महिलाओं का​ संपत्ति में अधिकार

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October 10, 2019
एडवोकेट चिकिशा मोहंती द्वारा



भारत में हिंदू परिवार में विरासत में मिली संपत्ति को प्राचीन काल में केवल बेटे को ही दिया जाता था। हाल के कानून में संशोधनों के साथ, संपत्ति का अधिकार अब महिलाओं को भी दिया जाने लगा है। हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित एक नियम के अनुसार, एक महिला बर्ष 2005 से पहले अपने पिता की अंतर्निहित संपत्ति में अधिकार का दावा नहीं कर सकती है। इसका मतलब यह है, कि यदि किसी महिला के पिता 2005 से पहले ही गुजर गए थे, तो बेटी अपने पिता की संपत्ति में समान हिस्सेदारी का दावा नहीं कर सकती है।

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क्या कोई विशिष्ट नियम है जो केवल महिलाओं की संपत्तियों पर ही लागू होते हैं?

एक महिला द्वारा छोड़ी गई, या एक महिला की संपत्ति को उसके बच्चों और उसके पति के बीच समान रूप से विभाजित किया जाना चाहिए। यदि कोई बच्चा पहले ही गुजर चुका होता है, तो उस बच्चे का हिस्सा उसके बच्चों के बीच बाँट दिया जाएगा। यदि कोई पति या पत्नी, बच्चा या पोता जीवित नहीं है, तो संपत्ति उस महिला के माता - पिता के बीच विभाजित हो जाएगी। यदि उसके माता - पिता का भी निधन हो गया है, तो संपत्ति उसके माता - पिता के उत्तराधिकारियों के बीच विभाजित हो जाएगी।
 

अपने पति की संपत्ति में विधवा का अधिकार

द हिंदू सक्सेशन एक्ट, 1956 की धारा 10 उस स्थिति में संपत्ति के वितरण के बारे में बात करती है, जहां एक पति की मृत्यु हो जाती है, इस नियम के अनुसार यदि कोई पति बिना वसीयत के मर जाता है, तो उसकी संपत्ति का वितरण अनुसूची के वर्ग 1 के अनुसार किया जाता है, जिसमें उस बिना वसीयत के मरने वाले पति की विधवा को संपत्ति मिलती है, यदि किसी व्यक्ति की एक से अधिक विधवाएँ हैं, तो सभी विधवाएँ मिलकर एक हिस्सा लेंगी।

उदाहरण के लिए, यदि पति की मृत्यु हो जाती है, जिसकी दो विधवाओं और एक बेटा होते हैं, यहां धारा 10 के नियम 1 के प्रावधानों के अनुसार, मृत पति की दोनों विधवाएं पति की संपत्ति में आधे हिस्से से लेंगी और अन्य आधा हिस्सा उस व्यक्ति के बेटे के पास चला जाएगा।

ऐसी स्थितियों में जहां एक पति दो विधवाओं और किसी बेटे को छोड़कर मर जाता है, तो उन दोनों को समान रूप से संपत्ति विरासत में मिलेगी, यानी दोनों को एक हिस्से का आधा भाग मिलेगा।

यदि किसी विधवा महिला का पुनर्विवाह हो गया है, फिर भी उस महिला को उसके मरे हुए पति की संपत्ति में पूर्ण अधिकार होता है। बर्ष 2008 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला किया था, कि पुनर्विवाह करने वाली एक विधवा को उसके मृत पति की संपत्ति में एक हिस्से से वंचित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि न्यायालय के अनुसार एक विधवा महिला अपने मृत पति की संपत्ति की पूर्ण स्वामी बन जाती है।

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भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 के कुछ प्रावधानों के साथ सहमत नहीं होती है, जिसमें कहा गया था, कि वे अधिकार जो किसी भी विधवा को उसके मृत पति की संपत्ति के रखरखाव और उत्तराधिकार में प्राप्त होते है, उस विधवा के पुनर्विवाह के बाद समाप्त हो जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, कि हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम ने हिंदू कानून में भारी बदलाव लाया है, जिससे कि पुरुष उत्तराधिकारियों के साथ - साथ विरासत और उत्तराधिकार के मामले में हिंदू विधवाओं को भी पात्र और समान बनाया है।

शीर्ष अदालत ने माना कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 4 का हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम सहित किसी भी हिंदू कानून पर अधिभावी प्रभाव पड़ता है।




 

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