भारत में कोर्ट मैरिज के नियम


February 24, 2020
एडवोकेट चिकिशा मोहंती द्वारा



भारत में विवाह के लिए अलग - अलग धार्मिक समुदायों को अलग - अलग अधिकार और दायित्व दिए गए हैं। देश के सभी धर्मों के लोगों को उनका अलग - अलग पर्सनल लॉ भी उपलब्ध कराया गया है, जैसे हिंदुओं के लिए हिंदू विवाह अधिनियम 1955 एवं हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम तथा मुसलमानों के लिए शरियत कानून का प्रावधान दिया गया है। यह कानून मुसलमानों की पर्सनल कानून का काम करता है, जैसे विवाह, उत्तराधिकार, तलाक, भरण पोषण, दत्तक ग्रहण इत्यादि विषयों पर यह कानून होता है।

विवाह करने का अधिकार एक प्रकार के मानव अधिकार की श्रेणी में रखा गया है, कोई भी समुदाय या कानून विवाह करने से किसी व्यक्ति को रोक नहीं सकता है। पर्सनल लॉ के कुछ नियम बहुत सारे मामलों में व्यक्तियों में विभेद भी करती है, तथा विवाह करने से भी रोकती है। जैसे मुसलमानों पर लागू शरीयत का कानून केवल दो मुसलमानों के विवाह से संबंधित है, अर्थात विवाह करने के लिए दोनों पुरुष और स्त्री मुस्लिम समुदाय से जुड़े हुए होने चाहिए। किन्तु यदि दोनों में से कोई एक मुसलमान है, और कोई एक अन्य धर्म से है, तो यह कानून ऐसे विवाह को मान्यता नहीं देता है।

1954 में भारत की संसद में एक क्रांतिकारी कदम उठाया गया था, जिसमें एक ऐसा कानून पारित किया गया था, जिसके माध्यम से कोई भी दो लोग जो भिन्न धर्मों से आते है, भिन्न जाति से आते है, तथा जिनके बीच में उम्र बंधन भी हो सकते हैं। वह व्यक्ति बगैर किसी बंधन के विवाह कर सकते हैं। भारत का विधान इन व्यक्तियों को इस अधिनियम के अंतर्गत एक कोर्ट मैरिज का विकल्प उपलब्ध कराता है।

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कोर्ट मैरिज के लिए आवश्यक दस्तावेज

कोर्ट मैरिज करने के लिए मुख्य रूप से निम्न दस्तावेजों की आवश्यकता पड़ती है:
 

  1. पूरी तरह से और सही भरा हुआ आवेदन पत्र और जरूरी शुल्क।
     

  2. दूल्हा - दुल्हन के पासपोर्ट साइज के चार - चार फोटो। 
     

  3. आवास व पहचान का प्रमाण पत्र। 
     

  4. उम्र के प्रमाण के तौर पर जन्म प्रमाण पत्र या दसवीं की मार्कशीट। 
     

  5. शपथ पत्र कि दोनों में कोई भी किसी अवैध रिश्ते में नहीं बंधा है। 
     

  6. तलाकशुदा के मामले में तलाक का आदेश और विधवा के मामले में पहले के जीवन साथी का मृत्यु प्रमाण पत्र लगाना होगा। 
     

  7. गवाहों की फोटो व पैन कार्ड। 
     

  8. पहचान के लिए ड्राइविंग लाइसेंस या आधार कार्ड जैसा दस्तावेज।

     

कोर्ट मैरिज की प्रक्रिया

कोर्ट मैरिज की प्रक्रिया को निम्नलिखित कुछ चरणों में विभाजित किया गया है, जो कि निम्नलिखित हैं,
 

पहला चरण

1. प्रयोजित विवाह की सूचना / आवेदन देना


  कोर्ट में विवाह करने के लिए सर्वप्रथम जिले के विवाह अधिकारी को सूचित किया जाना चाहिए।

 

2. सूचना किसके द्वारा दी जानी चाहिए?

 

विवाह में शामिल होने वाले दोनों पक्षों (वर और वधु के द्वारा) द्वारा लिखित रूप में सूचना दी जानी चाहिए।
 

3. सूचना किसे दी जानी चाहिए?

 

कोर्ट मैरिज की सूचना उस जिले के विवाह अधिकारी को दी जाएगी, जिस जिले में विवाह करने वाले दोनों पक्ष में से कम से कम किसी एक पक्ष ने सूचना की तारीख से एक महीने पहले तक उस जिले में निवास किया हो। उदाहरण के तौर पर, यदि पुरुष और महिला दिल्ली में निवास करते हैं, और वे दोनों मुंबई में विवाह करना चाहते हैं, तो उन दोनों में से किसी एक को सूचना की तारीख से 30 दिन पहले मुंबई में निवास करना अनिवार्य है।
 

4. सूचना का स्वरूप क्या होता है?

 

सूचना का स्वरूप अधिनियम की अनुसूची 2 के अनुसार होना चाहिए, जिसके साथ आयु और निवास के प्रमाण के दस्तावेज भी संलग्न होने चाहिए।

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दूसरा चरण

 

1. सूचना का प्रकाशन किसके सामने और कौन प्रकाशित करता है?

 

जिले के विवाह अधिकारी जिसके सामने सूचना जारी की गयी थी, वह ही सूचना प्रकाशित करते हैं।
 

2. विवाह के लिए सूचना कहाँ प्रकाशित की जाती है?

 

कोर्ट मैरिज करने के लिए सूचना की एक प्रति कार्यालय में एक विशिष्ट स्थान पर तथा एक प्रति उस जिला कार्यालय में जहाँ विवाह पक्ष स्थायी रूप से निवासित हैं, (अगर कोई है), प्रकाशित की जाती है, उदाहरण के लिए यदि कोई दिल्ली में रहता है, और मुंबई में कोर्ट मैरिज करना चाहता है, तो सूचना की एक प्रति दिल्ली में तथा एक प्रति मुंबई में प्रकाशित की जाएगी।
 

तीसरा चरण

 

विवाह में उत्पन्न होने वाली आपत्तियाँ:
 

1. आपत्ति कौन प्रस्तुत कर सकते हैं?

 

कोई भी व्यक्ति, अर्थात अधिनियम के अध्याय 2, के अनुसार अनुभाग 4 में सूचीबद्ध आधारों पर कोई भी व्यक्ति विवाह में आपत्ति प्रस्तुत कर सकता है। यदि प्रस्तुत की गयी आपत्तियों का ऊपर दिए गए तत्वों से मेल जोल कम हो तो उस आपत्ति का परिणाम नहीं होगा। हालांकि, ज्यादातर मामलों में, विवाह अधिकारी को आपत्ति की जांच करना बहुत जरूरी होता है।
 

2. आपत्ति कहाँ प्रस्तुत की जाती है?

 

आपत्ति संबंधित जिले के विवाह अधिकारी के सामने प्रस्तुत की जाती है।
 

3. आपत्ति के आधार क्या होते हैं?

 

ऊपर दी गयी शर्तें तथा अधिनियम के अध्याय 2, के अनुसार अनुभाग 4 में दी गयी सूची ही आपत्ति के आधार होते हैं।
 

4. यदि आपत्ति  स्वीकार हो जाये, तो उसके परिणाम क्या है?

 

आपत्ति की प्रस्तुति होने के 30 दिनों के भीतर विवाह अधिकारी द्वारा जांच पड़ताल करना जरूरी है। यदि प्रस्तुत आपत्तियों को सही पाया गया, तो इस प्रकार की कोर्ट मैरिज सम्पन्न नहीं हो सकती है।
 

5. स्वीकार की गयी आपत्तियों पर क्या उपाय है?

 

यदि कोई आपत्ति स्वीकार कर ली गयी है, तो स्वीकार की गयी आपत्तियों पर कोई भी पक्ष न्यायालय में अपनी अपील दर्ज कर सकता है।
 

6. अपील किसके पास दर्ज की जा सकती है?

 

अपील आपके स्थानीय जिला न्यायलय में विवाह अधिकारी के अधिकार क्षेत्र में दर्ज की जा सकती है।
 

7. अपील कब दर्ज की जा सकती है?

 

आपात्ति स्वीकार होने के 30 दिन के भीतर अपील दर्ज की जा सकती है।
 

चौथा चरण

 

घोषणा पर हस्ताक्षर:
 

1. घोषणा पर कौन हस्ताक्षर कर सकता है?

 

कोर्ट मैरिज के लिए प्रस्तुत की गयी घोषणा पर दोनों पक्ष और तीन गवाह (विवाह अधिकारी की उपस्थिति में) हस्ताक्षर करते हैं। विवाह अधिकारी भी घोषणा को प्रतिहस्ताक्षरित करता है, जिसके बाद ही घोषणा वैध मानी जाती है।
 

2. घोषणा का लेख और प्रारूप क्या होता है?

 

घोषणा के लेख और प्रारूप को अधिनियम की अनुसूची 3 में प्रदान किया गया है।

 
 

पांचवा चरण

 

विवाह का स्थान:
 

1. कोर्ट मैरिज के लिए विवाह का स्थान क्या होना चाहिए?

 

कोर्ट मैरिज के लिए विवाह अधिकारी का कार्यालय या उसके उचित दूरी के भीतर कोई भी जगह पर विवाह का स्थान हो सकता है।
 

2. विवाह का फार्म कैसा होता है?

 

कोर्ट मैरिज करने के लिए विवाह पक्ष का चुना कोई भी फॉर्म स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन विवाह अधिकारी की उपस्थिति में वर और वधु को उस फॉर्म पर हस्ताक्षर करना जरूरी होता है, और वह फॉर्म विवाह अधिकारी द्वारा प्रमाणित भी किया जाना चाहिए।

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छटवां चरण

 

1. कोर्ट मैरिज का सर्टिफिकेट

 

विवाह का प्रमाण पत्र, पूरी प्रक्रिया होने के बाद, विवाह अधिकारी, अपनी विवाह प्रमाण पत्र पुस्तिका में अधिनियम की अनुसूची 4 में निर्दिष्ट रूप में एक प्रमाण पत्र दर्ज करता है। यदि दोनों पक्षों और तीन गवाहों द्वारा हस्ताक्षर किए जाते हैं, तो ऐसा प्रमाण पत्र अदालत के विवाह का निर्णायक प्रमाण होता है।




 

ये गाइड कानूनी सलाह नहीं हैं, न ही एक वकील के लिए एक विकल्प
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