तलाक के बाद बच्चे की हिरासत/कस्टडी | Child Custody in Hindi

तलाक के बाद बच्चे की कस्टडी


June 13, 2019
एडवोकेट चिकिशा मोहंती द्वारा



न्यायालय की दृष्टि में बच्चे की भलाई व उसका हित सर्वोपरि होता है। न्यायालय इस बात पर ध्यान देते हुए ही फैसला करती है, कि बच्चा माता या पिता में से किसके पास ज्यादा सुरक्षित है। 95 प्रतिशत मामलों में बच्चे की कस्टडी का दायित्व माँ को ही सौंपा जाता है। यहां तक कि वेश्यावृति से जुड़ी महिलाओं के लिए भी यह कानून समान रूप से लागू होता है। क्योंकि यह माना जाता है, कि माँ बच्चे की हर प्रकार से हजार गुना बेहतर देखभाल कर सकती है, और बच्चा भी भावनात्मक रूप से माँ के ज्यादा करीब होता है। 5 प्रतिशत मामलों में बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपी जाती है। ऐसे में बच्चे की रजामंदी भी एक महत्वपूर्ण कारण होती है।

चूँकि, भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जहां देश में मौजूद सभी धर्मों का सामान रूप से आदर किया जाता है। धर्मनिरपेक्ष देश होने के कारण ही न्यायालय भी सभी धार्मिक मान्यताओं का समान रूप से सम्मान करती है। चूँकि, व्यक्तिगत कानूनों में शारीरिक चाइल्ड कस्टडी की अलग-अलग धारणा है, और इसीलिए वह भारत में न्यायालय द्वारा स्वीकार्य भी होती हैं।
 

बच्चे के माता - पिता की शादी के टूटने के बाद, एक बच्चे को निम्न रूप से कस्टडी में दिया जा सकता है

जॉइंट फिजिकल कस्टडी
यह एक नई अवधारणा विकसित की गयी है, जो की तलाक के काफी मामलों को सुलझाने के बाद लायी गयी है। इसमें माता - पिता दोनों के पास बच्चे की कानूनी कस्टडी होगी, लेकिन दोनों में से किसी एक के पास बच्चे की शारीरिक कस्टडी होगी (बच्चा दोनों में से किसी एक के साथ रहता है)। और वह बच्चे का प्राथमिक देखभाल करने वाला होगा। और दूसरे के पास बच्चे से मिलने और उसके रखरखाव का अधिकार होता है।

व्यक्तिगत कस्टडी
यदि दोनों माता - पिता में से कोई एक दुर्व्यवहारी या फिर बच्चे के भविष्य के लिए अनफिट साबित हो जाता है, या फिर न्यायालय में यह सिद्ध हो जाता है की बच्चा माता या पिता दोनों में किसी एक के पास सुरक्षित नहीं है। तो ऐसे स्तिथि में दोनों माता या पिता में से जो बच्चे के भविष्य के लिए लाभकारी होता है, उसी को बच्चे की कस्टडी सौंप दी जाती है।

थर्ड पार्टी कस्टडी
यदि न्यायालय में यह साबित हो जाता है, कि बच्चा दोनों माता या पिता में से किसी के पास भी सुरक्षित नहीं है, या फिर उसके माता - पिता उस बच्चे को त्यागने के प्रयत्न करते रहते हैं। तो न्यायालय उस बच्चे कि कस्टडी किसी ऐसे व्यक्ति को देती है, जो बच्चे के के उज्जवल भविष्य के लिए हितकर साबित हो।

हिंदू कानून के तहत बच्चे की कस्टडी
भारत में 'संरक्षकता और कल्याण अधिनियम, 1890' के अंतर्गत बच्चे की कस्टडी या बच्चे के लिए किसी उचित अभिभावक की नियुक्ति के लिए धर्मनिरपेक्ष रूप से, बिना किसी जाति, समुदाय या धर्म के भेदभाव से की जाती है। इस अधिनियम के तहत-

  1. 5 वर्ष से कम आयु के छोटे बच्चे को, उसकी माँ की कस्टडी में ही रखा जाएगा।

  2. बड़े बच्चों में से लड़के की कस्टडी पिता को और लड़की की कस्टडी माता को दी जाएगी, हालांकि, इसके लिए कोई कठिन और सख्त नियम नहीं है। किन्तु सभी नियमो में बच्चे के भविष्य और सर्वोपरि विकास को महत्त्व दिया जाता है।

  3. किसी बच्चे की कस्टडी उसकी इच्छानुसार अभिभावक को तब ही दी जाती है, जब बच्चा 9 वर्ष की आयु का हो चुका हो, और उसकी इच्छानुसार अभिभावक उस बच्चे की कल्याण और उज्जवल भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति का पालन करता हो।

  4. यदि एक माँ जो अपने शैशवावस्था में बच्चे की उपेक्षा करने के लिए सिद्ध होती है, या वह उस बच्चे के जन्म न लेने के लिए गर्भपात करने की कोशिश करती है, तो कानून में ऐसी माँ को बच्चे की कस्टडी नहीं दी जाती है।
     

मुस्लिम कानून के तहत बच्चे की कस्टडी

नाबालिग बच्चों की कस्टडी से संबंधित मामलों को ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937’ के प्रावधान के तहत माना जाता है, जो कि दिल्ली के माननीय उच्च न्यायालय ने 'मोहम्मद निहाल बनाम स्टेट' के केस के तहत बरकरार रखा गया है, जिसके अंतर्गत मुस्लिम लोगों में उत्तराधिकार, विवाह, तलाक, संरक्षकता आदि से संबंधित मामलों के बारे में, मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) लागू होगा। मुस्लिम कानून में बच्चे की कस्टडी निम्न तरीके से निर्धारित की जा सकती है-

माँ के पास हिजनात का अधिकार
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है, कि नौजवानों की संरक्षकता माँ के पास होती है, और माँ को उसके इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि आमतौर पर वह अपने बच्चे के लिए दुर्भाग्यपूर्ण व्यवहार नहीं करती है। माँ के पास अपने बच्चे की संरक्षकता का अधिकार तब तक होता है, जब तक कि वह कानून के अनुसार अयोग्य नहीं होती है। माँ के इस अधिकार को हिज़ानत के अधिकार के रूप में जाना जाता है, और वह अपना यह हक़ बच्चे के पिता / अपने पति या किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ जाकर भी प्राप्त कर सकती है। हिजनात का माँ का अधिकार विशेष रूप से बच्चों के हित और सर्वोच्छ विकास के लिए माना जाता था, और बच्चे के हित के लिए ही यह एक उचित अधिकार होता है।

बेटे के मामले में कस्टडी का अधिकार
हनाफी कानून के हिसाब से यह नियम बनाया गया था, कि सात वर्ष तक की आयु पूरी होने तक ही एक माँ अपने बेटे के ऊपर हिज़ानत का अधिकार पा सकती है। शियाओं के मामले में एक माँ अपने बेटे की तब तक कस्टडी ले सकती है, जब तक वह बेटा अपने यौवन की आयु न प्राप्त कर ले।  मलीकी कानून के हिसाब से एक मुस्लिम माँ तब तक अपने बेटे पर हिज़ानत का अधिकार पा सकती है, जब तक वह बेटा अपने कानून के हिसाब से वयस्कता की आयु न प्राप्त कर ले। शफी और हनाबली कानून में भी एक मुस्लिम माँ का हिज़ानत का अधिकार मलीकी कानून के समान ही है।

बेटी के मामले में कस्टडी का अधिकार
हनाफी कानून के हिसाब से एक मुस्लिम माँ अपनी बेटी की कस्टडी की हक़दार तब तक हो सकती है, जब तक वह बेटी अपने कानून के हिसाब से वयस्कता की आयु न प्राप्त कर ले। हनाबली, शफी और मलीकी कानून में एक मुस्लिम माँ के पास उसकी बेटी की कस्टडी का अधिकार बेटी की शादी तक जारी रहता है। यदि किसी मामले में माता - पिता की अनुपस्थिति या उनके अयोग्य घोषित किए जाने के समय बच्ची की कस्टडी का हक़ दादा का होता है।




 

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