अग्रिम जमानत याचिका: अग्रिम जमानत कैसे मिलती है

अग्रिम जमानत कैसे मिलती है


June 10, 2019
एडवोकेट चिकिशा मोहंती द्वारा



जब कोई व्यक्ति किसी अपराध में गिरफ्तार होने वाला हो, या उसे इस बार का डर हो की उसे किसी ऐसे केस में फसा कर जेल में बंद किया जा सकता है, जो कि उसने किया ही नहीं है, तो ऐसे में जेल जाने से बचने के लिए वह न्यायालय से गिरफ्तार होने से पहले ही अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है। जब न्यायालय उस आवेदन को स्वीकृति दे देती है, तो न्यायालय के आदेशानुसार पुलिस उस व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं करती है, न्यायालय द्वारा जमानत का ये आदेश अग्रिम जमानत (एंटीसिपेटरी बेल) कहलाता है, ये अग्रिम जमानत दो प्रकार से की जा सकती है-

  1. एफ. आई. आर. होने से पहले

  2. एफ. आई. आर. होने के बाद
     

एफ. आई. आर. होने से पहले

यदि दो लोगो की आपस में अनबन है, और उनमें से एक को ऐसा लगता है, कि दूसरा उस पर कोई झूठा केस बनवा कर गिरफ्तार करवा सकता है, और यदि पहले को कहीं से ये पता चलता है, कि दूसरा ऐसा कुछ करने का प्लान बना रहा है, या फिर, ऐसे हालत हो गए है कि उस के खिलाफ कभी भी एफ. आई. आर. हो सकती हो, तो पहला व्यक्ति न्यायालय में अपनी अग्रिम जमानत (एंटीसिपेटरी बेल) के लिए आवेदन कर सकता है। इसमें न्यायालय पुलिस को यह आदेश देती है, कि, अगर कोई एफ. आई. आर. उस व्यक्ति / आवेदनकर्ता के खिलाफ की जाती है, तो एफ. आई. आर. करने के बाद, पुलिस उसको गिरफ्तार करने से सात दिन (या जितने दिन कोर्ट चाहे) पहले सूचित करेगी, और एफ. आई. आर. की कॉपी देगी ताकि वह व्यक्ति अपनी बेल / जमानत का इंतजाम कर ले।
 

एफ. आई. आर. होने के बाद

अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ पुलिस में कोई एफ. आई. आर. हो गई है, या फिर पुलिस की किसी केस की जाँच में उस व्यक्ति का नाम भी आरोपियों की लिस्ट में आ रहा है, तो ऐसे हालातों में वह व्यक्ति, भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता 1973, की धारा 438 के अंतर्गत अग्रिम जमानत (एंटीसिपेटरी बेल) का आवेदन कर सकता है, लेकिन इसमें ध्यान देने योग्य बात यह है, कि वह व्यक्ति गिरफ्तार नहीं होना चाहिए, एक बार जब व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया जाता है, तो इस मामले में नियमित रूप से जमानत या अंतरिम जमानत के लिए आवेदन करना अनिवार्य है।

अग्रिम जमानत दाखिल करने पर, विपक्षी पार्टी को जमानत के आवेदन के बारे में अधिसूचित किया जाता है, और वह विपक्षी न्यायालय में जमानत आवेदन के खिलाफ लड़ सकता है (सार्वजनिक अभियोजक भी ऐसा करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है)।
 

अग्रिम जमानत के उदेश्य क्या हैं

  1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सभी भारतीय नागरिकों को जीवन का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता एक महत्वपूर्ण अधिकार है, और इसे एक बहुमूल्य अधिकार माना जाता है, इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारतीय आपराधिक कानून के तहत, भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत का प्रावधान है।

  2. सामान्यतः अग्रिम जमानत का सहारा लेकर किसी निर्दोष व्यक्ति को, किसी झूटे केस, आर्थिक हानी और बदनामी से बचाया जा सकता लिए है | लेकिन उसके लिए न्यायालय को यह लगना चाहिए कि यह व्यक्ति निर्दोष हो सकता है, या पुलिस कि खोजबीन नियमित ढंग से नहीं हो पा रही है, तो न्यायालय अपने विवेक से उस व्यक्ति को अग्रिम जमानत दे सकती है।

  3. अग्रिम जमानत केवल और केवल सेशन कोर्ट से ही ली जा सकती है, या फिर कुछ विशेष परिस्तिथियों में अनुच्छेद 226 में हाई कोर्ट से रिट की मदद से भी ली जा सकती है।

  4. भारत के विधि आयोग ने 24 सितंबर, 1969 की अपनी 41 वीं रिपोर्ट में आपराधिक प्रक्रिया संहिता में एक प्रावधान को जोड़ने के लिए उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय को "अग्रिम जमानत" देने की आवश्यकता बताई। यह प्रावधान किसी व्यक्ति को गैर-जमानती अपराध करने के आरोप में गिरफ्तारी होने से पहले ही जमानत लेने की अनुमति देता है। इस प्रावधान को सम्मिलित करने का मूल उद्देश्य यह था, कि किसी भी व्यक्ति को तब तक किसी भी तरह से सीमित नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि उसे न्यायालय द्वारा दोषी न ठहराया जाए।
     

अग्रिम जमानत लेने​ की प्रक्रिया

अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करने के लिए निम्न बिंदुओं का पालन करना होता है

  1. गिरफ्तारी का डर होने वाले व्यक्ति को किसी अच्छे वकील की मदद लेनी चाहिए, और उसे उन सभी हालातों की जानकारी देनी चाहिए, जिनकी वजह से वह गिरफ्तार होने की उम्मीद कर रहा है।

  2. वकील, कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेजों की सहायता से न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करेगा, जिस अपराध के लिए वह गिरफ्तार होने की उम्मीद कर रहा है, उसकी प्रकृति के आधार पर सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय अग्रिम जमानत की याचिका का आवेदन किया जा सकता है।

  3. अभियुक्त द्वारा वकील द्वारा तैयार की गई अग्रिम जमानत याचिका को भली - भाँति पढ़ना चाहिए, और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि याचिका के सभी बिंदु सही हैं या नहीं, और पढ़ने के बाद सभी संबंधित हलफनामों और वाकालतनामा पर हस्ताक्षर करने चाहिए।

  4. सुनवाई के पहले दिन, यदि न्यायालय अग्रिम जमानत की याचिका से संतुष्ट है, तो मामले के दूसरे पक्ष को नोटिस जारी किया जाएगा, और अगली सुनवाई के लिए तारीख दी जाएगी। न्यायालय मामले के जांच अधिकारी से सुनवाई की अगली तारीख से पहले रिपोर्ट जमा करने के लिए भी कहेगा।

  5. पहली सुनवाई के कुछ दिनों के अंदर ही, याचिकाकर्ता को न्यायालय में रजिस्ट्री के साथ अग्रिम जमानत की प्रक्रिया शुल्क की उचित राशि जमा करनी होगी। यदि प्रक्रिया शुल्क का भुगतान नहीं किया जाता है, तो दूसरे पक्ष को नोटिस जारी नहीं किया जाएगा और इस मामले को न्यायालय का अनुपालन करने में विफलता के लिए अग्रिम जमानत की याचिका को भी खारिज किया जा सकता है।

  6. यह भी एक संभावना होती है, कि अग्रिम जमानत की पहली सुनवाई पर ही न्यायालय में दूसरे पक्ष के सार्वजनिक अभियोजक द्वारा अग्रिम जमानत के नोटिस स्वीकार किया जा सकता है।

  7. सुनवाई की अगली तारीख पर, दूसरे पक्ष की तरफ से सार्वजनिक अभियोजक जमानत याचिका के जवाब के साथ अदालत में पेश होगा, और इस विषय में अपनी दलीलें देगा कि याचिकाकर्ता को अग्रिम जमानत क्यों नहीं दी जानी चाहिए।

  8. दूसरे पक्ष के सार्वजनिक अभियोजक द्वारा न्यायालय में दलीलें पेश करने के बाद और जांच अधिकारी द्वारा तैयार की गयी रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय उन सभी तर्कों को ध्यान में रखते हुए जिन पर अग्रिम जमानत कि याचिका का आवेदन किया गया है, अपने विवेक से निर्णय लेगी कि याचिकाकर्ता को अग्रिम जमानत देनी चाहिए या नहीं।

  9. अग्रिम जमानत की याचिकाकर्ता के वकील को न्यायालय को विश्वास दिलाना होगा कि याचिकाकर्ता एक सज्जन व्यक्ति है, और सोसाइटी में वह एक सम्मानित और प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। और उसके खिलाफ न्यायालय में किसी भी तरह का आपराधिक मामला / रिकॉर्ड लंबित नहीं है। किसी भी तरह की जांच या पूछताछ के लिए न्यायालय जब भी उसे पेश होने के लिए कहेगी तो वह बिना किसी शर्त के खुद को न्यायालय में पेश करेगा। वह न्यायालय की अवमानना नहीं करेगा और न ही देश से फरार होने की सोचेगा। वकील द्वारा उसकी इस तरह की सभी दलीले पूर्ण होने के बाद न्यायालय अग्रिम जमानत देने के लिए पूर्ण रूप से स्वतन्त्र है।

  10. यदि मामले में न्यायालय द्वारा अग्रिम जमानत दी जाती है, तो न्यायालय परिस्तिथि के अनुसार अभियुक्त को ऐसे कुछ नियम और शर्तें प्रदान कर सकती है-

  11. में कुछ धनराशि का जमा करना, पासपोर्ट का आत्मसमर्पण, पुलिस को सूचना के बिना राज्य / देश नहीं छोड़ना, किसी भी तरह के गवाहों को प्रभावित नहीं करना, जांच प्रक्रिया में सहयोग करना और बुलाये जाने पर जांच एजेंसी के समक्ष खुद को उपलब्ध कराना आदि।

  12. पुलिस अधिकारियों को अग्रिम जमानत देने के न्यायालय के आदेश को दिखाने पर, पुलिस उस व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं कर सकती है।
     

न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिए प्रस्तुत करने के लिए आवश्यक दस्तावेज

प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफ. आई. आर.) की एक कॉपी (यदि अग्रिम जमानत एफ. आई. आर. के बाद की जा रही है), गिरफ्तारी के वारंट (यदि जारी किए गए), दस्तावेज जो व्यक्ति को जमानत दिलाने में फायदेमंद हो सकते हैं और न्यायालय भी उन पर भरोसा कर सकता है (जैसे कि, पूर्व चिकित्सा रिपोर्ट, चिकित्सा बिल, परिवार के कुछ दायित्व, माँ की बीमारी, एफ. आई. आर. में लिखित आरोपों का खंडन करते हुए कुछ दस्तावेज जैसे कि प्लेन टिकट, पासपोर्ट कॉपी आदि)।
 

अग्रिम जमानत को निरस्त करवाना

अगर किसी व्यक्ति को किसी न्यायालय द्वारा अग्रिम जमानत मिल गई है, तो दूसरा पक्ष या शिकायतकर्ता, उस न्यायालय जिसने अग्रिम जमानत दी है, या फिर उच्च न्यायालय में इसके खिलाफ आवेदन करके इसको निरस्त करवा सकता है। ऐसे में शिकायतकर्ता को न्यायालय को इस बात का सबूत देना होगा कि अग्रिम जमानत पाने वाला व्यक्ति अपनी जमानत का गलत इस्तेमाल कर रहा है, तथा गवाहों व सबूतों के साथ छेड़छाड़ भी कर रहा है, या जाँच एजेंसी के मार्ग में बाधा उत्पन्न कर रहा है।
 

उत्तर प्रदेश में अग्रिम जमानत

यह सुनने में अजीब लगेगा कि अग्रिम जमानत कि ममले में संपूर्ण भारत में एक सामान कानून होने के बाबजूद भी उत्तर प्रदेश में आप अग्रिम जमानत के लिए आवेदन नहीं कर सकते, क्योंकि भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता के 1976 के संसोधन अधिनियम की धारा 9 के अनुसार उत्तर प्रदेश में अग्रिम जमानत को ख़त्म कर दिया गया था। ऐसा इस राज्य में इस कानून का ज्यादा दुरूपयोग होने के कारण किया गया था, क्योंकि वहाँ पर लोग अग्रिम जमानत लेकर अन्य दूसरे किसी अपराध को अंजाम देने की तयारी करने लगते थे। लेकिन वहाँ पर अगर किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी से बचाना है, तो वो सीधे हाई कोर्ट में अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट फाइल करके अग्रिम जमानत ले सकता है।




 

ये गाइड कानूनी सलाह नहीं हैं, न ही एक वकील के लिए एक विकल्प
ये लेख सामान्य गाइड के रूप में स्वतंत्र रूप से प्रदान किए जाते हैं। हालांकि हम यह सुनिश्चित करने के लिए अपनी पूरी कोशिश करते हैं कि ये मार्गदर्शिका उपयोगी हैं, हम कोई गारंटी नहीं देते हैं कि वे आपकी स्थिति के लिए सटीक या उपयुक्त हैं, या उनके उपयोग के कारण होने वाले किसी नुकसान के लिए कोई ज़िम्मेदारी लेते हैं। पहले अनुभवी कानूनी सलाह के बिना यहां प्रदान की गई जानकारी पर भरोसा न करें। यदि संदेह है, तो कृपया हमेशा एक वकील से परामर्श लें।

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