों की महिलाएं ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं की तुलना में अधिक रोजगारशील और शिक्षित हैं, आंकड़ों के अनुसार भारत के शहरों में साफ्टवेयर इंडस्ट्री में लगभग 30 प्रतिशत महिलाएं कार्य करती हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 90 फीसदी महिलाएं मुख्यतः कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों में दैनिक मजदूरी करती हैं, या तो घर में बैठ कर घर का काम संभालती हैं।
 

भारत में महिला सशक्तिकरण की पहल

  1. श्री श्री रवि शंकर जी का कहना है, कि "यदि महिलाओं को सामाजिक असमानता, पारिवारिक हिंसा, अत्याचार और आर्थिक अनिर्भरता जैसे विकारों से छुटकारा पाना है, तो इसके लिए महिला सशक्तिकरण की बहुत जरुरत है।

  2. भारतीय संविधान में इसकी प्रस्तावना से ही लैंगिक समानता के सिद्धांत की बात की गयी है। इसके बाद मौलिक अधिकारों, मौलिक कर्तव्यों और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में भी महिलाओं और पुरुषों को सामान अधिकार देने की बात की गयी है। संविधान न केवल महिलाओं को समानता प्रदान करता है, बल्कि राज्य को महिलाओं के पक्ष में सकारात्मक कदम उठाने के उपायों को अपनाने का भी अधिकार देता है।

  3. भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति के ढांचे के भीतर, कई कानूनों, विकास की नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों का उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की सकारात्मक उन्नति करना ही है। पांचवीं पंचवर्षीय योजना (1974-78) के बाद से महिलाओं के विभिन्न मुद्दों पर कल्याण से लेकर विकास तक के दृष्टिकोण में बहुत बदलाव आया है। हाल ही के वर्षों में महिलाओं की स्थिति के निर्धारण में महिलाओं के सशक्तीकरण को केंद्रीय मुद्दे के रूप में मान्यता दी गई है। महिलाओं के अधिकारों और उनके कानूनी अधिकारों की सुरक्षा के लिए 1990 में भारतीय संसद के एक अधिनियम द्वारा "राष्ट्रीय महिला आयोग" की स्थापना की गई थी। भारत के संविधान के 73 वें और 74 वें संशोधन (1993) में महिलाओं के लिए पंचायतों और नगर पालिकाओं के स्थानीय निकायों के चुनावों में सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है, जो स्थानीय स्तर पर विकास के महत्वपूर्ण निर्णय लेने में महिलाओं की भागीदारी के लिए एक मजबूत नींव रखते हैं।

  4. भारत ने महिलाओं के समान अधिकारों और उनके उचित सम्मान को सुरक्षित रखने के लिए विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और मानव अधिकारों के उपकरणों की पुष्टि की है। इसके साथ ही 1993 में महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के सभी रूपों के समाप्त करने के लिए एक विशाल कन्वेंशन भी किया गया था।

  5. भारत ने महिलाओं और लैंगिक समानता की उचित कार्यवाही के लिए भेदभाव रहित रूप से समर्थन के लिए कुछ महत्वपूर्ण अधिवेशन और घोषणा में भाग लिया, जैसे कि, द मेक्सिको प्लान ऑफ़ एक्शन (1975), नैरोबी फॉरवर्ड लुकिंग स्ट्रेटेजीज़ (1985), बीजिंग घोषणा और प्लेटफ़ॉर्म फॉर एक्शन (1995) और यू. एन. जी. ए. सत्र द्वारा अपनाये गई डॉक्यूमेंट का परिणाम, 21 वीं शताब्दी के लिए लैंगिक समानता और विकास और शांति पर अधिवेशन जिसका शीर्षक है, "बीजिंग घोषणा के साथ ही साथ प्लेटफ़ॉर्म फॉर एक्शन को लागू करने के लिए कार्यवाही और पहल" आदि।
     

भारत में महिला सशक्तिकरण के मार्ग में आने वाली बाधाएं

भारतीय समाज में कई तरह के रिवाज, मान्यताएं और परंपराएं शामिल है। कई बार यह पुरानी मान्यताएं और परंपराए भारत में महिला सशक्तिकरण के लिए बाधा सिद्ध होती है। महिलाओं के रास्ते में आने वाली इसी तरह की कई सारी बाधाओं के बारे में नीचे बताया गया है।

  1. सामाजिक मापदंड

  2. कार्यक्षेत्र में शारीरिक शोषण

  3. लैंगिग भेदभाव

  4. श्रम के बदले में भुगतान में असमानता

  5. अशिक्षा

  6. बाल विवाह

  7. महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराध

  8. कन्या भ्रूणहत्या
     

भारत में महिला सशक्तिकरण के लिए सरकार द्वारा चलायी गयी कुछ प्रमुख योजना

  1. बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना

  2. नेशनल मिशन फॉर इम्पावरमेंट ऑफ़ वूमेन

  3. कार्य महिला छात्रावास योजना

  4. महिला हेल्पलाइन योजना

  5. वन स्टॉप सेन्टर योजना

  6. स्वाधार गृह योजना

  7. राजीव गाँधी राष्ट्रीय आंगनवाड़ी योजना

  8. उज्जवला योजना

  9. सपोर्ट टू ट्रेनिंग एंड एम्प्लॉयमेंट प्रोग्राम फॉर वूमेन (स्टेप)

  10. पंचायाती राज योजनाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण

  11. महिला शक्ति केंद्र




 

ये गाइड कानूनी सलाह नहीं हैं, न ही एक वकील के लिए एक विकल्प
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